एससी-एसटी यानी अनुसूचित जाति-जनजाति के लोग हमेशा राजनैतिक बहस का केंद्रीय विषय होते हैं. लेकिन बड़े स्तर पर देखें तो इनकी हालत में कोई खास बदलाव नहीं दिखता. अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की तरफ से जारी रिपोर्ट 'स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया-2023' कुछ ऐसा ही इशारा करती है.
20 सितंबर को जारी इस रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2004 में 80% से अधिक दिहाड़ी मजदूरों के बेटे भी मजदूरी ही करते थे. एससी-एसटी और अन्य जातियों, सभी की यही हालत थी. 2018 में दिहाड़ी मजदूरों के बेटों को अच्छे और ज्यादा वेतन वाले रोजगार मिले. उस साल 53% दिहाड़ी मजदूरों के बेटे पिता का पेशा अपना रहे थे. लेकिन यह कमी एससी-एसटी के मामले में बहुत मामूली रही जहां पहले के 86% के मुकाबले 76% दिहाड़ी मजदूरों के बेटे पिता की तरह दिहाड़ी पर लगे रहे.
रिपोर्ट के मुताबिक, एससी-एसटी का ओवरऑल वर्कफोर्स (कार्यबल) में जितना हिस्सा है उससे भी कम उनकी हिस्सेदारी छोटी फर्मों में है. यही नहीं 20 से ज्यादा कर्मचारियों वाली फर्मों के मालिक के तौर पर एससी-एसटी की मौजूदगी बहुत कम या नगण्य है जबकि फर्मों का साइज जैसे-जैसे बढ़ता जाता है ऊंची जातियों का प्रतिनिधत्व घना होता जाता है.
इस रिपोर्ट में रोजगार और कमाई के पहलुओं का विश्लेषण किया गया है. कोविड के बाद बेरोजगारी दर कोविड से पहले की इस दर के मुकाबले कम है लेकिन ग्रेजुएट्स के लिए यह 15% से ऊपर बनी हुई है. अभी भी 25 साल से कम उम्र के ग्रेजुएट्स में बेरोजगारी की दर 42 प्रतिशत है जो गहरी चिंता की बात है. देश में जुलाई में बेरोजगारी दर 7.95 प्रतिशत थी.
महिलाओं और पुरुषों की कमाई में फर्क घटा तो है लेकिन बहुत मामूली. 2004 में वेतनभोगी महिलाएं, पुरुषों के मुकाबले 70 प्रतिशत कमाती थीं और यह दर 2017 में 76 प्रतिशत हो गई पर तब से यह 2021-22 में भी ज्यों की त्यों है. यानी 2017 से महिलाओं की आय पुरुषों के मुकाबले स्थिर है.
2019 के बाद महिलाओं में रोजगार की दर बढ़ी क्योंकि मजबूरी के चलते महिलाओं ने स्वरोजगार को अपनाया है. कोविड से पहले 50 प्रतिशत महिलाएं अपना रोजगार कर रही थीं जबकि कोविड के बाद यह दर बढ़कर 60% हो गई. लेकिन इसका एक और परिणाम हुआ कि उनकी आय घट गई. 2020 के लॉकडाउन के दो साल बाद महिलाएं अप्रैल-जून 2019 की अपनी आय के मुकाबले 85 प्रतिशत ही कमा पा रही थीं.
एक और ट्रेंड यह सामने आया कि पति का वेतन बढ़ते ही महिलाओं के रोजगार में रहने की संभावनाएं कम हो जाती हैं. लेकिन शहरी इलाकों में पति का वेतन 40,000 रुपए प्रतिमाह की सीमा पार करे तो पत्नी के फिर काम करने की संभावनाएं बढ़ जाती है. उन घरों में जहां सास कामकाजी है, बहू के कामकाजी होने की संभावनाएं ज्यादा होती हैं और यह दर ग्रामीण इलाकों में 50 प्रतिशत और शहरों में 70 प्रतिशत है.

