फरवरी की 25 तारीख को दिल्ली में आयोजित इंडिया टुडे इंफ्रास्ट्रक्चर कॉन्क्लेव में केंद्रीय बंदरगाह, जहाजरानी और जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने शिरकत की. इस दौरान उन्होंने जलमार्ग, बंदरगाह और समुद्री मार्गों से होने वाली माल ढुलाई के रोडमैप पर अपनी बात रखी.
इस कार्यक्रम में उन्होंने 'ब्लू होराइजन्स: बिल्डिंग इंडियाज स्मार्ट पोर्ट्स एंड मैरीटाइम फ्यूचर (Blue horizons: Building India’s smart ports and maritime future )' विषय पर भाषण दिया. उनके मुताबिक, जलमार्ग और समुद्री परिवहन के इंफ्रास्ट्रक्चर में हो रहे बदलाव से आर्थिक गतिविधियों को नई गति मिलेगी.
सोनोवाल ने पीएम मोदी के नेतृत्व की तारीफ करते हुए कहा कि वर्तमान सरकार ने शासन सुधार, प्रदर्शन और परिवर्तन के मंत्र के साथ काम शुरू किया है. यह एक ऐसा मंत्र है जो हर मंत्रालय पर लागू होता है. बंदरगाह, जहाजरानी और जलमार्ग मंत्रालय ने भी इसी मंत्र को ध्यान में रखकर बंदरगाहों से लेकर जलमार्गों तक के विकास पर खास ध्यान दिया है.
सोनोवाल ने आगे कहा कि बंदरगाहों के विकास के लिए 2015 में सागरमाला कार्यक्रम को मंजूरी दी गई थी, आज उसे ही आगे बढ़ाने पर काम किया जा रहा है. यह एक विकास योजना है, जो बंदरगाहों को आधुनिक बनाने, कनेक्टिविटी सुधारने और भारत की तटीय रेखा तथा जलमार्गों का इस्तेमाल करके औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने पर आधारित है.
सर्बानंद सोनोवाल के मुताबिक, सागरमाला प्रोजेक्ट को राज्य सरकारों, केंद्र शासित प्रदेशों और राज्य समुद्री बोर्डों के साथ विचार-विमर्श करके तैयार किया गया था. आज इसमें 879 से ज्यादा स्वीकृत प्रोजेक्ट्स शामिल हैं, जिनकी कुल बजट करीब ₹5.79 लाख करोड़ है.
सोनोवाल ने मंत्रालय के काम-काज के बारे में विस्तार से बताते हुए कहा कि सागरमाला कार्यक्रम और उनके मंत्रालय का काम पांच वर्टिकल्स में बंटे हुए हैं. इनमें पोर्ट आधुनिकीकरण, मशीनीकरण और डिजिटाइजेशन, पोर्ट कनेक्टिविटी, पोर्ट औद्योगिकीकरण, तटीय समुदाय का विकास और तटीय शिपिंग का डेवलपमेंट शामिल है. उन्होंने कहा कि इन क्षेत्रों में होने वाले सुधार का असर पर दिखने लगा है.
विश्व बैंक का लॉजिस्टिक्स परफॉर्मेंस इंडेक्स का हवाला देते हुए सोनोवाल ने कहा: “पहले एक जहाज का टर्नअराउंड टाइम 96 घंटे था. उसे पोर्ट अथॉरिटी से ग्रीन सिग्नल का इंतजार करना पड़ता था. अब यह घटकर 24 घंटे रह गया है. इस मामले में हम अमेरिका, सिंगापुर, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी आदि से काफी बेहतर हैं. शिपमेंट श्रेणी में हम पहले 44वें स्थान पर थे. 11 वर्षों में हम 22वें स्थान पर पहुंच गए हैं. पहले कार्गो हैंडलिंग क्षमता 555 बिलियन मीट्रिक टन तक सीमित थी, जो अब बढ़कर 885 बिलियन मीट्रिक टन हो गई है.”
सोनोवाल ने इन उपलब्धियों को प्रधानमंत्री मोदी के प्रत्यक्ष हस्तक्षेप से जोड़ा है. उन्होंने कहा, "पीएम मोदी ने सभी संबंधित मंत्रालयों को निर्देश दिया था कि वे अलग-अलग काम न करें, बल्कि एक साथ मिलकर काम करें. ताकि 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' सिर्फ नीति का नारा न रहे, बल्कि जमीन पर लागू हो."
उन्होंने कहा कि सबसे ज्यादा फोकस इस बात पर था कि लॉजिस्टिक्स लागत को दो अंकों से घटाकर एक अंक तक लाया जाए. एक उदाहरण देकर उन्होंने समझाया कि कैसे 1 मीट्रिक टन माल को रेल से ले जाने में लगभग 1.25 रुपये, सड़क से 2.5 रुपये और अंतर्देशीय जलमार्ग से सिर्फ 60 पैसे लगते हैं.
बतौर सोनोवाल, प्रधानमंत्री ने बार-बार स्पीड (गति), स्केल (बड़े पैमाने पर काम) और अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन करने पर जोर देते हैं. जबकि UPA (संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन) के शासनकाल में जलमार्गों के विकास को लेकर राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी थी. उस समय भारत में सिर्फ पांच राष्ट्रीय जलमार्ग थे और माल ढुलाई की क्षमता सिर्फ 18 मिलियन मीट्रिक टन (MT) तक सीमित थी.
नई नीतियों, प्लानिंग फ्रेमवर्क और अतिरिक्त राष्ट्रीय जलमार्गों की घोषणा के साथ अब क्षमता बढ़कर 145 मिलियन MT हो गई है यानी 700 फीसद की ग्रोथ. आसान शब्दों में कहें तो पहले सिर्फ 5 जलमार्ग थे और जहाज सालाना 18 मिलियन टन माल ही ले जा पाते थे. अब मोदी सरकार ने ज्यादा जलमार्ग बनाए, नीतियां बदलीं, तो क्षमता 145 मिलियन टन हो गई.
सोनोवाल जी ने प्रशासनिक संस्कृति में बदलाव पर बात आगे बढ़ाते हुए कहा कि पीएम मोदी जी का फोकस टीमवर्क पर है, जो पूरे केंद्रीय मंत्रिमंडल और नौकरशाही में फैला हुआ है. प्रोजेक्ट्स को सुचारू रूप से लागू करने के लिए जरूरी है कि नागरिकों में सकारात्मक सोच हो और सरकार पर विश्वास हो.
उन्होंने उत्तर-पूर्व को उदाहरण दिया और कहा कि पिछले 11 सालों में केंद्र सरकार से इस क्षेत्र को ₹7.9 लाख करोड़ की मदद मिली है, जिसमें से बड़ा हिस्सा इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च हुआ है. सोनोवाल ने कहा कि उत्तर-पूर्व में पहले कनेक्टिविटी रोजमर्रा की जिंदगी में एक बड़ी समस्या थीं, उन्हें अब खत्म किया जा रहा है.
उदाहरण के लिए, अरुणाचल प्रदेश में पहले एक जिले से दूसरे जिले जाने के लिए असम से होकर जाना पड़ता था. अब नई इंफ्रास्ट्रक्चर की वजह से यह बाधा खत्म हो गई है. इन सबके कारण पूर्वोत्तर के लोगों को पीएम मोदी की नेतृत्व पर भरोसा हुआ है. पहली बार सात दशकों में क्षेत्र के लोग खुद को दिल्ली से सचमुच जुड़ा हुआ महसूस कर रहे हैं. अंतिम छोर तक कनेक्टिविटी के सवाल पर सोनोवाल ने कहा कि इस अवधारणा को ही बदल दिया गया है. अब भारत की सीमाओं पर बसे गांवों को आखिरी गांव नहीं, बल्कि देश का पहला गांव माना जाता है.
सोनोवाल ने उदाहरण देते हुए कहा कि असम के जोगीघोपा पोर्ट का अब अंतरराष्ट्रीय महत्व हो गया है. यहां से भूटान, नेपाल, बांग्लादेश और भारत को सप्लाई हो रहा है. भूटान से माल जोगीघोपा आता है और वहां से बांग्लादेश व अन्य पड़ोसी देशों जैसे थाईलैंड और म्यांमार तक जाता है. इससे असम जैसे राज्यों में मल्टीमॉडल लॉजिस्टिक्स (सड़क-रेल-जलमार्ग) नेटवर्क बन रहे हैं, जो व्यापार के लिए नए रास्ते खोल रहे हैं.
पहले के कांग्रेस सरकारों से तुलना करते हुए उन्होंने कहा कि तब ग्रासरूट स्तर पर लोगों से जुड़ाव नहीं था और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के फायदे समझाए नहीं जाते थे. मुख्य बंदरगाह प्रोजेक्ट्स पर सोनोवाल ने आने वाले दिनों में और निवेश किए जाने की बात कही है. उन्होंने कहा कि महाराष्ट्र और केरल में नया पोर्ट बनेगा. इससे 12 लाख से ज्यादा प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष नौकरियां पैदा होंगी.
उन्होंने कहा कि नए प्रोजेक्ट्स शुरू होने पर भारत की निर्भरता विदेशी ट्रांसशिपमेंट हब जैसे कोलंबो, सिंगापुर और दुबई पर काफी कम हो जाएगी, जिससे विदेशी मुद्रा बचाएगी. ग्रेट निकोबार प्रोजेक्ट से जुड़े चिंताओं का जवाब देते हुए सोनोवाल ने कहा कि प्रस्तावित पोर्ट रणनीतिक तौर पर बेहद अहम है. यह अंतरराष्ट्रीय समुद्री मार्गों के पास है, जो भारत की लंबे समय की समुद्री महत्वाकांक्षाओं के लिहाज से तैयार किया जा रहा है.
पर्यावरण सुरक्षा पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि कई प्रोजेक्ट को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) से मंजूरी मिल चुकी है. उन्होंने कहा, “इकोलॉजी, इकोनॉमी और एनवायरनमेंट को ध्यान में रखकर हम अर्थव्यवस्था बढ़ाना चाहते हैं." शिपबिल्डिंग (जहाज निर्माण) पर सरकार के प्रयासों की बात करते हुए सोनोवाल ने कहा कि यूनियन बजट 2026 में ₹70,000 करोड़ का प्रावधान किया गया है. शिपबिल्डिंग में निवेश के लिए, और जरूरत पड़ने पर इसे बढ़ाया जा सकता है.
मैरिटाइम इंडिया विजन 2030 के तहत भारत का लक्ष्य है कि 2030 तक दुनिया के टॉप 10 शिपबिल्डिंग देशों में शामिल हो जाए. लंबे समय का मैरिटाइम अमृत काल विजन 2047 टॉप 5 में जगह बनाने का है. फिलहाल चीन, दक्षिण कोरिया और जापान इस क्षेत्र पर हावी हैं, जिससे भारत को विदेशी कंपनियों पर बहुत निर्भर रहना पड़ता है.
हर साल ₹6 लाख करोड़ से ज्यादा विदेशी शिपिंग लाइनों पर खर्च होता है, सरकार इसे कम करने के लिए घरेलू इकोसिस्टम बनाना चाहती है. अब भारतीय यार्ड्स वैश्विक विश्वास जीत रहे हैं. इसका उदाहरण कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड है, जिसे दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी शिपिंग कंपनी CMA CGM से छह कंटेनर जहाज बनाने का ऑर्डर मिला है. यह भारत की समुद्री निर्माण क्षमता को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिलने का सबूत है.

