अगर आप ओला, उबर या रैपिडो जैसे एैप का इस्तेमाल करके कैब से यात्रा करते हैं तो आने वाले शनिवार यानी 7 फरवरी को आपको दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है. इन कैब एग्रिगेटर्स के ड्राइवरों ने 4 फरवरी को यह घोषणा की है कि शनिवार को वे छह घंटे की हड़ताल करने वाले हैं.
यह हड़ताल सिर्फ दिल्ली-एनसीआर तक सीमित नहीं रहेगी बल्कि देश के दूसरे बड़े शहरों में भी ऐप-आधारित कैब सेवाओं के पहिए शनिवार को छह घंटों के लिए थमने की आशंका है. इस हड़ताल की अगुवाई तेलंगाना गिग ऐंड प्लेटफॉर्म वर्कर्स यूनियन कर रही है.
ओला, उबर और रैपिडो से जुड़े ड्राइवर यूनियनों का कहना है कि बढ़ती लागत, घटती कमाई और कंपनियों के बढ़ते कमीशन ने उनकी रोजी-रोटी को संकट में डाल दिया है. वहीं इस पूरे मामले पर कैब एग्रीगेटर कंपनियां दावा कर रही हैं कि उनका मॉडल ड्राइवरों और यात्रियों दोनों के हितों के बीच संतुलन स्थापित करने वाला है. केंद्र सरकार भी इस पूरे विवाद पर नजर रखे हुए है और सरकार के स्तर पर यह कोशिश की जा रही है कि यह हड़ताल टल जाए.
इस हड़ताल के बारे में ड्राइवर यूनियनों ने घोषणा की है कि शनिवार को निर्धारित समय के दौरान वे ओला, उबर और रैपिडो प्लेटफॉर्म पर लॉग-इन नहीं करेंगे. इस वजह से दिल्ली-एनसीआर समेत मुंबई, बेंगलुरु, हैदराबाद और पुणे जैसे महानगरों में यात्रियों को कैब सेवाएं मिलने में परेशानी हो सकती है.
हालांकि, यूनियन का कहना है कि यह हड़ताल प्रतीकात्मक है और इसका मकसद आम लोगों के लिए दिक्कतें पैदा करना नहीं बल्कि कंपनियों और सरकार का ध्यान उनकी मांगों की तरफ दिलाना है. लेकिन यूनियन ने यह चेतावनी भी दी है कि अगर उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया तो भविष्य में लंबी हड़ताल की राह वे पकड़ सकते हैं.
बिहार की राजधानी पटना के कैब ड्राइवरों ने भी इस हड़ताल का समर्थन किया है. पटना कैब ड्राइवर एसोसिएशन की तरफ से संयोजक अनिल द्विवेदी और अध्यक्ष धनंजय सिंह दिल्ली जाकर इस हड़ताल को अपना समर्थन देंगे.
इंडिया टुडे से बातचीत में कैब ड्राइवरों की एयरपोर्ट टीम के प्रभारी बिपिन तिवारी कहते हैं, ''दरअसल पहले ओला, उबर और रैपिडो जैसी कंपनियां हमें बिजनेस की गारंटी देती थी, जो लगभग 45 हजार रुपये प्रति माह की होती थी. वे हर ट्रिप पर कमीशन लेती थीं. अब उनका सिस्टम बदल गया है. वे प्लेटफार्म के लिये ड्राइवरों से रिचार्ज करवाती हैं, जो अमूमन दो से पांच हजार रुपये प्रति माह तक होता है. अगर हम तीन कंपनियों का रिचार्ज करवाएं तो हमारा खर्चा सात से आठ हजार चला जाता है. मगर ट्रिप की कोई गारंटी नहीं होती. यह सबसे बड़ी दिक्कत है.''
पटना के ही एक अन्य कैब ड्राइवर रवि कहते हैं, ''कैब एग्रिगेटर कंपनियों ने फ्लेक्सी सिस्टम लागू कर दिया है. अब ट्रिप आती है तो हर ड्राइवर में उसे एक्सेप्ट करने की होड़ मचती है, जिससे एक्सीडेंट का खतरा बढ़ गया है. कोरोना के बाद इन कंपनियों ने हमारी जिम्मेदारी लेना बंद कर दिया है. ग्राहक के साथ नोकझोंक या किसी घटना की स्थिति में भी ये हमारी मदद नहीं करतीं. इन कंपनियों को इस सिस्टम को बदलकर पुराने सिस्टम को अपनाना चाहिए, यही हमारी मांग है.''
अलग-अलग शहरों के कैग ड्राइवरों का सबसे बड़ा आरोप यह है कि एग्रीगेटर किराए का बड़ा हिस्सा कमीशन के रूप में काट रहे हैं. यूनियन नेताओं का दावा है कि कई मामलों में कंपनियां 25 से 35 प्रतिशत तक कमीशन ले रही हैं. ड्राइवरों का कहना है कि ईंधन, वाहन की किस्त, मेंटेनेंस और बीमा जैसे खर्च लगातार बढ़ रहे हैं लेकिन उनकी वास्तविक आय घटती जा रही है. उनका तर्क है कि अगर कमीशन कम नहीं किया गया तो ड्राइवरों के लिए काम जारी रखना मुश्किल हो जाएगा.
ड्राइवर संगठनों की दूसरी प्रमुख मांग यह भी है कि सरकार और कंपनियां मिलकर न्यूनतम किराया तय करें. उनका कहना है कि कई बार कंपनियां प्रमोशनल ऑफर या डिस्काउंट के कारण किराया इतना कम कर देती हैं कि ड्राइवरों को घाटा उठाना पड़ता है. ड्राइवरों का कहना है कि पेट्रोल, डीजल और सीएनजी की कीमतें लगातार बढ़ती रही हैं इसलिए किराए को ईंधन लागत से लिंक करके ऐसा सिस्टम बनाना चाहिए कि ईंधन की कीमत बढ़ने पर किराया खुद ही बढ़ जाए.
इनकी एक मांग सामाजिक सुरक्षा कवर की भी है. गिग-वर्कर के रूप में काम करने वाले ड्राइवरों को नियमित कर्मचारियों की तरह सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ नहीं मिलता. यूनियन मांग कर रही है कि स्वास्थ्य बीमा और दुर्घटना बीमा जैसी सुविधाएं इन्हें भी मिलें. ड्राइवरों का एक आरोप यह भी है कि कंपनियां ग्राहकों की शिकायत के आधार पर बिना पर्याप्त जांच के अकाउंट सस्पेंड कर देती हैं. यूनियन का कहना है कि इसके लिए पारदर्शी और न्यायसंगत प्रक्रिया बनाई जानी चाहिए.
इनकी एक मांग यह भी है कि प्राइवेट कारों का कैब के तौर पर इस्तेमाल करने पर पूरी पाबंदी हो. अपनी मांगों को लेकर ड्राइवर यूनियन ने केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी को एक पत्र भी लिखा है.
इस पूरे मामले पर ओला, उबर और रैपिडो जैसी कंपनियों का कहना है कि उनका प्लेटफॉर्म ड्राइवरों को रोजगार के अवसर देता है और किराया मांग और आपूर्ति पर निर्भर होता है. कंपनियों का तर्क है कि अगर किराया बहुत अधिक बढ़ाया गया तो यात्रियों की संख्या कम हो सकती है और इससे ड्राइवरों की आय पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा. कंपनियों ने यह संकेत भी दिया है कि वे ड्राइवर संगठनों के साथ बातचीत के लिए तैयार हैं लेकिन किराया और कमीशन जैसे मुद्दों पर ड्राइवरों को भी संतुलित रुख अपनाना होगा.
सरकारी अधिकारियों का कहना है कि वे ड्राइवर यूनियनों और कंपनियों दोनों से बातचीत कर समाधान निकालने की कोशिश कर रहे हैं. हालांकि, अभी तक इस बात पर सहमति बनती हुई नहीं दिख रही है कि शनिवार की हड़ताल न हो.

