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क्या नागरिकों का त्याग ही अर्थव्यवस्था का अंतिम सहारा है?

एक तरफ ‘विश्वगुरु’ और पांच ट्रिलियन डॉलर अर्थव्यवस्था का स्वप्न, दूसरी तरफ नागरिकों से त्याग का आह्वान. भारत इस समय दो बिल्कुल अलग कथाओं के बीच खड़ा दिखाई दे रहा है

PM Narendra Modi appealed to Indians to revive working from home, buy less gold and limit foreign travel. (File Image)
पीएम मोदी ने आर्थिक संकट के मद्देनजर देशवासियों से कई अपीलें की हैं
अपडेटेड 11 मई , 2026

10 मई 2026 को हैदराबाद की एक सभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से कई असाधारण व्यक्तिगत अपीलें कीं. भारत की डिजिटल आकांक्षाओं, बढ़ते आईटी गलियारों और मजबूत होते मध्यवर्ग के लिए प्रधानमंत्री का संदेश सीधा थाः कम सोना खरीदिए, विदेश जाना और डेस्टिनेशन वेडिंग स्थगित कीजिए, कम ईंधन खर्च कीजिए, घर से काम कीजिए और उर्वरकों के प्रयोग पर थोड़ी लगाम लगाइए.

आर्थिक सलाह से अधिक यह एक तरह का राष्ट्रीय संयम का संदेश था. और इस संदेश को समझने के लिए वैश्विक संकट और सरकारी खर्चों को समझना जरूरी है जिसने इसे जन्म दिया.

कितना बड़ा है संकट?

फरवरी 2026 के अंत से पश्चिम एशिया एक ऐसे भू-राजनीतिक विस्फोट का केंद्र बना हुआ है जिसने वैश्विक अर्थव्यवस्था की नसों में भय भर दिया है. अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच चल रहे संघर्ष ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को लगभग ब्लॉक कर दिया जिससे दुनिया के लगभग एक-चौथाई समुद्री तेल व्यापार और पांचवें हिस्से के LNG व्यापार का रास्ता अचानक असुरक्षित हो गया.

भारत का 70 फीसदी कच्चा तेल स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से आता है
भारत का 70 फीसदी कच्चा तेल स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से आता है

भारत के लिए यह केवल विदेश नीति का मामला नहीं है. भारत अपने उपभोग का लगभग 88 प्रतिशत कच्चा तेल और 60 फीसद LPG आयात करता है. पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय के मुताबिक 70 फीसद कच्चा तेल और 90 फीसद LPG स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते आता है. उर्वरक से लेकर अमोनिया तक बड़ी मात्रा में आयात का मार्ग यही है. मार्च 2026 तक भारतीय कच्चे तेल की कीमतें 113 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई. यह केवल महंगाई का संकेत नहीं बल्कि अर्थव्यवस्था पर सीधा दबाव है.

इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के प्रमुख फातिह बिरोल ने इसे “वैश्विक तेल बाजार के इतिहास की सबसे बड़ी आपूर्ति बाधा” कहा. इसलिए यह मानने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि सरकार जिस चिंता को सामने रख रही है, वह काल्पनिक नहीं है.

पीएम की अपील कितनी कारगर?

प्रधानमंत्री ने लोगों से एक वर्ष तक सोना खरीदने से बचने की अपील की. भारत ने 2024 में लगभग 52 अरब डॉलर का सोना आयात किया. भारत का सोने से रिश्ता भावनात्मक है. बेटी की विदाई से लेकर मां की तिजोरी तक. लेकिन यही प्रेम भारत की अर्थव्यवस्था की पुरानी कमजोरी भी रहा है. 1991 में भारत को IMF से कर्ज पाने के लिए 67 टन सोना गिरवी रखना पड़ा था. उसकी स्मृति आज भी नीति-निर्माताओं की चेतना में दर्ज है.

यहीं एक दिलचस्प विडंबना भी दिखाई देती है. पिछले बजट में सरकार ने सोने पर आयात शुल्क 15 प्रतिशत से घटाकर 6 प्रतिशत कर दिया था, जिससे आयात और मांग दोनों बढ़े. ऐसे में पहले सोना सस्ता करना और फिर नागरिकों से सोना न खरीदने की अपील करना एक नीति-संबंधी असंगति की ओर भी संकेत करता है.

प्रधानमंत्री ने कारपूलिंग, मेट्रो, इलेक्ट्रिक वाहनों और रेल आधारित माल परिवहन पर जोर दिया. यह दरअसल आपूर्ति संकट के समय मांग को नियंत्रित करने की वही रणनीति है, जो 1973 के तेल संकट के दौरान अमेरिका और यूरोप ने अपनाई थी. तब अमेरिका में गति सीमा घटा दी गई थी और यूरोप में ‘कार-फ्री संडे’ तक लागू हुए थे.

भारत ने साल 2024 में 52 अरब डॉलर का सोना आयात किया था
भारत ने साल 2024 में 52 अरब डॉलर का सोना आयात किया था

हालांकि भारत जैसे विशाल देश में कुछ लाख लोगों का कारपूल करना व्यापक आर्थिक संकट को कितना बदल देगा, यह अलग बहस का विषय है. लेकिन दिशा गलत नहीं कही जा सकती.

कोविड के समय जिस वर्क फ्रॉम होम ने शहरों की सड़कों को खाली कर दिया था, उसी मॉडल को प्रधानमंत्री ने फिर अपनाने की सलाह दी. शहरों में यदि सीमित स्तर पर भी यह मॉडल लौटता है तो ईंधन खपत में वास्तविक कमी आ सकती है.

प्रधानमंत्री ने विदेश में शादियां, छुट्टियां और बढ़ते विदेशी पर्यटन खर्च को विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बताया. पिछले दशक में भारतीय मध्यवर्ग का वैश्विक उपभोग तेजी से बढ़ा है. बाली की डेस्टिनेशन वेडिंग से लेकर यूरोप की छुट्टियों तक, हर खर्च भारत के विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर बाहर ले जाता है.

आर्थिक दृष्टि से यह चिंता तार्किक है. आउटवर्ड रेमिटांस घटाने की यह अपील उस आकांक्षी मध्यवर्ग को संयम का संदेश है जिसे वर्षों से ‘नया भारत’ बनने के सपने दिखाए गए.

भारत दुनिया में सबसे ज्यादा खाद्य तेल आयात करने वाले देशों में शुमार है
भारत दुनिया में सबसे ज्यादा खाद्य तेल आयात करने वाले देशों में शुमार है

प्रधानमंत्री ने खाने के तेल की खपत घटाने और रासायनिक उर्वरकों में 50 प्रतिशत कटौती की अपील भी की. भारत दुनिया के सबसे बड़े खाद्य तेल आयातकों में है. करीब 60 फीसद तेल आयात होता है. खाद्य तेल कम करना अच्छा है. स्वास्थ्य के लिहाज से भी लेकिन विकल्प क्या है? एयर फ्रायर? जिस पर जीएसटी 18 फीसद है? यह ठीक वैसा है कि हवा अच्छी नहीं है और हमें एयर प्यूरिफायर लगाना चाहिए पर उस पर जीएसटी कम नहीं होगा.

वहीं उर्वरकों पर संयम का प्रश्न अधिक जटिल है. भारत का उर्वरक इंपोर्ट करीब 18 बिलियन डॉलर तक पहुंचने की संभावना है. सरकार करीब 1.8 लाख करोड़ की सब्सिडी देती है. आर्थिक बोझ के हिसाब से पीएम की अपील ठीक जान पड़ती है लेकिन वैकल्पिक व्यवस्था क्या है? नैनो यूरिया, ग्रीन अमोनिया, ऑर्गेनिक फार्मिंग? तब यील्ड रिस्क या जागरूकता की जिम्मेदारी किसकी थी? अचानक इस तरह की अपील से कृषि उत्पादन प्रभावित हो सकता है.

आखिर जिम्मेदारी किसकी?

भारतीय राजनीति में त्याग और राष्ट्रहित की अपीलें अक्सर चुनावी स्थिरता के बाद अधिक सहजता से की जाती रही हैं. इन अपीलों के बीच एक प्रश्न लगातार पूछा जाना चाहिए, क्या आर्थिक संकट का समाधान केवल नागरिकों के व्यक्तिगत त्याग से निकलेगा? संकट का बोझ आखिर किसके कंधों पर डाला जा रहा है?

भारत दशकों से जानता है कि उसकी ऊर्जा निर्भरता खतरनाक रूप से आयात-आधारित है. यह भी कोई नया तथ्य नहीं कि सोने का अत्यधिक आयात चालू खाते पर दबाव डालता है. लेकिन क्या पर्याप्त रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार बनाए गए? क्या नवीकरणीय ऊर्जा निवेश उस गति से हुआ जिसकी जरूरत थी? क्या शहरी परिवहन और ऊर्जा दक्षता पर उतनी राजनीतिक प्राथमिकता दी गई जितनी चुनावी परियोजनाओं को?

यह अपील विधानसभा चुनावों में NDA की बड़ी जीत और शपथग्रहण समारोहों के हो जाने के तुरंत बाद की गई है. यह कोई पहला उदाहरण नहीं है जब संकट के समय ऐसा किया गया हो लेकिन ‘सब ठीक है’ कहकर ऐसा करना, पहले कभी देखने मिला हो याद नहीं पड़ता. दुनिया के तमाम देशों ने समय-समय पर नागरिकों की जेब को ही सबसे सुविधाजनक ‘शॉक एब्जॉर्बर’ की तरह इस्तेमाल किया है.

जापान के युद्धोत्तर पुनर्निर्माण से लेकर विश्वयुद्धों के राशन मॉडल तक दीर्घकालिक संयम केवल नैतिक अपीलों से नहीं चलता. उसके लिए संस्थागत ढांचा चाहिए. कर-नीति, प्रोत्साहन, नियंत्रण और वैकल्पिक ढांचे.

भारत की गोल्ड बॉन्ड योजना इसका उदाहरण है. सरकार चाहती थी कि लोग घर का सोना बैंकिंग व्यवस्था में लाएं लेकिन सांस्कृतिक लगाव और प्रतिष्ठा का पैमाना आर्थिक तर्क पर भारी पड़ा.

दरअसल अधिक प्रभावी उपाय वे होते हैं जो नीति स्तर पर लागू किए जाते हैं, जैसे लग्जरी पर्यटन पर अतिरिक्त कर, EV पर मजबूत प्रोत्साहन, ऊर्जा दक्षता कानून या शहरी सार्वजनिक परिवहन का व्यापक विस्तार.

संकट वास्तविक है. प्रधानमंत्री मोदी की कुछ अपीलें व्यावहारिक भी. लेकिन यह भी सच है कि करीब 4 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था केवल नागरिकों के रसोईघर और गहनों के बक्सों से नहीं चलती. उसकी स्थिरता ऊर्जा नीति, रणनीतिक भंडारण, आपूर्ति शृंखला में विविधीकरण और दीर्घकालिक आर्थिक दूरदृष्टि से तय होती है.

यदि एक राष्ट्र से अपनी इच्छाओं को कुछ समय के लिए स्थगित करने को कहा जा रहा है तो बदले में उस राष्ट्र को यह भरोसा भी चाहिए कि भविष्य में ऐसी अपीलें अनिवार्य न रहें या राज्य वह संरचना बना रहा है जो नागरिकों के त्याग को स्थाई नीति-सुधार में बदल सके.

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