अप्रैल की 23 तारीख को पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के पहले चरण के मतदान के बाद माहौल अभी शांत भी नहीं हुआ था कि केंद्र सरकार ने एक महत्वपूर्ण अधिसूचना जारी कर दी.
इस अधिसूचना के माध्यम से केंद्र ने अशोक लाहिड़ी को नीति आयोग का उपाध्यक्ष नियुक्त कर दिया. अशोक लाहिड़ी पश्चिम बंगाल की बालुरघाट सीट से BJP विधायक रह चुके हैं.
केंद्र सरकार के प्रमुख थिंक टैंक नीति आयोग के चौथे उपाध्यक्ष के रूप में अशोक लाहिड़ी ने सुमन बेरी की जगह ली है. अशोक लाहिड़ी को राजनीति से ज्यादा अपनी गहरी आर्थिक समझ के लिए जाना जाता है. इस क्षेत्र में उनके काम के कारण उन्हें काफी सम्मान मिला है. इससे पहले वे अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में मुख्य आर्थिक सलाहकार रह चुके हैं और 15वें वित्त आयोग में सदस्य के रूप में अपना योगदान दे चुके हैं.
उनके पास नीति निर्माण की गहराई और प्रशासनिक अनुभव दोनों हैं. खबर है कि केंद्रीय नेतृत्व से लाहिड़ी ने चुनावी राजनीति में बने रहने के बजाय अर्थशास्त्र और नीति निर्माण में अपनी विशेषज्ञता को फिर से स्थापित करने की इच्छा जताई थी. उनकी यह सोच नीति आयोग से सरकार की अपेक्षाओं से पूरी तरह मेल खाती है. वे इस तरह की संस्थाओं में सैद्धांतिक चर्चाओं से ज्यादा क्रियान्वयन यानी सरकारी काम को लागू कराने पर फोकस करना चाहते हैं.
लाहिड़ी की इस पद पर नियुक्ति एक महत्वपूर्ण संकेत है. इस पद पर पहले रह चुके लोगों के विपरीत, वे सरकार के भीतर वर्षों के अनुभव से परिपक्व होकर एक व्यवहारिक अर्थशास्त्री के रूप में इस पद तक पहुंचे हैं.
नीति या योजनाओं को लागू करने में आने वाली बाधाओं से वे भली-भांति परिचित हैं. उनकी विशेषज्ञता बहसों को दिशा देने में नहीं, बल्कि निर्णयों को परिणामों में बदलने वाली कार्यप्रणाली को समझने में है. यह तर्क नीति आयोग की नई संरचना में भी दिखाई देता है.
पूर्व कैबिनेट सचिव राजीव गौबा को पद पर बरकरार रखने के साथ-साथ नीति आयोग में कई क्षेत्रों के विशेषज्ञों को भी शामिल किया गया है. इनमें विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव प्रो. अभय करंदीकर, भोपाल स्थित भारतीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (IISER) के निदेशक प्रो. गोबर्धन दास, अर्थशास्त्री के.वी. राजू और नई दिल्ली स्थित AIIMS के निदेशक डॉ. एम. श्रीनिवास जैसे नाम शामिल हैं. यह सब नीति आयोग में एक निर्णायक बदलाव का संकेत है.
ये सभी लोग महज नीति-निर्माता नहीं, बल्कि अनुभवी प्रशासक हैं. जिन्होंने बड़े संस्थानों को संचालित किया है और योजनाओं को जमीन पर उतारने में आने वाली समस्याओं को अच्छी तरह समझा है. नीति आयोग में हो रहा यह बदलाव संभावित मंत्रिमंडल फेरबदल से पहले सरकार की प्राथमिकताओं में स्पष्ट बदलाव का संकेत है.
अब नीति निर्माण के साथ-साथ क्रियान्वयन पर विशेष जोर दिया जा रहा है. सरकार चाहती है कि योजनाएं सिर्फ कागजों पर न रहें, बल्कि मापने योग्य परिणाम दें. इसके लिए प्रमुख मंत्रालयों में निगरानी बढ़ाई जाएगी और नए विचारों को आगे बढ़ाने के लिए नई प्रतिभाओं को शामिल किया जाएगा.
प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) के एक अधिकारी ने इस फेरबदल के बारे में कहा कि यह टीम नीति पर बहस करने के लिए नहीं, बल्कि उसे लागू करने के लिए गठित की गई है. योजना आयोग की जगह लेने के 11 वर्ष से अधिक समय बाद, नीति आयोग अब अपने सबसे महत्वपूर्ण बदलाव से गुजर रहा है.
यह केवल नए चेहरों की नियुक्ति भर नहीं है, बल्कि संस्था के उद्देश्य, दृष्टिकोण और शक्ति में एक गहरा परिवर्तन दिखाता है. इसके मूल में सुधारों पर विचार करने से लेकर परिणाम देने तक का स्पष्ट बदलाव है. इस संस्थान में बदलाव को लेकर केंद्र सरकार में काफी समय से बेचैनी रही है.
एक दशक तक नीति निर्माण, परामर्श और सुधारों पर चर्चा करने के बाद अब मुख्य सवाल यह नहीं रहा कि क्या किया जाए, बल्कि यह है कि इसे कैसे प्रभावी ढंग से लागू किया जाए. जब वर्ष 2015 में नरेंद्र मोदी सरकार ने योजना आयोग को भंग कर नीति आयोग की स्थापना की थी, तो लक्ष्य एक चुस्त, लचीली और दूरदर्शी संस्था बनाने का था.
एक ऐसी संस्था जो सहकारी संघवाद को मजबूत करते हुए शासन में नए विचारों का संचार कर सके. शुरू के कुछ समय तक यह वादा पूरा भी होता दिखा. नीति आयोग नीतिगत कल्पना का केंद्र बन गया, जिसने विभिन्न क्षेत्रों के लिए रूपरेखा तैयार की और उभरती चुनौतियों के समाधान के लिए हितधारकों को एक मंच पर लाया.
हालांकि, समय के साथ एक अलग धारणा विकसित हुई. रमेश चंद, वी.के. पॉल और वी.के. सारस्वत जैसे लंबे समय से कार्यरत सदस्यों ने निरंतरता बनाए रखी, जबकि अरविंद विरमानी जैसे बाद में शामिल हुए सदस्य ने आयोग की नीति निर्माण में आर्थिक तौर पर बौद्धिक गहराई को जोड़ा. फिर भी, आलोचना जारी रही.
कुछ समय पहले तक नीति आयोग को रिपोर्ट तैयार करने वाली संस्था के रूप में देखा जाने लगा था, जहां परिणामों पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया जाता था. एक प्रमुख आलोचना यह भी रही कि प्रधानमंत्री के आत्मनिर्भर भारत के विजन से जुड़े इनोवेटिव विचार नीति आयोग से उभर नहीं रहे थे.
दिल्ली के नीतिगत हलकों में धीरे-धीरे यह राय बनने लगी थी कि नीति आयोग नीति-निर्माण की जगह नीति-चर्चा का केंद्र बनकर रह गया है. 2026 में नीति आयोग के प्रति जो नया नजरिया अपनाया गया है, वह इस पुरानी स्थिति को बदलने का प्रयास है. यह मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल में शासन प्रणाली में आए व्यापक बदलाव का भी प्रतीक है. पिछले कार्यकाल में सरकार ने GST, वित्तीय समावेशन और डिजिटल भुगतान जैसे बड़े संरचनात्मक सुधारों पर ध्यान केंद्रित किया था.
इन सुधारों के लिए वैचारिक स्पष्टता, आम लोगों की सहमति और नीतिगत स्तर पर बदलाव की जरूरत थी. वर्तमान चरण इससे अलग है. अब ध्यान विनिर्माण को बढ़ावा देने, राज्य की क्षमता को मजबूत करने, बुनियादी ढांचे के विकास और भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं में एकीकृत करने पर केंद्रित है.
ये योजना संबंधी समस्याएं नहीं, बल्कि क्रियान्वयन संबंधी समस्याएं हैं. क्रियान्वयन के लिए मंत्रालयों के बीच बेहतर समन्वय, निरंतर निगरानी, समस्या सुलझाने और प्रशासनिक तौर पर दक्ष होना अत्यंत आवश्यक है. नौकरशाही के वरिष्ठ अधिकारियों और विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों को शामिल करके सरकार नीति आयोग के स्वरूप को बदलने की कोशिश कर रही है, ताकि यह संस्था अब न केवल सलाह दे, बल्कि नीतियों के क्रियान्वयन को भी गति प्रदान करे.
यह एक महीन लेकिन महत्वपूर्ण बदलाव है. पहले इसका प्रभाव नीतिगत चर्चा यानी योजनाओं की प्लानिंग आदि तक सीमित था. लेकिन, अब जमीनी स्तर पर परिणाम देने की इसकी क्षमता का मूल्यांकन अधिकाधिक किया जाएगा. इस बदलाव में जोखिम भी कम नहीं हैं. यह जरूर है कि इन बदलावों से मंत्रालयों के बीच विवाद सुलझाने के अलावा निगरानी और काम-काज में भी तेजी आएगी. लेकिन, जोखिम यह है कि इससे संस्था के मूल सिद्धांत कमजोर हो सकते हैं.
अब तक नीति आयोग की पहचान मुख्य रूप से एक ऐसे मंच के रूप में थी, जिसका उद्देश्य राष्ट्रीय नीति निर्माण में राज्यों की भूमिका को मजबूत करना था. यह एक अपेक्षाकृत विकेंद्रीकृत संरचना थी. अब सरकार जो बदलाव कर रही है, उससे संस्था की पहचान परामर्श देने वाली संस्था से बढ़कर एक ज्यादा केंद्रीकृत और परिणाम-केंद्रित संस्था के रूप में हो सकती है, जो प्रधानमंत्री कार्यालय के साथ बेहद करीब से जुड़ी हुई है.इस तरह की संस्था पहले वाद-विवाद, असहमति और दीर्घकालिक चिंतन के माध्यम से बेहतर योजनाओं की रूपरेखा तैयार करती थी. ऐसे में क्रियान्वयन पर अत्यधिक जोर देने से इसकी स्वतंत्रता सीमित हो सकती है और स्वतंत्र आलोचना तथा प्रैक्टिकल व क्रिएटिव थिंकिंग के लिए गुंजाइश कम हो सकती है.
अधिक प्रभावी बनने की प्रक्रिया में नीति आयोग बौद्धिक रूप से कम बहुलवादी हो सकता है. दरअसल, बहुलवाद एक राजनीतिक और सामाजिक विचारधारा है, जो मानती है कि समाज में शक्ति को एक जगह केंद्रित करने के बजाय विभिन्न समूहों - जैसे संगठनों, संघों और संस्थाओं — में बांटा जाना चाहिए.
नीति आयोग में केंद्र सरकार के जरिए किए जा रहे इस बदलाव को 2015 के बाद का सबसे बड़ा परिवर्तन कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी. यह संस्था के प्रमुख पदों पर पीढ़ीगत बदलाव, काम करने के तरीके में वैचारिक परिवर्तन और भारत की शासन व्यवस्था में एक राजनीतिक पुनर्व्यवस्था का प्रतीक है.
इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह संकेत देता है कि सरकार अब नीति आयोग को केवल एक विचार और वाद-विवाद करने वाली संस्था के रूप में नहीं, बल्कि राज्य की एक अहम रणनीतिक संस्था के रूप में देखती है. वह संस्था जो कभी केंद्र की योजनाओं के प्लानिंग के लिए जानी जाती थी, अब वही केंद्र व राज्यों के काम-काजों की निगरानी और उसे लागू करवाने के लिए भी जानी जाएगी.
असली परीक्षा तो अभी बाकी है. ऐसा इसलिए क्योंकि सफलता का आकलन रिपोर्टों की संख्या या परामर्शों की संख्या से नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर मिलने वाले परिणामों से होगा. बुनियादी ढांचे का तेजी से विकास, नीतिगत बाधाओं में कमी और प्रमुख कार्यक्रमों में ठोस सुधार ही यह तय करेंगे कि यह नया प्रयास सफल होता है या नहीं.

