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प्याज की कीमत अचानक कैसे बढ़ गई? राहत मिलने के आसार कब तक हैं?

एक नवंबर को यूपी और आसपास के कई राज्यों की मंडियों में प्याज की थोक कीमत 40-50 रुपए प्रति किलो थी जो दुकानों में पहुंचते-पहुंचते दोगुनी हो गई

प्याज का फुटकर दाम 80 से 100 रुपए किलो तक पहुंच चुका है
प्याज का फुटकर दाम 80 से 100 रुपए किलो तक पहुंच चुका है
अपडेटेड 2 नवंबर , 2023

टमाटर की खटास कम हुए कुछ ही दिन हुए थे कि प्याज आंसू की वजह बनने लगा है. लखनऊ की प्रमुख सब्जी मंडी में आढ़तिये का काम करने वाले राजेंद्र सोनकर पिछले दस वर्षों से थोक में प्याज की बिक्री करते आ रहे हैं. एक महीने पहले तक वे 50 क्विंटल प्याज रोज बेचते थे. लेकिन पिछले तीन दिनों से आधी भी बिक्री नहीं हो पा रही है.

राजेंद्र बताते हैं कि एक तो प्याज की आवक कम हो गई है तो इसके चलते दाम में बढ़ोतरी होने से भी ग्राहक प्याज से मुंह मोड़ रहे हैं.अगर रेंस्टोंरेंट और होटल वाले प्याज ना खरीदें तो व्यापार में काफी घाटा हो सकता है. लखनऊ समेत उत्तर प्रदेश की ही नहीं दिल्ली, हरि‍याणा, राजस्थान की कई सब्जी मंडियों में प्याज का फुटकर दाम 80 से 100 रुपए किलो से ऊपर पहुंच चुका है.

जिस रफ्तार से प्याज के दाम बढ़ रहे हैं, उस हिसाब से इसी सप्ताह दाम शतक लगा सकते हैं. राजेंद्र बताते हैं, "इस बार सावन दो महीने का था इस कारण एक बड़ी आबादी ने नॉनवेज से परहेज किया और उसके बाद पितृपक्ष और नवरात्र‍ि के चलते प्याज की मांग में काफी कमी रही. इस दौरान बारिश की असामान्य स्थ‍िति के चलते प्याज की पैदावार भी कम रही. लेकिन प्याज की मांग न होने से रेट नियंत्रण में रहे. अब नवरात्रि के समाप्त होने से अचानक प्याज की मांग बढ़ी. इस मांग को पूरा करने के लिए किसान के पास प्याज ही नहीं था. इसी कारण प्याज का दाम तेजी से आसमान छूने लगा है."

प्याज की थोक और खुदरा दरों में काफी अंतर है. 1 नवंबर को यूपी और आसपास के कई राज्यों की मंडियों में प्याज की थोक कीमत केवल 40-50 रुपए प्रति किलो थी. लेकिन सब्जी विक्रेताओं और दुकानों तक पहुंचते-पहुंचते यह दोगुनी हो गई. यूपी में प्याज की कुल खपत का 40% से भी कम उत्पादन होता है. राज्य में इसकी खेती 29940 हेक्टेयर भूमि पर की जाती है, जिससे 13 लाख मीट्रिक टन की वार्षिक मांग के मुकाबले सालाना केवल 5 लाख मीट्रिक टन प्याज का उत्पादन होता है.

यह घाटा महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और आंध्र प्रदेश जैसे अन्य राज्यों से खरीद से पूरा होता है. यूपी में सबसे ज्यादा प्याज की खेती और कटाई रबी मौसम में अप्रैल-मई में की जाती है. अकेले यूपी में नवंबर में खरीफ सीजन में लगभग 90,000 मीट्रिक टन प्याज का उत्पादन होता है और ख़रीफ़ प्याज को दूसरे राज्यों से आयात करना पड़ता है. किसान नेता हरिनाम सिंह वर्मा बताते हैं, "यूपी में मुख्य रूप से प्याज पुणे, नासिक से आता है. इंदौर, करनाल और झांसी-बांदा की बेल्ट में भी इसकी खेती होती है."

महाराष्ट्र में प्याज की नर्सरी समय से पहले और यूपी में देर से लगाई जाती है, यही वजह है कि महाराष्ट्र में पैदावार जल्दी और यूपी में देर से होती है. सितंबर के अंतिम दिनों में महाराष्ट्र में प्याज की खुदाई का समय था. उसी वक्त आंधी-पानी से प्याज खराब हो गया. महाराष्ट्र में प्याज की एन53 किस्म लगाई जाती है. इसमें सामान्य दिनों में बीमारियां कम लगती हैं, लेकिन यह बारिश का बोझ सहन नहीं कर पाती. "बारिश में प्याज की फसल खराब हो जाने के चलते यूपी में सप्लाई बाधित हुई और दाम तेजी से बढ़ने लगे क्योंकि यूपी की फसल तो अभी खेतों में ही है और इसे बाजार में आने में समय लगेगा. इस वक्त इंदौर-शिवपुरी और नासिक से प्याज आ रहा है."

हरिनाम सिंह वर्मा के मुताबिक राजस्थान और कर्नाटक से दिसंबर से नए प्याज की आवक शुरू होगी तो प्याज की कीमतें गिरेंगी. कृषि विभाग के अधिकार रमेश राय बताते हैं, "नवंबर-दिसंबर आमतौर पर एक कमजोर मौसम होता है जब राज्य में अप्रैल-मई में काटी गई रबी प्याज का स्टॉक समाप्त हो जाता है और खरीफ प्याज की आपूर्ति अन्य राज्यों, मुख्य रूप से महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश से आने लगती है. इस साल, अनियमित मॉनसून के कारण महाराष्ट्र और एमपी से प्याज की आवक बाधित हुई है, जिससे वहां प्याज का उत्पादन प्रभावित हुआ है. आने वाले दिनों में आयात बढ़ने से स्थिति में सुधार हो सकता है."

लखनऊ के विद्यांत कालेज में अर्थशास्त्र विभाग के प्रोफेसर मनीष हिंदवी बताते हैं, "जिस फसल का दाम कम मिलता है, एक दो-साल बाद किसान उस फसल को बोना छोड़कर दूसरी फसल की खेती शुरू कर देते हैं. यही प्याज के साथ भी हुआ है. कोविड काल के बाद से किसान प्याज के कम दाम को लेकर सरकार से गुहार लगा रहे थे कि 10 रुपए प्रति किलो से कम मूल्य पर उनकी कीमत नहीं निकल पा रही है. लेकिन सरकार ने किसानों की समस्याओं पर कोई तवज्जो नहीं दी. यही कारण है कि यूपी में बड़ी संख्या में किसानों ने प्याज की खेती से मुंह मोड़ा और उसका नतीजा अब दिख रहा है." मनीष हिंदवी के मुताबिक प्याज की फसल की उत्पादन लागत के मुताबिक उस पर मुनाफा जोड़कर सरकार को उसका एक 'एश्योर्ड प्राइस' तय करना चाहिए. वरना यही हाल रहेगा.

हालांकि किसान नेता प्याज की काला बाजारी भी अचानक दाम बढ़ने के पीछे की मुख्य वजह बताते हैं. अवध क्षेत्र के किसान नेता राम अवतार यादव बताते हैं, "पिछले महीने दाम कम होने पर प्याज के बढ़े आढ़ती मुनाफाखोरी के लिए महाराष्ट्र से प्याज खरीदकर उसका भंडारण कर चुके हैं. त्योहार के नजदीक आते ही बाजार में जैसे प्याज की कीमत बढ़ी है, वे धीरे-धीरे अपना माल निकाल रहे हैं. यही सिंडीकेट रोजाना प्याज के थोक भाव तय कर रहा है." 31 अक्टूबर को नासिक में प्याज 50 रुपए प्रति किलो के आसपास था जबकि लखनऊ में यह 80 रुपए किलो में बिका. नासिक से लखनऊ तक एक किलो प्याज पर लगभग पांच रुपए का ट्रक किराया आता है. इस तरह लखनऊ में 60 रुपए प्रति किलो से अधिक प्याज का रेट नहीं होना चाहिए था. प्याज को पहले से स्टोर करने वाले सिंडिकेट ने ही यह दाम 80 रुपए प्रति किलो तय किया है."

प्याज की लगातार बढ़ती कीमतें अब राजनीतिक रंग लेने लगी हैं. इससे सतर्क योगी सरकार ने उपभोक्ताओं को राहत देने के प्रयास भी तेज कर दिए हैं. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के निर्देश पर राज्य कृषि उत्पादन बाजार बोर्ड (मंडी परिषद) उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए अपनी मंडियों से थोक दर पर प्याज बेचने पर विचार कर रहा है. मंडी परिषद के निदेशक अंजनी कुमार सिंह के मुताबिक जल्द ही सभी जिलों की मंडियों से प्रति व्यक्ति 1 किलोग्राम तक थोक दर पर प्याज की बिक्री की व्यवस्था की जाएगी.

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