रूस से एक बार फिर रिकॉर्ड तेल आयात ने फिर यह साबित कर दिया है कि संकट के समय भारत रूस पर भरोसा करता है. तेल से लदे जहाजों की आवाजाही पर नजर रखने वाली कमोडिटी एनालिटिक्स फर्म केप्लर के मुताबिक, जून 2026 में भारत हर रोज रूस से 23.5 लाख बैरल कच्चे तेल का रिकॉर्ड आयात करेगा.
इससे पहले मई 2023 में भारत ने एक महीने में रिकॉर्ड 22 लाख बैरल प्रतिदिन रूसी तेल आयात किया था. जून 2026 के पहले तीन हफ्तों में भारत के कुल तेल आयात में रूस की हिस्सेदारी 53.5 फीसद रही है. अमेरिका की पाबंदियों से बचने के लिए भारत को रूसी तेल आयात में भारी कटौती करनी पड़ी थी. ऐसे में रूस से तेल आयात में यह बढ़ोतरी भारत की ऊर्जा नीति में एक बड़े बदलाव का संकेत देती है.
दिलचस्प बात यह है कि जिस रूसी तेल की खरीद पर अमेरिका ने पाबंदी लगा दिया था उसे बाद में अमेरिका ने ही फिर से खोल दिया. इसकी शुरुआत 28 फरवरी को अमेरिका और इजराइल के ईरान पर हमले से हुई, जिसके बाद तेल की कीमतें बढ़ गईं क्योंकि ईरान ने दुश्मन देशों के जहाजों के लिए होर्मुज स्ट्रेट बंद कर दिया.
होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है जहां से वैश्विक खपत के लगभग एक-चौथाई तेल और एक-तिहाई LNG (द्रवीकृत प्राकृतिक गैस) की आपूर्ति होती है. वित्त वर्ष 2024-25 में भारत का 54 फीसद गैस आयात और 45 फीसद तेल आयात होर्मुज के रास्ते हुआ था. इस मार्ग से भारत को तेल आपूर्ति करने वाले प्रमुख देशों में इराक, सऊदी अरब, UAE और कुवैत शामिल हैं.
होर्मुज कई हफ्तों तक बंद रहने से भारत में तेल, LNG और प्राकृतिक गैस का आयात प्रभावित हुआ. ऊंची कीमतों और सीमित आपूर्ति के कारण लोगों को रसोई गैस और औद्योगिक गैस के लिए ज्यादा कीमत चुकानी पड़ी. बाद में सरकार ने पेट्रोल और डीजल की कीमतें भी बढ़ाईं ताकि सरकारी तेल कंपनियों को हुए नुकसान की भरपाई की जा सके क्योंकि उन्होंने अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के अनुरूप खुदरा ईंधन कीमतों में बढ़ोतरी नहीं की थी.
भारत अपनी लगभग 90 फीसद तेल जरूरतों के लिए आयात पर निर्भर है. वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने विभिन्न देशों से 161 अरब डॉलर का कच्चा तेल आयात किया था. उस वर्ष रूस 56.9 अरब डॉलर के तेल निर्यात के साथ भारत का सबसे बड़ा आपूर्तिकर्ता था. हालांकि, रूस से तेल खरीदने पर अमेरिकी पाबंदी के कारण शुरुआत में वहां से तेल आयात में गिरावट आई.
पिछले वर्ष अगस्त में अमेरिका ने रूस से तेल खरीदने के कारण भारत पर 25 फीसद अतिरिक्त टैरिफ लगा दिया था. यह 2025 की शुरुआत में लगाए गए 25 फीसद टैरिफ से अलग था. इसके बाद वित्त वर्ष 2025-26 की पहली छमाही (अप्रैल-सितंबर) में रूस से भारत का तेल आयात सालाना आधार पर 14 फीसद घटकर 23.1 अरब डॉलर रह गया.
हालांकि अमेरिका और ईरान के बीच अपेक्षित शांति समझौता न होने से पश्चिम एशिया में तेल संकट और गहराने लगा. अप्रैल के मध्य में अमेरिका के जरिए लगाए गए नौसैनिक अवरोध के कारण होर्मुज बंद होने पर भारत को फिर से रूस का विकल्प अपनाना पड़ा.
इसी वर्ष अमेरिका ने अपनी शुरुआती नीति में अस्थाई ढील देते हुए भारत को वैश्विक ऊर्जा कीमतों को स्थिर रखने और आपूर्ति संकट कम करने के लिए रूसी तेल खरीदने की अनुमति दी थी. विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में रूस का तेल भारत के लिए महत्वपूर्ण बना रहेगा भले ही अमेरिका पहले से टैंकरों में लदे रूसी तेल के लिए दी गई छूट आगे न बढ़ाए.
युद्ध के बाद 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच चुकी ब्रेंट क्रूड की कीमतें अब काफी नीचे आ गई हैं. 23 जून को अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड 77.5 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा था. हालांकि 2022-23 जैसी भारी छूट अब नहीं मिलती फिर भी रूसी कच्चा तेल ब्रेंट के मुकाबले 4-5 डॉलर प्रति बैरल सस्ता पड़ता है. ये बात अलग है कि इसकी ढुलाई और बीमा लागत अधिक है जो भारतीय बंदरगाहों तक पहुंचने में 3 से 7 डॉलर प्रति बैरल के बीच रहती है.
इस बीच 21 जून को अमेरिका ने ईरानी तेल की बिक्री को मंजूरी दे दी और तेहरान के साथ अंतिम शांति समझौते की दिशा में बढ़ते हुए दशकों पुरानी पाबंदियों में ढील दी. इसके बदले ईरान ने परमाणु निरीक्षण और होर्मुज में निर्बाध आवाजाही सुनिश्चित करने की प्रतिबद्धता जताई. अमेरिकी वित्त विभाग द्वारा जारी सामान्य लाइसेंस के तहत 21 अगस्त तक ईरानी मूल के कच्चे तेल, पेट्रोकेमिकल और पेट्रोलियम उत्पादों की बिक्री की अनुमति दी गई है.
ICRA के वरिष्ठ उपाध्यक्ष और कॉरपोरेट सेक्टर रेटिंग्स से जुड़े प्रशांत वशिष्ठ कहते हैं, “होर्मुज खुलने और ईरानी कच्चे तेल के उत्पादन, आपूर्ति और बिक्री को 60 दिनों की अस्थाई मंजूरी मिलने से पहले से तंग तेल बाजारों को राहत मिलेगी.”
वशिष्ठ ने कहा कि ऐतिहासिक रूप से ईरानी कच्चा तेल 60-90 दिनों की क्रेडिट अवधि के साथ उपलब्ध होता था जबकि अन्य उत्पादक देशों के लिए यह अवधि लगभग 30 दिन होती है. इससे रिफाइनरियों की कार्यशील पूंजी (किसी व्यवसाय के दिन-प्रतिदिन के संचालन के लिए उपलब्ध धनराशी ) की जरूरत कम होती है. इसके अलावा भारत के नजदीक होने के कारण भारतीय रिफाइनरियों को परिवहन लागत में भी लाभ मिलता है.
रूस के यूक्रेन पर हमले के बाद 2022 में अमेरिका और यूरोपीय संघ ने रूस पर प्रतिबंध लगाए थे. इसके बाद भारत ने रूसी कच्चे तेल पर अधिक निर्भरता बढ़ानी शुरू की. रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण जब वैश्विक तेल कीमतें बढ़ रही थीं, तब भारत ने रूस से अपेक्षाकृत सस्ता कच्चा तेल बड़ी मात्रा में खरीदना शुरू कर दिया था.

