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एयरलाइंस को मिली सरकारी राहत कैसे बन गई एयरपोर्ट ऑपरेटरों की मुसीबत!

एयरलाइन कंपनियों के बाद अब प्राइवेट एयरपोर्ट ऑपरेटर सरकार से मदद की गुहार लगा रहे हैं

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर
अपडेटेड 6 मई , 2026

पश्चिम एशिया में चल रहा नाजुक युद्धविराम (सीजफायर) फिर से टूटने की कगार पर है और खाड़ी क्षेत्र में जीवन को एक बार फिर बुरी तरह प्रभावित करने वाला है. ठीक इसी समय भारतीय विमानन क्षेत्र केंद्र सरकार से मदद की गुहार लगा रहा है.

इस बार समस्या निजी हवाई अड्डा संचालकों की है. युद्ध के कारण हवाई यातायात में आई रुकावट से उनका कारोबार काफी घट गया है. यही वजह है कि निजी हवाई अड्डा ऑपरेटर्स एसोसिएशन (APAO) ने 24 अप्रैल को नागरिक उड्डयन मंत्रालय को पत्र लिखकर मदद की मांग की है.

हवाई अड्डा ऑपरेटर्स एसोसिएशन (APAO) ने अपने पत्र में लिखा है कि सरकार ने हाल में एयरलाइंस के लिए जो राहत पैकेज घोषित किया है, उससे उनके लिए नया संकट खड़ा हो गया है. यह पत्र सरकार द्वारा 8 अप्रैल को जारी किए गए निर्देश के बाद भेजा गया है, जिसमें घरेलू उड़ानों पर लैंडिंग और पार्किंग शुल्क में तीन महीने के लिए 25 फीसद की कमी की गई थी.

यह निर्देश ईरान युद्ध और विमानन टर्बाइन ईंधन (ATF) की कीमतों में वृद्धि के मद्देनजर जारी किया गया था. सरकार का मकसद इस कदम से एयरलाइंस को राहत देना था. हालांकि, इस फैसले का नुकसान हवाई अड्डा संचालकों को भुगतना पड़ा, जिनकी इस प्रक्रिया में कोई भूमिका नहीं थी.

APAO का पत्र एयरलाइंस द्वारा सरकार को लिखे गए समर्थन मांगने वाले पत्र के दो दिन बाद आया. इसकी आपत्ति बहुत सीधी है — घरेलू उड़ानों पर लैंडिंग और पार्किंग शुल्क में 25 फीसद की बिना सोचे-समझे छूट एयरपोर्ट ऑपरेटर्स से कोई चर्चा या सहमति लिए बिना दे दी गई.

साथ ही सरकार के इस फैसले ने एयरपोर्ट्स इकोनॉमिक रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (AERA) की तयशुदा टैरिफ प्रक्रिया को भी पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया है. एसोसिएशन ने इसे 16 साल की नियामकीय स्थिरता के बाद एक उल्लंघन बताया है.

यह और भी महत्वपूर्ण इसलिए है क्योंकि सरकार अभी AAI (एयरपोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया) की और संपत्तियों को निजी हाथों में देने की योजनाएं बना रही है. ऐसे में जो कंपनियां इन एयरपोर्टों को खरीदने या संचालित करने की बोली लगाने वाली हैं, उन्होंने देख लिया है कि संकट के समय सरकार कैसे अपने हिसाब से फैसले लेती है और एयरपोर्ट की कीमतों पर एकतरफा कार्रवाई करती है.

सबसे ज्यादा बोझ उन हवाई अड्डों पर पड़ रहा है, जहां अंतरराष्ट्रीय यातायात ज्यादा है. पश्चिम एशिया में संघर्ष शुरू होने के बाद अंतरराष्ट्रीय यात्रियों की संख्या तेजी से घटी है. इन हवाई अड्डों के अंदर रिटेल दुकानों, लाउंज और अन्य व्यावसायिक सेवाओं में भारी नुकसान हो रहा है. ये नुकसान उड़ान संबंधी नुकसानों से अलग हैं. इन्हें बाद में किसी रेगुलेटरी नियमों के जरिए वसूल नहीं किया जा सकता.

APAO ने इन्हें स्थायी नुकसान बताया है, न कि कोई अस्थायी झटका. इन हवाई अड्डों के अंदर रिटेल कंसेशनेयर और ग्राउंड हैंडलर्स भी एयरपोर्ट ऑपरेटर्स से फीस माफी मांग रहे हैं, जिससे समस्या और बढ़ गई है. इंडिया टुडे के पास उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, तनाव अब नंबर्स में नजर आने लगा है.

दक्षिण भारत के एक हवाई अड्डे पर स्थित एक लाउंज ऑपरेटर ने बताया कि 28 फरवरी को खाड़ी संघर्ष शुरू होने के तुरंत बाद के दो हफ्तों में यात्री आवागमन में 61 फीसद की गिरावट आई. इसके अलावा, एयरपोर्ट पर पिछले साल की तुलना में कुल बिक्री में 58 फीसद की कमी आई. इससे उस लाउंज से 2,300 कम यात्री गुजरे और महज दो हफ्तों में लगभग 17.96 लाख रुपये का राजस्व नुकसान हुआ.

लाउंज ऑपरेटर अब हवाई अड्डा प्राधिकरण को दिए जाने वाले लाइसेंस फीस और फिक्स्ड रेंट (निश्चित किराया) में राहत चाह रहा है. ये खर्चे तब भी चलते रहते हैं जब उड़ानें रद्द हो जाती हैं. दूसरे हवाई अड्डों पर भी यही स्थिति है. इन ऑपरेटर्स का संदर्भ कोविड महामारी के समय AAI के जरिए चलाई गई एक सहायता योजना से है. उस योजना में जब कामकाज लगभग बंद हो गया था, तब कंसेशनेयरों को लाइसेंस फीस में छूट दी गई थी और भुगतान की समय-सीमा बढ़ा दी गई थी. हालांकि, मौजूदा संकट के लिए ऐसी कोई समान योजना अभी नहीं है.

APAO की मांगें बहुत स्पष्ट हैं. यह चाहता है कि राहत अवधि के दौरान अंतरराष्ट्रीय यात्रियों से ली जाने वाली यूजर डेवलपमेंट फीस को बढ़ाया जाए, ताकि एयरपोर्टों को हुए उड़ान संबंधी राजस्व के नुकसान की भरपाई हो सके. APAO ने AAI को दिए जाने वाले राजस्व हिस्सेदारी भुगतान और प्रति यात्री फीस को तीन महीने के लिए बिना ब्याज, बिना जुर्माने के टालने (डिफरमेंट) की मांग की है.

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन टाले गए भुगतानों को कंसेशन एग्रीमेंट के तहत डिफॉल्ट (चूक) न माना जाए. APAO ने यह भी मांग की है कि राहत अवधि समाप्त होने के बाद एयरपोर्ट्स इकोनॉमिक रेगुलेटरी अथॉरिटी (AERA) सभी बकाया नुकसान का पूरा ट्रू-अप (समायोजन) करके शुल्कों में ऊपर की ओर संशोधन करे.

हालांकि, APAO की एक और मांग नागरिक उड्डयन मंत्रालय के अधिकार क्षेत्र में नहीं आती. वह मांग यह है कि राज्य सरकारों को यह निर्देश दिया जाए कि वे ATF (एविएशन टर्बाइन फ्यूल) पर वैल्यू एडेड टैक्स (VAT) को 5 फीसद या उससे भी कम कर दें.

भारतीय विमानन क्षेत्र में राज्य स्तर पर ATF का टैक्स पुरानी समस्या रही है. खाड़ी संघर्ष ने इस मुद्दे को फिर से उठाने का एक नया मौका दे दिया है. इन सबके नीचे जो बुनियादी समस्या है, वह कर्ज से जुड़ी हुई है. भारत के हवाई अड्डे मुख्य रूप से सरकारी बैंकों से लिए गए कर्ज से चलाए जाते हैं. हवाई अड्डा परियोजनाओं का बड़ा आकार और दायरा यह है कि जब इनके नकदी प्रवाह (cash flow) पर दबाव पड़ता है, तो इससे सिर्फ निजी ऑपरेटर्स ही नहीं प्रभावित होते बल्कि बाकी स्टेक होल्डर पर भी असर पड़ता है.

APAO ने साफ-साफ बताया है कि इन सब कारणों से उनके कर्ज चुकाने की क्षमता पर खतरा मंडरा रहा है. अगर युद्ध लंबा चलता रहा या यात्री संख्या जल्दी नहीं बढ़ी, तो समस्या और ज्यादा बढ़ सकती है. ऐसे में एयरपोर्ट ऑपरेटर्स अब अपनी सारी समस्याएं और मांगें खुलकर सामने रख चुके हैं.

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