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भारत के लिए उधार की AI इंटेलिजेंस बन सकती है खतरा!

रिलायंस जियो के AI हेड गौरव अग्रवाल ने चेतावनी दी है कि भविष्य में भारत के लिए AI पर खर्च होने वाला बिल कच्चे तेल या सोने के आयात बिल से भी ज्यादा हो सकता है

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर
अपडेटेड 4 जून , 2026

भारत AI में कुछ नया नहीं कर रहा बल्कि दूसरों से किराए पर लेकर उसके आधार पर नए ऐप्स और प्रोडक्ट बना रहा है. नई तकनीक की इसी अहम बात पर रिलायंस जियो के चीफ AI साइंटिस्ट गौरव अग्रवाल ने अपने विचार रखे हैं.

अभी भारत का ध्यान मुख्य रूप से उन लार्ज लैग्वेज मॉडल (LLMs) पर एप्लिकेशन्स बनाने पर है जो पहले से ही विकसित देशों (ग्लोबल नॉर्थ) में तैयार हो चुके हैं. गौरव अग्रवाल का कहना है कि यह स्थिति बदलनी चाहिए.

थिंक-टैंक ICRIER और टेक इन्वेस्टमेंट फर्म प्रोसस की तरफ से आयोजित ‘भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था की स्थिति’ नाम के एक वार्षिक सम्मेलन में गौरव ये बातें बोल रहे थे.

गौरव अग्रवाल ने कार्यक्रम में कहा, “हम इंटेलीजेंस किराए पर नहीं ले सकते. AI सॉफ्टवेयर से अलग है. सॉफ्टवेयर एक ऐसा टूल है जिसे आप एक बार खरीद लेते हैं और हमेशा इस्तेमाल करते रहते हैं लेकिन AI कच्चे माल की तरह है. यह सीखता रहता है और समय के साथ और ज्यादा स्मार्ट होता जाता है. हम वर्तमान में अपनी राष्ट्रीय डिजिटल व्यवस्था को विदेशी APIs (एप्लिकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफेस) पर बना रहे हैं. यह लगभग वैसा है जैसे हम कोई टूल किराए पर ले रहे हों, जिसमें मालिक शर्तें तय करता है और हमें बार-बार पैसे चुकाते रहना पड़ता है.”

उन्होंने इसे देश के लिए एक राष्ट्रीय संकट की शुरुआत के तौर पर पेश की. साथ ही कहा कि आज के समय में इंटेलिजेंस बहुत ज्यादा सुरक्षित और संरक्षित संपत्ति है. समय के साथ ये कॉर्पोरेट और भू-राजनीतिक संपत्ति बन गई है. अगर हम इसे विदेशी प्लेटफॉर्म्स पर बनाते हैं, जिनके सर्वर विकसित देशों में हैं, तो इससे हमारी क्षमता कई तरह से प्रभावित हो सकती है.”

इस बात को समझने के लिए अग्रवाल ने एक उदाहरण दिया. उन्होंने कहा कि जब 2022 में यूक्रेन युद्ध शुरू हुआ, तब गूगल प्ले और मैकडी जैसी कंपनियों ने रूस में अपने काम बंद कर दिए. यही होता है जब भू-राजनीति कॉर्पोरेट रणनीति को प्रभावित करती है.

अगर कोई देश विदेशी पूंजी पर निर्भर है, तो उसकी योजनाएं बीच में ही बिगड़ सकती हैं. उन्होंने आगे कहा, “अगर जिस कोड पर हम एप्लिकेशन बना रहे हैं, वह कोड दूसरे देशों के पास है और उनके नियंत्रण में है, तो हम कभी भी सच्चे अर्थों में आत्मनिर्भर नहीं हो सकते.”

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नागरिकों से अपील की थी कि वे खाना पकाने के तेल का इस्तेमाल कम करें, सोने की खरीदारी घटाएं और विदेश में अनावश्यक घूमने-फिरने की यात्राएं टालें. इसका मकसद विदेशी मुद्रा भंडार बचाना और चालू खाता घाटे (CAD) को कम करना था. अग्रवाल ने कहा कि पांच साल बाद AI के इस्तेमाल को लेकर भी ऐसी ही चिंताएं पैदा हो सकती हैं क्योंकि भारतीय कंपनियों का AI बिल बहुत तेजी से बढ़ सकता है.

गौरव के मुताबिक, अगर हमने इसी तरह AI में कुछ नया नहीं किया तो यह बिल आखिरकार हमारे कच्चे तेल या सोने के आयात बिल से भी ज्यादा बड़ा हो सकता है. यह एक गंभीर समस्या बन जाएगी. हमें इस बड़े बदलाव के लिए तैयार रहना चाहिए.  

गौरव अग्रवाल ने कहा, “अगर हम अपने खुद के AI मॉडल नहीं बनाएंगे, तो हम AI की दौड़ में पिछड़ जाएंगे. भारत की आबादी 1.4 अरब है और यह दुनिया के सबसे ज्यादा डिजिटल देशों में से एक है. देश में जितना डेटा तैयार होता है, वह शायद किसी भी अन्य देश से ज्यादा है. फिर भी इस डेटा का बड़ा हिस्सा भारत में नहीं रहता, क्योंकि भारतीय जो एप्लिकेशन्स इस्तेमाल करते हैं, वे ज्यादातर पश्चिमी कंपनियों द्वारा बनाए गए हैं. ये कंपनियां हमारे डेटा का इस्तेमाल करके अपने मॉडल्स को और बेहतर बनाती हैं."

गौरव ने इस बात पर जोर दिया कि डेटा हमारी सबसे बड़ी ताकत (सुपरपावर) है लेकिन विडंबना यह है कि हम इसका इस्तेमाल अपनी तरक्की के लिए नहीं कर रहे हैं. इसके बजाय हम डेटा विदेश भेज रहे हैं ताकि बड़ी टेक कंपनियां अपनी क्षमता बढ़ा सकें. गौरव अग्रवाल ने कहा कि यह आधुनिक समय का डिजिटल दोहन है. हमें इस डिजिटल उपनिवेशवाद के चक्र को तोड़ना होगा.  

कारण यह है कि आज भी अगर कोई भारतीय कंपनी मुकाबले वाली एप्लिकेशन बनाना चाहे, तो उसके पास उतना बड़ा यूजर डेटा नहीं होता. जितना बड़ा ग्लोबल टेक कंपनियों के पास पहले से मौजूद है. AI स्वाभाविक रूप से समावेशी भी नहीं है. भले ही कई AI सेवाएं अभी मुफ्त हैं लेकिन जैसे-जैसे इनकी कमाई बढ़ेगी और पेड वर्जन सामान्य हो जाएंगे. हमारी निर्भरता स्थाई हो सकती है. इससे अमीर और गरीब के बीच AI इस्तेमाल करने वालों का फर्क और बढ़ जाएगा.

इसका नतीजा यह होगा कि भारत को पश्चिमी मॉडलों की नकल करने से आगे बढ़कर अपने स्वयं का कुछ नया बनाने की जरूरत हो सकती है. कुल मिलाकर हमारा लक्ष्य स्वदेशी आधारभूत मॉडल विकसित करना होना चाहिए. अग्रवाल के मुताबिक, ये केवल स्मॉल लेंग्वेज मॉडल (SLM) नहीं हो सकते. भारत को LLM पाठ्यक्रम भी विकसित करने होंगे. इस वास्तविकता से बचना संभव नहीं है.

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