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‘मनरेगा’ का नया नाम होगा 'वीबी जी राम जी'... नाम बदलने की राजनीति का इतिहास कहां से शुरू होता है?

लोकसभा में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मनरेगा का नाम बदलकर 'वीबी जी राम जी' करने के लिए एक नया बिल पेश किया, जिसके बाद नाम बदलने की राजनीति पर बहस तेज हो गई है

मोदी सरकार ने मनरेगा का नाम बदला (फाइल फोटो)
मोदी सरकार ने मनरेगा का नाम बदला (फाइल फोटो)
अपडेटेड 17 दिसंबर , 2025

महान अंग्रेजी कवि विलियम शेक्सपीयर के लिखे गए कई प्रसिद्ध नाटकों में से एक 'रोमियो एंड जूलियट' है. इस नाटक में शेक्सपीयर एक जगह लिखते हैं- "नाम में क्या रखा है? जिसे हम गुलाब कहते हैं, उसे किसी और नाम से भी पुकारें तो उसकी खुशबू उतनी ही सौंधी होगी." लेकिन, क्या हर नाम के साथ ऐसा ही होता है.

क्या नाम बदलने से कुछ फर्क नहीं पड़ता है, अगर ऐसा ही है तो सरकारें योजनाओं से लेकर सड़कों और शहरों तक के नाम बदलने के पीछे क्यों पड़ी रहती है? अगर किसी जगह पर एक खास परिस्थिति में कोई नाम जीवन और मृत्यु का सवाल बन जाए तो आप शेक्सपीयर की इस पंक्ति को किस हद तक सही मानेंगे?

16 दिसंबर को लोकसभा में केंद्रीय कृषिमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मनरेगा का नाम बदलने के लिए एक नया बिल पेश किया, तो इन सवालों पर एक बार फिर से चर्चा तेज हो गई. कांग्रेस सरकारों के दिए नामों को बदलने की वजह से मोदी सरकार पर कैंसिल कल्चर (किसी के कामों को खारिज करना) की राजनीति करने के आरोप लग रहे हैं. ऐसे में नाम बदलने की राजनीति और कैंसिल कल्चर के बारे में जानते हैं :

'मनरेगा' का नाम राम के नाम पर रखने पर मचा बवाल

दिसंबर की 16 तारीख को लोकसभा में केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 'विकसित भारत-गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन बिल, 2025’ यानी 'VB-जी राम जी बिल' पेश किया. इसके बाद सदन में हंगामा शुरू हो गया. कांग्रेस ने सरकार पर इस बिल के जरिए मनरेगा योजना से महात्मा गांधी का नाम हटाने और उनका अपमान करने का आरोप लगाया.

कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने कहा कि हम इस बिल का विरोध करते हैं. हर योजना का नाम बदलने की सनक समझ नहीं आती है. बिना चर्चा के बिना सलाह लिए विधेयक को पास न करें. इसे वापस लें. इसके साथ ही प्रियंका गांधी ने कहा, "महात्मा गांधी मेरे परिवार के नहीं, मेरे परिवार जैसे ही हैं. पूरे देश की यही भावना है. कम से कम स्थायी समिति के पास इस बिल को भेंजे. कोई विधेयक किसी की निजी महत्वकांक्षा, सनक और पूर्वाग्रहों के आधार पेश नहीं होना चाहिए."

कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने भी 'वीबी- जी राम जी' बिल का विरोध किया. उन्होंने कहा, महात्मा गांधी का नाम बदलना सही नहीं है. महात्मा गांधी का नाम राज्य का विजन- पॉलिटिकल नहीं, सामाजिक विकास का था. उनका नाम ही हटाना गलत है.

BJP सरकार पर 32 योजनाओं के नाम बदलने के आरोप

मनरेगा योजना अकेली नहीं है, कांग्रेस ने अपनी वेबसाइट पर 32 योजनाओं की एक सूची जारी कर BJP पर उन सभी योजनाओं के नाम बदलने का आरोप लगाया है. कांग्रेस का कहना है कि 1975 से 2013 के बीच उसकी सरकार ने इन योजनाओं को शुरू किया था, लेकिन मोदी सरकार ने इनका नाम बदल दिया है.

इसके अलावा, कांग्रेस ने केंद्र सरकार पर विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में राजभवन और राजनिवास का नाम बदलने का आरोप लगाया है. सितंबर 2022 में राष्ट्रपति भवन से इंडिया गेट तक जाने वाले प्रतिष्ठित राजपथ का नाम बदलकर कर्तव्य पथ करने पर भी कांग्रेस ने सवाल उठाया. कांग्रेस का कहना है कि इसी तरह अलग-अलग राज्यों में BJP सरकार शहरों के नाम बदलकर उन शहरों के इतिहास को मिटाने की कोशिश कर रही है.

कांग्रेस का आरोप चाहे, जो भी हो, लेकिन ये सच है कि BJP सरकार के शहरों और योजनाओं के नाम बदलने के फैसले में एक पैटर्न नजर आता है. उदाहरण के लिए सितंबर 2016 में भारत के प्रधानमंत्री आवास और उस रोड का नाम बदल दिया गया. पहले इसका पता 7 रेस कोर्स था और इस रोड का नाम रेस कोर्स था. अब इस रोड का नाम लोक कल्याण मार्ग और पीएम आवास का नाम 7 लोक कल्याण मार्ग रखा गया है. तब नाम बदलने के वक्त पीएम मोदी ने कहा था कि "पुराना नाम भारतीय संस्कृति और मूल्यों के अनुरूप नहीं था."

कुछ लोगों का कहना है कि नाम बदलने की प्रक्रिया RSS के एक व्यापक वैचारिक अभियान का हिस्सा है. नाम बदलने के पैटर्न में एक खास बात जो ध्यान में रखी जा रही है, वह ये कि नया नाम आम तौर पर हिंदी में रखा जाता है. यह BJP की उस व्यापक सांस्कृतिक राजनीति का हिस्सा है, जिसके तहत हिंदी को अंग्रेजी से अधिक महत्व दिया जाता है.

अंग्रेजों और मुगल बादशाहों के समय पर रखे गए नामों को बदलने के अलावा ये सरकार नेहरू-गांधी परिवार के सदस्यों के नाम पर रखी गई योजनाओं के नाम भी धड़ल्ले से बदले हैं. इन योजनाओं के नाम बदलकर दीन दयाल उपाध्याय और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे नेताओं के नाम पर रखे जा रहे हैं. खासकर ऐसे नेताओं के नाम पर जो BJP-जनसंघ की राजनीतिक विरासत का हिस्सा हैं.

इसी तरह प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) और अन्य प्रमुख अहम दफ्तरों वाले कैंपस को "सेवा तीर्थ" नाम दिया गया है, जिसमें तीर्थ शब्द का अर्थ हिंदू धर्म से जुड़ा है. इस तरह से नाम बदलने की प्रक्रिया को सांस्कृतिक राजनीति का हिस्सा बताया जा रहा है.

नाम बदलने की राजनीति में कांग्रेस ने भी बनाया है रिकॉर्ड

नाम बदलने की राजनीति में कांग्रेस भी किसी से कम नहीं है. कांग्रेस ने अपनी पार्टी के तीन बड़े नेता जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के नाम पर बाजारों, शिक्षण संस्थानों आदि के नाम रखे. 12 जनवरी 1996 को कांग्रेस पार्टी की सरकार ने दिल्ली के मुख्य बाजार कनॉट प्लेस का नाम बदलकर राजीव चौक कर दिया था.

कनॉट प्लेस का नाम ब्रिटेन के शाही परिवार के सदस्य ड्यूक ऑफ कनॉट के नाम पर रखा गया था. 2013 में एक RTI से खुलासा हुआ कि 52 स्टेट स्कीम के नाम कांग्रेस सरकार में जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के नाम पर रखे गए हैं. इसी तरह 74 सड़कों या भवनों, 98 शैक्षणिक संस्थान, 52 अवॉर्ड, 19 स्टेडियम, 37 अन्य संस्थान, 28 स्पोर्टस टूर्नामेंट, 39 अस्पताल, 15 नेशनल सेंचुरी, 12 सेंट्रल स्कीम, 15 फेलोशिप और 5 एयरपोर्ट के नाम गांधी परिवार के नाम पर रखे गए.

भारत में नाम बदलने की राजनीति की शुरुआत कब और कैसे हुई?

भारत में पहले राजा-महराजा शहरों, सड़कों और मंदिरों के नाम बदलकर पुराने राजाओं का इतिहास मिटाना चाहते थे. दरअसल, यह कैंसिल कल्चर का ही हिस्सा था, जिसके तहत धीरे-धीरे सरकारी योजनाओं के भी नाम मिटाए गए. 'कैंसिल कल्चर' अंग्रेजी का एक फ्रेज है, जिसका चलन 2019 के बाद सोशल मीडिया पर तेजी से बढ़ा है. इसका मतलब किसी शासक या समुदाय के इतिहास को मिटाना है.

हर बार नाम बदलने के साथ ही ये फ्रेज चर्चा में आ जाता है. भारत में तीन फेज में शहरों, सड़कों और योजनाओं आदि के नाम राजनीतिक वजहों से बदले गए हैं- 

पहला फेज -  1303 ईस्वी में चित्तौड़गढ़ किले पर कब्जा करने के बाद अलाउद्दीन खिलजी ने अपने बेटे खिज्र खान के नाम पर इस शहर का नाम खिजराबाद रखा था. हालांकि कुछ साल बाद ही राजपूतों ने किले पर कब्जा करके एक बार फिर से इस शहर का नाम चितौड़गढ़ रख दिया.

इसके बाद तो मानो मुगल शासकों में शहरों के नाम बदलने का ट्रेंड ही चल गया था. नाम बदलने के नए दौर की शुरुआत ही हो गई. 1320 में मुहम्मद बिन तुगलक ने महाराष्ट्र के शहर देवगिरि का नाम बदलकर दौलताबाद और वारंगल का नाम बदलकर सुल्तानपुर कर दिया था. 1628 में शाहजहां ने अकबर के नाम पर 'आगरा' का नाम अकराबाद रखा था.

इसके बाद अकबर से लेकर टीपू सुल्तान और फिर अंग्रेजों ने भी कई जगहों के नाम बदले. आजादी के बाद पहली बार जबलपुर का नाम बदला. अंग्रेजों की लीगेसी को खत्म करने के लिए दिल्ली के किंग्सवे रोड को राजपथ और कर्जन रोड को कस्तूरबा गांधी मार्ग नाम दिया गया. वहीं, 1947 में जुब्बलपुरे का नाम बदलकर जबलपुर किया गया था. जगहों के नाम बदलने में बड़ा बदलाव साल 1956 में स्टेट रिऑर्गेनाइजेशन के जरिए आया था. 1956 में संपूर्णानंद ने बनारस का नाम बदलकर वाराणसी रखा था. यह नाम वरुणा और असी नदी के नाम को जोड़कर बना था.

दूसरा फेज - 1980-1990 के दशक में हुई. बात 1995 की है जब महाराष्ट्र में BJP और शिवसेना की सरकार ने बॉम्बे का नाम बदलकर मुंबई कर दिया था. इसके पीछे वजह यह बताई गई थी कि बॉम्बे सुनने में कोई अंग्रेजी नाम लगता है और अंग्रेजी हुकूमत की याद दिलाता है. उस समय की केंद्र सरकार ने मुंबई नाम का विरोध किया था, जिसकी वजह यह बताई गई थी कि इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शहर की ख्याति में कमी आएगी.

इस दौर में न सिर्फ मुंबई बल्कि देशभर के राज्यों की कई राजधानियों के नाम बदले गए. 1996 में तमिलनाडु की राजधानी मद्रास का नाम बदलकर चेन्नई किया गया. 2001 में कलकत्ता का नाम बदलकर कोलकाता रखा गया. माना जाता है अंग्रेजों द्वारा गलत उच्चारण से कोलकाता का नाम कलकत्ता हो गया था. कुछ समय पहले TMC ने पश्चिम बंगाल का नाम बदलकर 'बांग्ला' करने की मांग की थी, जिसे मानने से नरेंद्र मोदी सरकार ने मना कर दिया है.

तीसरा फेज-  2014 में NDA सरकार के सत्ता में आने के बाद ही शुरू हो गया. प्रयागराज, पंडित दीनदयाल उपध्याय रेलवे स्टेशन आदि का नाम बदला जाना इसी प्रक्रिया का हिस्सा रहा.

भारत ही नहीं दुनियाभर में होती है नाम बदलने की राजनीति

सिर्फ भारत ही नहीं, दुनिया भर में सरकारें राजनीतिक फायदे के लिए शहरों के नाम बदलती रहती हैं. प्रथम विश्व युद्ध के दौरान 1914 में रूस के शहर सेंट पीटर्सबर्ग का नाम बदलकर पेत्रोग्राद कर दिया था. सेंट पीटर्सबर्ग का नाम इसलिए बदला गया था क्योंकि रूसी सरकार को ये नाम सुनने में जर्मन शहरों के नाम जैसा लगता था. 1924 में लेनिन की मौत के बाद USSR बनने पर इस शहर का नाम लेनिनग्राद और 1991 में फिर से सेंट पीटर्सबर्ग रख दिया गया. इसी तरह 2018 में अमेरिका ने वॉशिंगटन में रूसी दूतावास के बाहर एक सड़क का नाम बोरिस नेमत्सोव मार्ग रखा. दरअसल, बोरिस नेमत्सोव पुतिन के बड़े आलोचक थे, 2015 में मॉस्को में उनकी हत्या कर दी गई थी.

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