1 जून से नेशनल कमोडिटी एंड डेरिवेटिव्स एक्सचेंज लिमिटेड (NCDEX) भारत में पहली बार मौसम संबंधी डेरिवेटिव्स लॉन्च करने वाला है. यह भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के बारिश के आंकड़ों पर आधारित होगा, जिससे लोग बारिश कम या ज्यादा होने पर अपना आर्थिक खतरा कम कर सकेंगे.
पुराने समय में (19वीं सदी के अंत में) मुंबई में लोग बारिश पर जुआ खेला करते थे. अब NCDEX ने अपने फैसले से एक बार फिर से पुरानी यादें ताजा कर दी हैं. कहा जाता है कि मुंबई में इस तरह का जुआ खेलना तब शुरू हुआ, जब शहर धीरे-धीरे बंबई किले की दीवारों से बाहर निकल रहा था.
1864 में गवर्नर सर बार्टल फ्रेयर के आदेश पर उत्तर की ओर विस्तार की अनुमति देने के बाद बंबई किले की दीवारों को ध्वस्त कर दिया गया था. शहर फैलने और लोगों के ज्यादा आने-जाने तथा आबादी बढ़ने से मुंबई में ट्रैफिक की समस्या बढ़ गई. इतना ही नहीं, भिखारियों की आबादी बढ़ी, यूरोप के आवारा लोगों के आने से शहर में विदेशी वेश्याओं की समस्याएं भी बढ़ गईं.
मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर विनायक गजानन कानितकर के मुताबिक, इसी समय शहर में जुआ खेलने के कुछ अजीबो-गरीब रूप शुरू हो गए, इन्हीं में से एक बारिश पर जुआ खेलना भी था. बारिश का सट्टा या बारिश पर जुआ खेलने के दो रूप थे, जो आमतौर पर कलकत्ता मोरी और लकड़ी सट्टा के नाम से जाने जाते थे.
पहले वाले (कलकत्ता मोरी) सट्टा में लोग इस पर दांव लगाते थे कि तय समय के अंदर बारिश रेत से भरे एक खास बक्से में से छनकर नीचे गिरेगी या नहीं. बैंकर (सट्टेबाज) बादलों के रंग और दिशा को देखकर दांव की दरें तय करते थे.
दूसरे वाले (लकड़ी सट्टा) में जीत-हार इस बात पर निर्भर करती थी कि तय समय में बारिश इतनी हुई कि छत की नाली भर जाए और पानी बहने लगे. यह जुआ आमतौर पर सुबह 6 बजे से दोपहर 12 बजे तक और फिर शाम 6 बजे से आधी रात तक चलता था.
दांव की दरें आसमान के हाल और बाकी बचे समय के हिसाब से बदलती रहती थीं. इस बात का जिक्र ब्रिटिश अधिकारी एस.एम. एडवर्ड्स ने अपनी किताब ‘The Bombay City Police: A Historical Sketch 1672-1916’ में किया है. बारिश के चार महीनों में मुंबई शहर एकदम पागल हो जाता था. नौकर अपनी नौकरी छोड़ देते, कारीगर अपना काम छोड़ देते, साहूकार और व्यापारी अपना धंधा छोड़कर सिर्फ बारिश का सट्टा खेलने लग जाते. इस लत ने कई परिवारों को पूरी तरह तबाह कर दिया.
एक उस वक्त के एक लोकप्रिय लेखक कहते हैं, "बारिश की सट्टेबाजी से होने वाली भयावहता और बुराइयों का सजीव चित्रण करने के लिए प्रसिद्ध उपन्यासकार चार्ल्स डिकेंस की कलम की जरूरत थी." बारिश के मौसम में चोरी और पैसा हड़पने के मामले बहुत बढ़ जाते थे. लेखक लिखते हैं, “लड़के घर से पैसे या गहने चुराकर मारवाड़ियों को बेच देते या गिरवी रख देते. क्लर्क मालिक का पैसा चुराते, कलेक्टर अपना इकट्ठा किया पैसा रख लेते. ट्राम-ट्रेन में लोग सिर्फ बारिश की ही बात करते. सट्टेबाजों के सपनों में भी सिर्फ बारिश होती. दिन-रात उनका दिमाग बारिश में लगा रहता था.”
ब्रिटिश अधिकारी एस.एम. एडवर्ड्स ने लिखा कि पुलिस में भ्रष्टाचार था, इसलिए पुलिस जुआरियों पर सख्ती नहीं करती थी. खुद भारतीय सिपाही भी बारिश के सट्टे के शौकीन थे. लेखिका ओल्गा वल्लाडेरेस लिखती हैं कि बारिश के जुए को लेकर शहर में भारी विरोध हुआ. सरकार, पुलिस कमिश्नर सर फ्रैंक हेनरी एंड्रयू सॉटर और नाना शंकरशेठ जैसे लोग जुए पर रोक लगाने की कोशिश कर रहे थे.
हालांकि, जुआरी और जुआघर वाले पुलिस से बचते-छिपते रहे. जैसे चूहे-बिल्ली का खेल. 1856 में सरकार ने शहर में जुआ रोकने का कानून बनाया तो जुआरी कुर्ला जैसे शहर के बाहरी इलाकों में चले गए. 1888 में बारिश सट्टे से जुड़े दो बड़े लोगों पर केस हुआ लेकिन कानूनी कमियों से वे बच गए. बाद में सॉटर के बाद कमिश्नर बने लेफ्टिनेंट कर्नल विल्सन ने गैंबलिंग कानून में बदलाव करवाया, जिससे जुआ कम हुआ.
एडवर्ड्स लिखते हैं, “बॉम्बे हमेशा से जुए का आदी रहा है, चाहे वह प्रसिद्ध तेजी-मंदी अनुबंधों के रूप में हो, अंक सट्टा या अफीम पर जुआ हो, या पासे और ताश के सामान्य जुए के रूप में हो.” मुंबई में बारिश का सट्टा तो खत्म हो गया लेकिन जुआ बिल्कुल समाप्त नहीं हुआ. वह नए रूप लेता रहा है, चाहे वह लिवरपूल और न्यूयॉर्क के कपास एक्सचेंज में कपास की कीमतों पर जुआ हो या बाद में मटका सट्टा.

