
अमेरिका-इजरायल के ईरान पर हमले से पहले भारत करीब 75 डॉलर प्रति बैरल की कीमत पर क्रूड ऑयल खरीदता था. अब यह कीमत बढ़कर 112 से 115 डॉलर प्रति बैरल हो गई है. दुनियाभर के बाजारों में तेल की कीमतें बढ़ने के बावजूद फिलहाल देश में आम लोगों के लिए पेट्रोल और डीजल के दाम नहीं बढ़े हैं.
इस बीच केंद्र की मोदी सरकार ने तेल कंपनियों को राहत देने के लिए पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में 10 रुपए प्रति लीटर की कटौती कर दी है. केंद्र के इस फैसले से सरकारी खजाने पर रोजाना करीब 450 करोड़ रुपए का अतिरिक्त बोझ पड़ने की संभावना है.
ऐसे में सवाल उठता है कि सरकार ने तेल कंपनियों के हित में यह फैसला क्यों लिया और क्या इससे तेल संकट टल गया है? एनर्जी एक्सपर्ट नरेंद्र तनेजा व अन्य विशेषज्ञों के जरिए इन सवालों के जवाब जानते हैं:
ईरान जंग के बीच तेल संकट भारत के लिए कितनी बड़ी चुनौती है?
एनर्जी एक्सपर्ट नरेंद्र तनेजा का कहना है कि चीन को छोड़कर पूरी दुनिया पर ईरान जंग का असर दिख रहा है. एनर्जी एनालिटिक्स फर्म वोर्टेक्सा के मुताबिक, चीन के पास दुनिया का सबसे बड़ा 1.2 अरब बैरल (16 से 17 करोड़ मीट्रिक टन) तेल भंडार है. इसी कारण चीन को ज्यादा समस्या नहीं है. उसने जंग से पहले ही हर रोज लाखों बैरल तेल खरीदकर स्टॉक कर लिया था.
तनेजा कहते हैं कि भारत में 'स्ट्रेटेजिक' तेल भंडार की क्षमता करीब 53 लाख मीट्रिक टन है. इन्हें देश के तीन स्थानों- मंगलुरू, पादुर और विशाखापट्टनम में रखा जाता है. जहां तक वर्तमान तेल स्टॉक की बात है, तो इसका जवाब केंद्रीय मंत्री ने संसद में दिया है.
23 मार्च 2026 को पेट्रोलियम मामलों के राज्य मंत्री सुरेश गोपी ने संसद को बताया कि भारत के रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार (SPR) 64 प्रतिशत भरे हुए हैं. मौजूदा खपत दर के हिसाब से यह भंडार करीब पांच दिनों का है. हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि भारत के पास स्ट्रेटेजिक के अलावा कमर्शियल स्टॉक भी है. अगर दोनों को मिला दिया जाए तो देश के पास करीब 60 दिनों का तेल स्टॉक उपलब्ध है.
नरेंद्र तनेजा बताते हैं कि भारत के लिए यह चुनौती काफी बड़ी है क्योंकि देश अपनी जरूरत का करीब 88 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है. इस आयात का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा खाड़ी देशों पर निर्भर है. जंग के कारण खाड़ी देशों से सप्लाई चेन बाधित है, जिससे चुनौतियां कम होने के बजाय बढ़ती जा रही हैं. हालांकि, तनेजा कहते हैं कि हमें घबराने की जरूरत नहीं है क्योंकि अंगोला समेत अन्य देशों से भी तेल खरीदने की प्रक्रिया शुरू हो गई है.

केंद्र ने तेल संकट के बीच कंपनियों को एक्साइज ड्यूटी में छूट क्यों दी?
एनर्जी एक्सपर्ट नरेंद्र तनेजा के अनुसार, इस छूट की एक वजह तो साफ है कि आम उपभोक्ताओं पर तेल की बढ़ी कीमतों की आंच न आए. हालांकि, इसके पीछे एक बड़ी तकनीकी वजह भी है. दुनियाभर के बाजारों में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ रही हैं. तेल कंपनियों की जिम्मेदारी है कि वे हर हाल में कच्चा तेल खरीदकर देश में लाएं और उसे रिफाइन कर हर शहर और कस्बे तक पहुंचाएं.
ऐसे में यदि तेल कंपनियों की बैलेंस शीट और आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं होगी, तो वे काम नहीं कर पाएंगी. इसे ऐसे समझिए कि जब ये कंपनियां विदेशी विक्रेताओं से उधार (क्रेडिट) पर तेल मांगती हैं, तो वे कंपनियां इनकी फाइनेंशियल हेल्थ देखती हैं.
अगर तेल कंपनियों की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होगी तो उन्हें उधार पर तेल नहीं मिलेगा, जिससे देश में तेल स्टॉक करने की क्षमता घट जाएगी. इस फैसले से सरकार ने 'एक तीर से दो निशाने' साधे हैं. एक तरफ कीमतों को नियंत्रित कर महंगाई रोकने की कोशिश की गई है, वहीं दूसरी तरफ भारतीय तेल कंपनियों की अंतरराष्ट्रीय साख भी मजबूत बनी रहेगी.
केंद्र के इस फैसले से तेल कंपनियों को कितनी राहत मिली है?
केंद्र सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क (SAED) में 10 रुपए प्रति लीटर की कमी की है. इससे डीजल पर यह शुल्क शून्य और पेट्रोल पर घटकर 3 रुपए प्रति लीटर रह गया है. हालांकि, इस फैसले से ग्राहकों के लिए पंप पर कीमतें कम नहीं होंगी.
पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि एक्साइज ड्यूटी में कटौती से तेल कंपनियों (IOCL, BPCL, HPCL) के नुकसान में कमी आएगी. ये कंपनियां वर्तमान में भारतीय उपभोक्ताओं को लागत से काफी कम कीमत पर तेल बेच रही हैं.
केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने हाल ही में कहा था कि अंतरराष्ट्रीय कीमतों के अनुसार तेल कंपनियों को पेट्रोल पर लगभग 24 रुपए और डीजल पर 30 रुपए प्रति लीटर का नुकसान हो रहा है. इस तरह ये कंपनियां हर दिन ₹2,400 करोड़ का घाटा खुद उठा रही हैं.
तनेजा बताते हैं कि सामान्य पेट्रोल पर कुल एक्साइज ड्यूटी ₹21.9 प्रति लीटर थी, जबकि डीजल पर ₹17.8 प्रति लीटर. इसमें स्पेशल एडिशनल एक्साइज ड्यूटी (SAED) का हिस्सा सबसे बड़ा था. कटौती के बाद पेट्रोल पर कुल एक्साइज ड्यूटी अब ₹11.9 और डीजल पर ₹7.8 प्रति लीटर रह गई है.
तनेजा का मानना है कि भले ही सरकार रोजाना 400 करोड़ रुपए की मदद दे रही है, लेकिन इससे कंपनियों का पूरा घाटा खत्म नहीं होगा. हां, यह जरूर है कि हालात सामान्य होने पर कंपनियां दोबारा मुनाफे की स्थिति में आ सकेंगी.
सरकार के फैसले का केंद्रीय खजाने पर कितना असर पड़ेगा?
केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर और सीमा शुल्क बोर्ड (CBIC) के अध्यक्ष विवेक चतुर्वेदी ने एक इंटरव्यू में बताया कि उत्पाद शुल्क में कटौती से अगले 15 दिनों में सरकारी खजाने को ₹7000 करोड़ का नुकसान होने की आशंका है.
उन्होंने कहा कि सरकार ने डीजल के निर्यात पर शुल्क बढ़ाकर 21.5 रुपए और एटीएफ पर 29.5 रुपए प्रति लीटर कर दिया है. इस बढ़ोतरी से खजाने में 1,500 करोड़ रुपए आने की उम्मीद है, जिससे उत्पाद शुल्क में कटौती के बोझ को कुछ हद तक कम किया जा सकेगा.
कुल मिलाकर केंद्रीय राजस्व पर 15 दिनों में 5,500 करोड़ रुपए का शुद्ध बोझ पड़ेगा. इस हिसाब से सालाना खजाने पर करीब 1.60 लाख करोड़ रुपए तक का बोझ पड़ सकता है. मतलब साफ है कि सरकार रोजाना करीब 450 करोड़ रुपए की छूट तेल कंपनियों को दे रही है.
क्या एक्साइज ड्यूटी घटने से आम लोगों को कोई फायदा होगा?
HPCL के पूर्व चेयरमैन एमके सुराना के मुताबिक, इस कटौती का फायदा जनता को इस रूप में मिलेगा कि कीमतें फिलहाल और नहीं बढ़ेंगी. हालांकि, पेट्रोल-डीजल के दाम कम होने की संभावना बहुत कम है.
इसका मुख्य कारण यह है कि कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के पार होने की वजह से कंपनियां पहले से ही घाटे में हैं. वर्तमान प्राथमिकता इस घाटे की भरपाई करना है न कि उपभोक्ताओं को बचत का लाभ देना. नकदी प्रवाह (Cash flow) पर दबाव के कारण कीमतों में कमी की उम्मीद फिलहाल नहीं की जा सकती.
क्या तेल संकट टल गया है या भीषण दौर अभी आने वाला है?
नरेंद्र तनेजा इसे दुनिया का 'पहला ऊर्जा विश्वयुद्ध' बताते हैं. उनके अनुसार भविष्य का सटीक अनुमान लगाना कठिन है. यदि अमेरिका ईरान के 'खर्ग द्वीप' पर सैन्य कार्रवाई करता है, तो वैश्विक तेल आपूर्ति ठप हो सकती है, क्योंकि ईरान का 90 प्रतिशत तेल यहीं से निकलता है. फिलहाल बाजार में 20 प्रतिशत तेल की आपूर्ति पहले ही प्रभावित है.
तनेजा के मुताबिक अगर होर्मुज स्ट्रेट बंद होती है, तो कच्चे तेल की कीमत 150 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकती है. ऐसी स्थिति में सरकार की मौजूदा मदद बहुत कम साबित होगी और कंपनियां कीमतें बढ़ाने पर मजबूर हो जाएंगी.
एमके सुराना भी मानते हैं कि जब तक युद्ध जारी रहेगा, कच्चे तेल के दाम ऊंचे रहेंगे. खाड़ी देशों में सप्लाई चेन की समस्याओं के कारण उत्पादन की किल्लत बनी रहेगी. इसलिए फिलहाल उपभोक्ताओं को सस्ता ईंधन मिलने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए.

