भारत के ताजा राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे (NFHS) ने बाल स्वास्थ्य को लेकर उत्साहजनक खबर दी है. इसकी प्रमुख उपलब्धियों में से एक है रोटावायरस के खिलाफ टीका लगवाने वाले बच्चों की संख्या में हुई उल्लेखनीय वृद्धि.
2023-24 में किए गए NFHS-6 के अनुसार रोटावायरस वैक्सीन का कवरेज 36.4 प्रतिशत से बढ़कर 85.4 प्रतिशत हो गया है. यानी कुछ ही वर्षों में यह दोगुने से भी अधिक हो गया.
ये आंकड़े टीकाकरण तक बेहतर पहुंच और निवारक स्वास्थ्य सेवाओं या प्रिवेंटिव हेल्थकेयर (भविष्य की बीमारियों से बचाव) के प्रति बढ़ती जागरूकता की सफलता को दिखाते हैं. मेदांता नोएडा में बाल चिकित्सा देखभाल की निदेशक डॉ. शालिनी त्यागी बताती हैं कि इस उपलब्धि का वास्तविक जीवन पर क्या असर पड़ता है.
रोटावायरस कितना खतरनाक है?
रोटावायरस बेहद संक्रामक है और शिशुओं तथा छोटे बच्चों में शरीर में पानी की गंभीर कमी होने के सबसे आम कारणों में से एक है. यह संक्रमित हाथों, सतहों, भोजन और पानी के जरिए आसानी से फैल सकता है.
अक्सर दस्त को बचपन की सामान्य समस्या माना जाता है लेकिन रोटावायरस संक्रमण कहीं अधिक गंभीर हो सकता है. इससे गंभीर दस्त, उल्टी, बुखार और शरीर में पानी की कमी हो सकती है. कई मामलों में अस्पताल में भर्ती होने की नौबत आ जाती है और यह जानलेवा भी साबित हो सकता है. शिशु और छोटे बच्चे, खासकर पांच साल से कम उम्र के बच्चे, बहुत तेजी से शरीर का पानी खोते हैं. इसलिए वे सबसे अधिक जोखिम में रहते हैं.
बढ़ते कवरेज का क्या मतलब है?
NFHS-6 में वैक्सीन कवरेज में बड़ी बढ़ोतरी दर्ज की गई है. यह भारत के टीकाकरण कार्यक्रम की सफलता और टीकों के प्रति माता-पिता की बढ़ती स्वीकृति को दिखाता है.
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अब अधिक बच्चे अपने जीवन के सबसे संवेदनशील वर्षों में टीकाकरण का लाभ पा रहे हैं. इसका मतलब है कि गंभीर दस्त के कारण अस्पताल में भर्ती होने वाले बच्चों की संख्या कम होगी और अस्पतालों तथा बाल स्वास्थ्य सेवाओं पर बोझ भी घटेगा.
टीकाकरण की सफलता की कहानी
रोटावायरस टीकाकरण कवरेज में हुए सुधार को बाल टीकाकरण के व्यापक परिदृश्य में देखना चाहिए, जैसा कि NFHS-6 में बताया गया है. बच्चों में कुल टीकाकरण कवरेज 83.8 प्रतिशत से बढ़कर 87.1 प्रतिशत हो गया है. वहीं 12 से 23 महीने की उम्र के 96 प्रतिशत से अधिक बच्चों को कम से कम एक टीका लग चुका है.
इन आंकड़ों में सुधार यह दिखाता है कि भारत की सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था अब परिवारों तक बच्चों की निवारक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने में अधिक सक्षम हो रही है.
स्वास्थ्य से आगे भी हैं फायदे
टीकाकरण के फायदे सिर्फ बीमारियों की रोकथाम तक सीमित नहीं हैं. जब किसी बच्चे को गंभीर दस्त के कारण अस्पताल में भर्ती करना पड़ता है तो माता-पिता की मजदूरी या आय का नुकसान हो सकता है. यात्रा और इलाज का खर्च बढ़ता है और मानसिक तनाव भी झेलना पड़ता है.
टीकाकरण के जरिए ऐसी बीमारियों को रोकने से परिवारों पर पड़ने वाला आर्थिक बोझ और मानसिक दबाव कम होता है. साथ ही बच्चों की वृद्धि, सीखने की प्रक्रिया और विकास बीमारी से प्रभावित हुए बिना जारी रह सकता है.
चुनौतियां
हालांकि NFHS-6 के नतीजों से संतुष्ट होकर बैठ जाना उचित नहीं होगा. 85.4 प्रतिशत कवरेज निश्चित रूप से एक बड़ी उपलब्धि है लेकिन इसका मतलब यह भी है कि अभी कई बच्चे पूरी सुरक्षा से वंचित हैं.
अगली चुनौती यह सुनिश्चित करना होगी कि सभी पात्र बच्चों को रोटावायरस वैक्सीन की सभी अनुशंसित खुराकें मिलें, चाहे वे कहीं भी रहते हों.
इस तरह कवरेज में हुई बढ़ोतरी सिर्फ रोटावायरस वैक्सीन की सफलता का प्रमाण नहीं है. यह इस बात का भी सबूत है कि अगर परिवार, सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था और स्वास्थ्य सेवा प्रदाता मिलकर काम करें तो करोड़ों बच्चों तक निवारक स्वास्थ्य सेवाएं प्रभावी ढंग से पहुंचाई जा सकती हैं.

