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सऊदी अरब में सेना भेजकर फंस गया पाकिस्तान?

पश्चिम एशिया में जारी जंग के बीच पाकिस्तान ने सऊदी अरब में भारी संख्या में सैन्य तैनाती की है जो जियोपॉलिटिक्स के लिहाज से बड़ी चिंता का कारण है

सऊदी में पाकिस्तानी सेना की तैनाती (सांकेतिक तस्वीर)
सऊदी में पाकिस्तानी सेना की तैनाती (सांकेतिक तस्वीर)
अपडेटेड 26 मई , 2026

पाकिस्तान ने सऊदी अरब में बड़ी संख्या में सैन्य टुकड़ियों की तैनाती की है. इनमें लड़ाकू विमानों से लेकर अत्याधुनिक हथियारों से लैस हजारों सैनिक शामिल हैं. वेस्ट एशिया में ईरान पर अमेरिका-इजरायल हमलों के बाद जारी जंग के बीच यह खबर सामने आई है.

वेस्ट एशिया की भू-राजनीतिक अनिश्चितता के बीच पाकिस्तान के जोखिम भरे रणनीतिक रुख ने नई चिंताएं पैदा कर दी हैं. पाकिस्तान की ओर से सऊदी अरब में चीनी मूल के JF-17 थंडर विमान, पाकिस्तानी सेना की 25वीं मैकेनाइज्ड डिवीजन और संबंधित अत्याधुनिक हथियार तैनात किए गए हैं.

यहां जानना जरूरी है कि मैकेनाइज्ड डिवीजन में थल सेना की एक ऐसी सैन्य टुकड़ी होती है, जिसमें पैदल सैनिकों को बख्तरबंद वाहनों के जरिए युद्ध के मैदान में ले जाया जाता है. इन सैनिकों के पास आधुनिक युद्धक वाहन होते हैं, जिससे इन्हें उच्च गतिशीलता और भारी मारक क्षमता होती हैं.

एक्सपर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान का यह फैसला हाल के वर्षों में उसकी सबसे महत्वपूर्ण सैन्य प्रतिबद्धताओं (कमिटमेंट) में से एक के रूप में देखा जा रहा है. यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है, जब ईरान और अमेरिका-इज़राइल के बीच संभावित सैन्य टकराव की अटकलें तेज हैं. डिफेंस एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस फैसले के दूरगामी परिणाम न केवल पश्चिम एशिया की स्थिरता पर बल्कि पाकिस्तान की घरेलू सुरक्षा व्यवस्था पर भी पड़ सकते हैं.

पाकिस्तान की नाजुक रणनीति

पाकिस्तान की सैन्य तैनाती के ढांचे ने डिफेंस एक्सपर्ट्स का विशेष रूप से ध्यान आकर्षित किया है. रिपोर्ट के मुताबिक, इस्लामाबाद ने मुख्य रूप से JF-17 थंडर विमानों का एक स्क्वाड्रन (लगभग 16 विमान) तैनात किया है. डिफेंस एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह तैनाती एक सुनियोजित योजना और रणनीति का हिस्सा है.

पाकिस्तान और चीन के संयुक्त रूप से विकसित JF-17 कार्यक्रम रणनीतिक संवेदनशीलता के दायरे में संचालित होता है. ऐसा इसलिए क्योंकि चीन के ईरान के साथ गहरे आर्थिक और राजनयिक संबंध हैं. एक्सपर्ट्स का मानना है कि पाकिस्तान, ईरान से जुड़े किसी भी प्रत्यक्ष टकराव में चीनी समर्थित विमानों को तैनात करने से हिचकिचा सकता है.

मतलब साफ है कि JF-17 की छोटी टुकड़ी की तैनाती का मुख्य मकसद सऊदी अरब की सीमा के अंदर महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों की रक्षा करना और हवाई गश्त करना है. वहीं, किसी हमले की स्थिति में अधिक भार पाकिस्तान के F-16 बेड़े पर पड़ सकता है क्योंकि आक्रामक अभियानों में मुख्य रूप से इन्हीं विमानों का इस्तेमाल किया जा सकता है.

इस स्थिति ने पाकिस्तान को कूटनीतिक रूप से नाजुक मोड़ पर ला खड़ा किया है. अमेरिकी मूल के F-16 लड़ाकू विमानों को पाकिस्तानी पायलटों के जरिए पश्चिम एशिया में सैन्य अभियानों के लिए इस्तेमाल करने से पाकिस्तान के अन्य देशों के साथ संबंध खराब हो सकते हैं. खासकर इस फैसले से पाकिस्तान के चीन और ईरान के साथ संबंध भी कमजोर पड़ सकते हैं.

जमीनी सैनिक, अधिक गहरी भागीदारी

जमीनी स्तर पर सऊदी अरब में पाकिस्तान की सैन्य तैनाती और भी महत्वपूर्ण है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, पाकिस्तान ने अपनी 25वीं मैकेनाइज्ड डिवीजन के अधिकांश हिस्से (एक ब्रिगेड को छोड़कर) सऊदी अरब भेज दिए हैं.

यहां समझने वाली बात यह है कि पाकिस्तान ने यह तैनाती किसी प्रशिक्षण के लिए नहीं की है. उसने एक मैकेनाइज्ड डिवीजन भेजी है जो आमतौर पर युद्ध अभियानों के लिए तैयार रखी जाती है. इसका ढांचा ही ऐसा होता है कि यह किसी भी लड़ाई या संघर्ष के लिए तुरंत तैयार रहती है.

डिफेंस एक्सपर्ट्स का कहना है कि इस टुकड़ी का मुख्य उद्देश्य सऊदी-यमन सीमा पर सऊदी ठिकानों को मजबूत और सुरक्षित करना है, जहां हूती हमलों और सीमा पार अस्थिरता लगातार चुनौती बनी हुई है. अगर यह बात साबित हो जाती है, तो यह तैनाती यमन संघर्ष में पाकिस्तान की सबसे प्रत्यक्ष सैन्य भागीदारी में से एक होगी.

आलोचकों का कहना है कि वेस्ट एशिया में पाकिस्तान की बढ़ती सैन्य भूमिका उसे क्षेत्रीय संघर्षों में फंसने का गंभीर खतरा पैदा कर रही है. यह संघर्ष सांप्रदायिक (शिया-सुन्नी) और भू-राजनीतिक दोनों रूप से बेहद संवेदनशील है. इसके दूरगामी प्रभाव पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था और घरेलू सुरक्षा व्यवस्था पर भी पड़ सकते हैं.

खतरे में पाकिस्तान का आंतरिक सुरक्षा

विदेशों में तैनाती से पाकिस्तान की घरेलू रक्षा व्यवस्था पर पड़ने वाले संभावित दबाव को लेकर बहस एक बार फिर तेज हो गई है. विदेश में एक बड़ी मैकेनाइज्ड डिवीजन और अपनी सबसे ताकतवर एयरक्राफ्ट (JF-17 स्क्वाड्रन) को तैनात करके पाकिस्तान एक बड़ा जोखिम उठा रहा है.

खासकर ऐसे समय में जब वह उग्रवाद, सीमा तनाव और आर्थिक अस्थिरता से जूझ रहा है. सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि मई 2025 के संघर्ष के बाद भारत के साथ पाकिस्तान की पूर्वी सीमा बेहद संवेदनशील बनी हुई है. ऐसे में अगर कोई नया टकराव बढ़ता है तो यह पाकिस्तान की सेना के लिए बड़ी परीक्षा बन सकती है. भारत के खिलाफ लंबे समय से परोक्ष आतंकवादी समूहों के इस्तेमाल के संदर्भ में यह मुद्दा और भी गंभीर हो जाता है.

डिफेंस एक्सपर्ट्स का मानना है कि दक्षिण एशिया के रणनीतिक माहौल में काफी बदलाव आया है. भारत अब सीमा पार से होने वाले किसी भी हमले का सैन्य जवाब देने की अपनी तत्परता का साफ संकेत दे रहा है. पिछले मई में चलाया गया ऑपरेशन सिंदूर इसका सबसे ताजा उदाहरण है.

मौजूदा भू-राजनीतिक परिस्थितियों में पहले की तरह सुनियोजित तरीके से तनाव बढ़ाना और फिर हमलों से इनकार करना अब कारगर नहीं रह गया है. पाकिस्तान स्थित समूहों से जुड़ा कोई भी बड़ा आतंकवादी हमला इस समय भारत की ओर से तुरंत और सख्त जवाबी कार्रवाई को उकसा सकता है. खासकर तब जब इस्लामाबाद की सैन्य क्षमता पहले से ही सीमित है.

एक्सपर्ट्स कहते हैं कि पाकिस्तान के जरिए सऊदी में सैनिक भेजने का सबसे बुरा असर यह पड़ा है कि पाकिस्तान के अंदर ही सुरक्षा की कमी हो गई है. अपनी इस खुद बनाई कमजोरी में पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI भारत के खिलाफ आग से खेल रही है. पहले भी ISI भारत के खिलाफ आतंकवादी गुटों को इस्तेमाल करके हमले करवाती रही है और फिर यह कहती रही है कि उसका कोई लेना-देना नहीं है.

एक्सपर्ट्स कहते हैं कि इस्लामाबाद को अब भारत की नई नीति की सच्चाई समझ लेनी चाहिए. पाकिस्तान की सेना अभी काफी कमजोर है इसलिए वह भारत के साथ कोई भी लड़ाई नहीं लड़ सकता. पाकिस्तान को अपने आतंकवादी एजेंटों पर फौरन काबू करना चाहिए, वरना उनमें से कोई एक भी गलती कर बैठा तो भारत बहुत तेज और भारी सैन्य जवाब दे सकता है.

ईरान ने दांव बढ़ा दिया है

इस तैनाती का शायद सबसे अहम पहलू टाइमिंग है. पाकिस्तानी सेना की सऊदी अरब में एंट्री ईरान के परमाणु और सैन्य ढांचे पर संभावित सैन्य कार्रवाई की अटकलों के बीच हुई है. ऐसे में ईरान के पश्चिमी हिस्से पर पाकिस्तान की स्थिति का बारीकी से विश्लेषण किया जा रहा है.

एक्सपर्ट्स का कहना है कि पाकिस्तान पर ईरान की रणनीतिक घेराबंदी में जानबूझकर या अनजाने में योगदान देने का आरोप लग सकता है. इस तरह की धारणाएं पाकिस्तान-ईरान संबंधों को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती हैं जो ऐतिहासिक रूप से सहयोग और आपसी संदेह के बीच उतार-चढ़ाव भरे रहे हैं. खासकर सीमा सुरक्षा और सांप्रदायिक उग्रवाद के मुद्दों पर.

ईरान से जुड़े किसी भी क्षेत्रीय युद्ध के पाकिस्तान पर घरेलू स्तर पर गंभीर प्रभाव पड़ सकते हैं. कमजोर अर्थव्यवस्था, सांप्रदायिक अस्थिरता और आंतरिक सुरक्षा चुनौतियां पाकिस्तान को ऐसे प्रभावों के प्रति काफी ज्यादा संवेदनशील बनाती हैं. पश्चिम एशिया में लंबा संघर्ष ऊर्जा आपूर्ति बाधित कर सकता है, शरणार्थी संकट पैदा कर सकता है और इस्लामाबाद के मौजूदा वित्तीय संकट को और गहरा कर सकता है.

जोखिम भरा पाकिस्तान का फैसला

दशकों से पाकिस्तान ने खाड़ी देशों, खासकर सऊदी अरब के साथ घनिष्ठ सैन्य संबंध बनाए रखे हैं. अक्सर वह सऊदी अरब से मिलने वाले आर्थिक समर्थन और रणनीतिक सहयोग के बदले प्रशिक्षण, सुरक्षा सहायता और सैन्य बल प्रदान करता रहा है.

हालांकि, एक्सपर्ट्स का कहना है कि मौजूदा तैनाती समय और परिस्थितियों के हिसाब से पहले की तैनातियों से काफी अलग है. आलोचकों का तर्क है कि पाकिस्तान इस फैसले से एक भीषण क्षेत्रीय संघर्ष में उलझ सकता है.

उसके रवैये को देखकर लगता है कि वह इन रणनीतिक जोखिमों को कम आंक रहा है. कई क्षेत्रीय एक्सपर्ट्स का मानना है कि पाकिस्तान के सामने अब दो महत्वपूर्ण विकल्प हैं- पहला, विदेशों में अपनी सैन्य प्रतिबद्धताओं का विस्तार जारी रखना; दूसरा, आंतरिक स्थिरता को प्राथमिकता देते हुए क्षेत्रीय तनाव कम करने पर ध्यान केंद्रित करना.

खाड़ी देशों में तनाव लगातार बढ़ रहा है, ऐसे में पाकिस्तान के इस कदम न केवल पाकिस्तान की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए, बल्कि दक्षिण एशिया से लेकर मध्य पूर्व तक फैले व्यापक शक्ति संतुलन के लिए भी गंभीर संकट पैदा कर दिए हैं. आखिरकार पाकिस्तान का यह सैन्य दांव उसकी आर्थिक कमजोरी, रणनीतिक असुरक्षा और भू-राजनीतिक संकट के बीच फंसी एक देश की स्थिति को ही दिखाता है.

सऊदी अरब की यह तैनाती ताकत का प्रदर्शन करने के बजाय यह दिखाती है कि पाकिस्तान बाहरी देशों पर कितना निर्भर हो गया है और उसकी अपनी रणनीति कितनी कमजोर है.

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