
18वीं लोकसभा में एक जुलाई को राहुल गांधी ने पहली बार बतौर नेता प्रतिपक्ष भाषण दिया और उसके बाद से ही कांग्रेस नेता के बयान ट्विटर पर ट्रेंड करने लगे. राहुल गांधी के पहले भाषण के दिन पीएम मोदी, गृह मंत्री अमित शाह समेत रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को भी खड़े होकर बीच में ही टोकना पड़ा.
नेता प्रतिपक्ष ने अपने भाषण में बीजेपी पर अल्पसंख्यकों पर अत्याचार करने का आरोप लगाने के साथ ही अग्निवीर योजना को भी हटाने की मांग की थी. इसके बाद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कांग्रेस नेता के भाषण के कुछ हिस्सों को असंसदीय बताकर संसद के रिकॉर्ड से हटा दिया.
हालांकि ऐसा पहली बार नहीं हुआ है. इससे पहले 7 फरवरी, 2023 को संसद में दिए राहुल गांधी के भाषण के कुछ हिस्सों को ऐसे ही 'एक्सपंज' कर दिया गया था. लेकिन वे कौन से नियम हैं जिनकी मदद से किसी सांसद के भाषण को रिकॉर्ड से बाहर कर दिया जाता है?
एक जुलाई को राहुल गांधी राष्ट्रपति के संबोधन के लिए धन्यवाद प्रस्ताव पर बोल रहे थे. संविधान में ऐसे किसी प्रस्ताव का प्रावधान नहीं है, मगर ब्रिटिश संसद से अपनाई गई इस प्रथा का आज भी पालन किया जाता है. जब राष्ट्रपति के संबोधन के लिए धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा की जाती है, तो सांसदों को आम तौर पर किसी भी विषय पर बोलने की अनुमति होती है क्योंकि यह सरकार की ओर से हुई चूक को बताने और देश के शासन से संबंधित मुद्दों पर चर्चा करने का अवसर होता है.
भाषण आम तौर पर राजनीतिक होते हैं और अध्यक्ष (स्पीकर) कभी भी विषय की प्रासंगिकता पर जोर नहीं देते. संसद के प्रति जवाबदेही के लिए सरकार को बहस में सांसदों की ओर से उठाए गए सवालों का जवाब देना जरूरी है. सदन के नियमों के मुताबिक, यह प्रधानमंत्री ही होते हैं जो दोनों सदनों में बहस का जवाब देते हैं.
संविधान की बात करें तो इसके अनुच्छेद 105(2) के तहत, "संसद के किसी भी सदस्य पर, संसद या उसकी किसी समिति में कही गई किसी भी बात के लिए, किसी भी अदालत में कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी." इस अनुच्छेद के बावजूद ऐसा नहीं है कि सांसदों को सदन के अंदर कुछ भी कहने की आजादी है.
सरल शब्दों में कहें तो सदन में अभिव्यक्ति की आजादी सांसद का सबसे महत्वपूर्ण विशेषाधिकार है जो सदन से जुड़े संविधान के दूसरे प्रावधानों और सदन के नियमों के अधीन होता है. लोकसभा के 'रूल्स ऑफ प्रोसीजर' का नियम 380 और 'रूल्स ऑफ राज्यसभा' का नियम 261 दोनों सदनों के पीठासीन अधिकारियों को बहस में इस्तेमाल किए गए किसी भी ऐसे शब्द को हटाने की शक्ति देते हैं जो अपमानजनक, असंसदीय, अशोभनीय या अशिष्ट हैं. हटाए जाने के बाद वे रिकॉर्ड में नहीं रहते हैं और अगर कोई उन्हें उसके बाद प्रकाशित करता है, तो वे सदन के विशेषाधिकार के उल्लंघन के लिए उत्तरदायी होते हैं.
ऐसे भी मौके आते हैं जब कोई सांसद अपने भाषण के दौरान किसी साथी सांसद या बाहरी व्यक्ति के खिलाफ आरोप लगा सकता है. ऐसे में लोकसभा के नियम 353 के तहत, सांसद को अध्यक्ष के साथ-साथ संबंधित मंत्री को भी 'पर्याप्त अग्रिम सूचना' देनी होती है.
हालांकि ये नियम किसी भी आरोप को लगाने पर रोक नहीं लगाता है. केवल अग्रिम सूचना की बात ही इस नियम में कही गई है. अग्रिम सूचना मिलने पर संबंधित मंत्री आरोप की जांच करते हैं और जब सांसद सदन में आरोप लगाते हैं तो तथ्यों के साथ सत्तारूढ़ सांसद उनका जवाब देते हैं.
जिस आरोप के लिए अग्रिम सूचना आदि की आवश्यकता होती है, वह मानहानि करने वाला या आपत्तिजनक प्रकृति का होता है. इसका मतलब यह है कि अगर आरोप न तो मानहानि करने वाला है और न ही आपत्तिजनक, तो यह नियम लागू नहीं होगा. इसके अलावा यह नियम स्पष्ट रूप से सरकार में किसी मंत्री के खिलाफ लगाए गए आरोप पर लागू नहीं होता है. चूंकि मंत्रिपरिषद संसद के प्रति जवाबदेह है, इसलिए सदन के सदस्यों को मंत्रियों से सवाल करने और मंत्री के रूप में उनके आचरण के खिलाफ आरोप लगाने का अधिकार है.
सांसद के भाषण से कुछ हिस्सों को 'एक्सपंज' या हटाने की बात करें तो 'रूल्स ऑफ प्रोसीजर एंड कंडक्ट ऑफ बिजनेस इन लोकसभा' के नियम 380 के मुताबिक, "यदि अध्यक्ष की राय है कि बहस में ऐसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया है जो अपमानजनक या अभद्र या असंसदीय या अशोभनीय हैं, तो अध्यक्ष विवेक का प्रयोग करते हुए आदेश दे सकते हैं कि ऐसे शब्दों को सदन की कार्यवाही से निकाल दिया जाए."
संसदीय सत्र के अंत में, रिकॉर्ड से हटाए गए शब्दों का संकलन, वजहों के साथ, जानकारी के लिए स्पीकर के कार्यालय, संसद टीवी और संपादकीय सेवा को भेजा जाता है. कार्यवाही के हटाए गए हिस्से संसद के रिकॉर्ड में मौजूद नहीं रहते, और हटाए जाने के बाद मीडिया भी संसदीय भाषण के उन हिस्सों को नहीं दिखा सकती, भले ही उन्हें कार्यवाही के लाइव प्रसारण के दौरान सुना गया हो.
सोमवार, 1 जुलाई को लोकसभा में अपने भाषण को रिकॉर्ड से हटाए जाने के बाद राहुल गांधी ने कहा, "मोदी जी की दुनिया में टिप्पणियों को हटाया जा सकता है, लेकिन वास्तविकता में इसे हटाया नहीं जा सकता. मुझे जो कहना था, वह कह दिया और यही सच है. वे इसे जितना चाहें हटा सकते हैं."
हालांकि, 2 जुलाई को राहुल गांधी ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को चिट्ठी लिखी और कहा, "मेरी विचारपूर्ण टिप्पणियों को हटाना संसदीय लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के विरुद्ध है. सभापति को सदन की कार्यवाही से कुछ टिप्पणियों को हटाने का अधिकार है, लेकिन शर्त केवल उन शब्दों को हटाने की है, जिनकी प्रकृति लोकसभा के प्रक्रिया और कार्य संचालन नियमों के नियम 380 में बताई गई है. मेरे भाषण से हटाए गए अंश नियम 380 के दायरे में नहीं आते."

उन्होंने नियमों का हवाला देते हुए कहा, "मैं सदन में जो संदेश देना चाहता था, वह जमीनी हकीकत है, तथ्यात्मक स्थिति है. सदन का प्रत्येक सदस्य जो लोगों की सामूहिक आवाज का प्रतिनिधित्व करता है, उसे भारत के संविधान के अनुच्छेद 105(1) के अनुसार अभिव्यक्ति की आजादी मिली हुई है. सदन में लोगों की चिंताओं को उठाना प्रत्येक सदस्य का अधिकार है."
राहुल गांधी के लोकसभा भाषण के जिन हिस्सों को हटाया गया, उनमें भाजपा पर उनके आरोप शामिल थे, जिसमें उन्होंने कहा था कि पार्टी अल्पसंख्यकों के साथ गलत व्यवहार कर रही है और हिंसा को बढ़ावा दे रही है. उद्योगपतियों अडानी-अंबानी और अग्निवीर योजना पर कांग्रेस सांसद की टिप्पणियों के कुछ हिस्से भी हटाए दिए गए. कांग्रेस नेता ने शिव की तस्वीर दिखाते हुए कहा कि उनका संदेश 'ना डरो, ना डराओ' का है.

