
“पूरे देश में लगभग एक करोड़ औरतें सरकार की विभिन्न योजनाओं में काम कर रही हैं. ये आशा कार्यकर्ता हैं, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता हैं, मिड-डे मील रसोइया हैं और अलग-अलग राज्य सरकारों में काम करने वाली औरतें हैं. अमूमन सरकारें इन्हें वॉलेंटियर मानती हैं, समझती हैं कि ये कोई खास काम नहीं करतीं. इसलिए इन्हें पारिश्रमिक नहीं देतीं, पारितोषिक देती हैं. इन्हें कामगार नहीं, स्वयंसेवक मानती हैं. मगर सच यह है कि इनमें से ज्यादातर रोज छह से आठ घंटे तक मेहनत करती हैं. आशा कर्मियों को तो रोजाना सातों दिन, चौबीसों घंटे ड्यूटी पर अलर्ट रहना पड़ता है. सरकारों को इनके श्रम का सम्मान करना चाहिए. इन्हें श्रमिक मानना चाहिए और इन्हें सरकारी कर्मी का दर्जा, वाजिब मेहनताना, पीएफ और दूसरी सुविधाएं देनी चाहिए. हम सरकार से यह मांग करते हैं और इस मांग को लेकर हम आने वाले दिनों में संघर्ष करेंगे.” ऑल इंडिया स्कीम वर्कर्स फेडरेशन की नवनियुक्त महासचिव शशि यादव इंडिया टुडे से बातचीत में यह कहती हैं.
उनके पीछे पटना की प्रसिद्ध गेट लाइब्रेरी के आंगन में एक विशाल पंडाल के नीचे देश के 13-14 राज्यों से इन स्कीम वर्करों की प्रतिनिधि आई हैं और वे अपने हक के लिए आवाज उठा रही हैं. पूरे देश में यह पहला मौका है जब इतनी सारी महिला स्कीम वर्कर अपने हक के लिए एकजुट हुई हैं और उन्होंने पटना में अपने फेडरेशन का पहला राष्ट्रीय सम्मेलन किया है.
एक्टू(आल इंडिया सेंट्रल काउंसिल ऑफ ट्रेड यूनियन) से संबद्ध इस फेडरेशन के देश भर से आईं छह सौ के करीब स्कीम वर्कर प्रतिनिधियों ने पटना में 9-10 सितंबर, 2023 को चले अपने इस सम्मेलन में अपनी नई कार्यकारिणी तो चुनी ही, उन्होंने कई राजनीतिक प्रस्ताव भी पारित किए.

उन्होंने तय किया कि तमाम स्कीम वर्कर्स को सरकारी कर्मी का दर्जा दिया जाए, उन्हें सरकारी कर्मचारी जैसा वेतनमान और ईपीएफ, ग्रेच्युटी और पेंशन का लाभ मिले. अक्टूबर से दिसंबर तक पूरे देश में स्कीम वर्कर्स के अधिकारों को लेकर अभियान चलाया जाएगा. इस मुद्दे पर केंद्र सरकार को घेरने के लिए सम्मेलन में दिल्ली चलो का नारा दिया है, इसकी तारीख बाद में घोषित होगी. इस मुद्दे पर राष्ट्रीय हड़ताल का आह्वान किया जाएगा. उन्होंने यूपी और हरियाणा में चल रहे आशाओं के आंदोलन का समर्थन किया.
दरअसल यह फेडरेशन मानता है कि देश भर में इन कर्मियों को उनका हक देने की जिम्मेदारी केंद्र सरकार की है, जबकि सरकार इस जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ रही है. शशि यादव कहती हैं, "21 नवंबर, 2022 को हमने इसी मुद्दे पर दिल्ली में प्रदर्शन किया था और केंद्र सरकार को मांग पत्र सौंपा था. मगर हमें जवाब मिला, राज्य सरकार इन कर्मियों को कुछ भी देने के लिए स्वतंत्र है. इसका मतलब यह है कि केंद्र इन जिम्मेदारियों से पल्ला झाड़ रहा है, जबकि ये तमाम लोग केंद्र सरकार की योजना से जुड़े हुए हैं. हमें ऐसा भी लगता है कि धीरे-धीरे इस योजना को भी बंद करने की साजिश है. इसलिए हम पूरे देश के स्कीम वर्करों को एकजुट कर केंद्र सरकार से इन्हें न्याय दिलाने की मांग करेंगे."
इस संगठन को हाल ही में बिहार में मिली जीत से भी ताकत मिली है. बिहार में अब तक आशा कार्यकर्ताओं को वॉलेंटियर ही माना जाता था. मगर आशा कार्यकर्ताओं ने एकजुट होकर लगभग एक महीने तक लड़ाई की. काम ठप रखा और जिलों से लेकर राजधानी पटना तक आंदोलन किया. इसके बाद राज्य सरकार ने इनके मानदेय को 2500 रुपए करने की घोषणा की.
इस मौके पर एक्टू के राष्ट्रीय अध्यक्ष वी. शंकर कहते हैं, “सरकार इनसे काम पूरा लेती है, मगर इन्हें न्यूनतम वेतन भी नहीं देती. पूरे देश में न्यूनतम वेतन 15 हजार रुपए है. इन्हें वेज सिक्योरिटी, जॉब सिक्योरिटी और सोशल सिक्योरिटी चाहिए. दिक्कत यह है कि सरकार इन्हें मजदूर भी नहीं मानती. बिहार में हमने इस संगठन को रजिस्टर करने की कोशिश की तो लेबर डिपार्टमेंट ने एडवोकेट जनरल से राय ली. एडवोकेट जनरल का कहना था कि ये लोग मजदूर नहीं हैं, इसलिए इनका लेबर यूनियन के रूप में निबंधन नहीं हो सकता. उनका मानना है कि ये लोग पार्ट टाइमर हैं, वॉलेंटियर हैं. इसलिए इनको सैलरी नहीं, इंसेंटिव दी जाती है.”
इस सम्मेलन में बिहार, झारखंड, बंगाल, ओड़िशा, असम, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, दिल्ली, छत्तीसगढ़, यूपी, उत्तराखंड, गुजरात और तमिलनाडु के प्रतिनिधि पहुंचे हैं. इन्होंने 13 सदस्यीय पदाधिकारी, 30 सदस्यीय कार्यकारिणी और 45 सदस्यीय राष्ट्रीय परिषद का चुनाव किया. सर्वसम्मति से गीता मंडल को राष्ट्रीय अध्यक्ष और शशि यादव को राष्ट्रीय महासचिव के बतौर चुनाव किया. सरोज चौबे अध्यक्ष और रामबली प्रसाद वरिष्ठ उपाध्यक्ष चुने गए. पदाधिकारियों में असम, बंगाल, झारखंड, आंध्र, ओडिशा, दिल्ली, महाराष्ट्र आदि राज्यों से शामिल हैं. जयश्री (बंगाल), सबिता बराज (ओडिशा), पी सत्तार (आंध्र), विजय विद्रोही (उत्तरप्रदेश), स्वेताराज (दिल्ली), माया हजारिका (असम), गीता कश्यप (उत्तराखंड) और, सुवर्णा तालेकर (महाराष्ट्र) आदि पदाधिकारी चुने गए हैं.

