राजस्थान के कोटा के पास महज दो साल पहले मुकुंदरा बाघ अभयारण्य को शुरू किया गया था और लग रहा था कि यहां सब कुछ सही चल रहा है. यहां, कुल चार बाघ थे, दो नर, दो मादा. उनमें से तीन कहीं और से लाए गए थे, एक खुद चलकर आया था, और इस रेंज में आने के लिए उसे 150 किमी का सफर करना पड़ा. ये चारों वयस्क बाघ रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान के थे और ये सभी यहां अप्रैल, 2018 से अप्रैल, 2019 के बीचे पहुंचे थे. एमटी-2 और एमटी-4 नाम की दोनों बाघिनों ने इस साल मई-जून में शावकों को जन्म दिया था और अधिकारी इसे बाघों का एक और सफल वासस्थान घोषित करने वाले थे.
लेकिन जुलाई के आखिरी 10 दिनों में इस अभयारण्य के चार वयस्कों में से दो बाघों की मौत हो गई (एमटी-2 और एमटी-3, वह नर जो घूमता हुआ यहां आ गया था), एक शावक मारा गया जबकि दूसरे को गंभीर स्थिति में बचाने की कोशिश की गई पर वह भी 17 अगस्त को चल बसा. साथ ही, एमटी-4 और एक नवजात, जिनको मई में ट्रिप कैमरे में देखा गया था, वे भी गुम हैं. राजस्थान के वन और वन्य जीव विभाग के एक आला अधिकारी कहते हैं, ''यह बहुत बड़ा झटका है...हमें इस उद्यान के लिए अपनी रणनीति पर दोबारा विचार करना होगा.'' अधिकारियों को शक है कि इनमें से एक बाघ ने एमटी-2 और उसके एक शावक को मार डाला. दूसरा शावक भी मर चुका है. नर एमटी-3 कथित रूप से एनीमिया का शिकार था और वह किसी वायरस की चपेट में था. मारे गए दोनों वयस्क बाघों में महंगे रेडियो ट्रैकिंग कॉलर लगाए गए थे, पर हास्यास्पद कि सैटेलाइट जीपीएस सिस्टम काम नहीं कर रहा था क्योंकि सरकार ने इसके सब्सक्रिप्शन का नवीकरण नहीं कराया था.
भाजपा सांसद और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) की सदस्य दिया कुमारी कहती हैं, ''इस त्रासदी से मुझे दुख लगा है.'' राजस्थान सरकार ने कुछ अधिकारियों पर कार्रवाई की है, पर उद्यान के सूत्र बताते हैं कि कुछ समय से चीजें ठीक नहीं चल रही थीं.
यह अभयारण्य 2013 में अधिसूचित हुआ था और यह राजस्थान के कोटा, बूंदी, चित्तौडग़ढ़ और झालावाड़ जिलों में 780 वर्ग किमी में फैला हुआ है. इसकी क्षमता 12 बाघों की है और यह रणथंभौर का प्राकृतिक विस्तार है. 2018 में, राजस्थान वन्य जीव विभाग ने दो बाघों को यहां के 80 वर्ग किमी के मशालपुरा इनक्लोजर में स्थानांतरित किया.
इनमें से एक नर (एमटी-1) और एक मादा (एमटी-2) थे. फरवरी, 2019 में एमटी-3 अचानक वहां प्रकट हो गया. इस घुसपैठ से दोनों नरों के बीच तनाव पैदा हो गया. अप्रैल, 2019 में एमटी-4 नाम की बाघिन को यहां लाया गया. उम्मीद थी कि इससे एमटी-3 का ध्यान बंटेगा. आलोचकों का कहना है कि अधिकारियों को इनके बाड़े को आंशिक रूप से तोड़ देना चाहिए था. इससे बाघों के बीच संघर्ष की आशंका कम होती और इससे एमटी-2 बाघिन को एमटी-1 बाघ से असुरक्षित महसूस होने पर अपने शावक छिपाने की जगह मिल जाती. एमटी-3 के पोस्टमॉर्टम से पता चला है कि वह महज 92 किलो का दुबला-पतला बाघ था और लगता है कि वह कुछ समय से बीमार था पर अधिकारी इससे बेखबर थे.
इन मौतों का पता लगने में हुई देरी—एमटी-2 बाघिन की लाश उसकी मौत के 48 घंटों बाद मिली थी—खासकर इतने छोटे क्षेत्र, वह भी बाड़े के भीतर, यह बताता है कि मामले में गंभीर लापरवाही बरती गई. इससे इस बात की पुष्टि होती है कि राज्य में विशेषज्ञ वेटरिनरी डॉक्टरों की कमी समेत बाघ प्रबंधन में भारी खामियां हैं.

