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फसाद की एक और दीवार

विश्व-भारती इन दिनों सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और बंगाल की सत्ता पर नजर गड़ाए बैठी भाजपा के बीच जंग का मैदान बन गया है

कैंपस की जंग पौष मेले के मैदान के पास दीवार खड़ी करने के विरोध में विश्व-भारती के पूर्व कर्मचारी और छात्र
कैंपस की जंग पौष मेले के मैदान के पास दीवार खड़ी करने के विरोध में विश्व-भारती के पूर्व कर्मचारी और छात्र
अपडेटेड 4 सितंबर , 2020

विश्व-भारती बंगाल का एकमात्र केंद्रीय विश्वविद्यालय है जिसके कुलाधिपति (चांसलर) प्रधानमंत्री हैं. विश्व-भारती इन दिनों सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और बंगाल की सत्ता पर नजर गड़ाए बैठी भाजपा के बीच जंग का मैदान बन गया है. कवि, शिक्षाविद और नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर की ओर से 1921 में स्थापित इस विश्वविद्यालय की विरासत आज खतरे में है.


नवंबर, 2018 में कुलपति विद्युत चक्रवर्ती की नियुक्ति के बाद से विश्व-भारती परिसर में सियासी सरगर्मी बढ़ गई थी पर 15-17 अगस्त के बीच यह बहुत खराब तब स्तर पर पहुंच गई जब विश्वविद्यालय के एक प्रशासनिक फैसले के बाद स्थानीय भीड़ ने उत्पात मचाया. 15 अगस्त को विश्व-भारती प्रशासन ने अपने 20 एकड़ के परिसर में ही स्थित एक बड़े खुले मैदान के चारों ओर एक चारदीवारी का निर्माण शुरू किया. यहां हर दिसंबर में प्रतिष्ठित 'पौष मेला' विश्वविद्यालय प्रशासन ही आयोजित करता आया था. चार दिन से ज्यादा चलने वाला यह मेला विदेशी पर्यटकों को भी आकर्षित करता है, इससे स्थानीय उद्यमियों, शिल्पियों वगैरह के लिए यह एक मुनाफे का मौका देता है.


इससे पहले जुलाई में विश्वविद्यालय प्रशासन ने मेले का आयोजन बंद करने का ऐलान किया था. उसने कथित तौर पर अतिक्रमण और भूमि हड़पने को रोकने के लिए परिसर के इलाके की घेराबंदी का निर्णय लिया है. लेकिन दुनिया को लेकर टैगोर की व्यापक दृष्टि को जीने वाले लोगों के लिए, ये नई बाड़ें और दीवारें अभिशाप जैसी हैं. 17 अगस्त को ग्रामीणों और स्थानीय व्यापारियों का करीब 5,000 लोगों का एक समूह कथित रूप से तृणमूल नेताओं की शह पर विरोध करने और दीवार गिराने पहुंच गया.


असल में विश्वविद्यालय कर्मचारियों-छात्रों में खलबली तो चक्रवर्ती की नियुक्ति के समय ही मच गई थी क्योंकि 2017 में डीयू में गांधी भवन का निदेशक रहने के दौरान उन पर यौन उत्पीडऩ का आरोप लगा था. 2015 में डीयू कुलपति के पद के लिए उनकी उम्मीदवारी का भी शिक्षाविदों ने खूब विरोध किया था. यहां आते ही उन्होंने अलोकप्रिय फैसले लेने शुरू कर दिए.

इस साल जनवरी में, उन्होंने शिक्षण और गैर-शिक्षण कर्मचारियों पर मीडिया से बात करने पर रोक लगा दी; विरोध-प्रदर्शन करने वाले छात्रों को निलंबित करके उन्हें छात्रावासों से बाहर कर दिया; छात्र, शिक्षक और कर्मचारी संघों को भंग कर दिया; कथित अनियमितताओं और कुलपति के खिलाफ छात्रों को लामबंद करने के आरोप में 104 शिक्षकों को कारण बताओ नोटिस जारी किए गए—और उनमें से 12 को निलंबित कर दिया गया.


17 अगस्त की हिंसा के बाद ममता बनर्जी सरकार और केंद्र के बीच एक नई जंग छिड़ चुकी है. केंद्र ने जिला पुलिस से इसकी रिपोर्ट मांगी है और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने भीड़ को हिंसा के लिए भड़काने की कथित फंडिंग की जांच शुरू कर दी है. राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने भी ट्विटर पर ममता से आग्रह किया कि वे परिसर में ''तोड़-फोड़ कराने वालों की जवाबदेही तय करने को उचित कार्रवाई करें.'' अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनजर मामला और तूल पकड़ सकता है.


इस मामले में ममता ने साफ कहा, ''मैं विश्व-भारती में ऐसा कोई निर्माण नहीं चाहती, जो उसकी प्राकृतिक सुंदरता को बिगाड़ दे.'' उनकी इस टिप्पणी पर कि दीवार उठाने के दौरान वहां 'बाहरी लोग' (उनका आशय: भाजपा के गुंडे) मौजूद थे, चक्रवर्ती ने चुटकी ली: ''गुरुदेव टैगोर खुद शांति निकेतन के लिए बाहरी थे.'' साफ है: टैगोर के प्रिय शांति निकेतन में शांति जल्दी वापस नहीं लौटने वाली.

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