
फैशन उद्यमी मनीष त्रिपाठी के डिजाइन किए गए एक स्पेस पैच ने अब एक आधिकारिक डाक टिकट का रूप ले लिया है. भारत सरकार के डाक विभाग इंडिया पोस्ट ने एक्सिअम मिशन-4 (Axiom Mission-4) से प्रेरित एक स्मारक स्टैम्प जारी किया है, जो अंतरिक्ष प्रतीक को एक स्थाई कलाकृति में बदलने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है.
यह स्टैम्प उस पैच पर आधारित है जिसे मेन्सवियर लेबल ‘aantarDESI’ के संस्थापक त्रिपाठी ने डिजाइन किया था. मूल रूप से यह पैच 2025 के एक्सिअम मिशन में भारत की भागीदारी के लिए तैयार किया गया था. अंतरिक्ष यात्री शुभांशु शुक्ला जिन्होंने इस मिशन में भारत का प्रतिनिधित्व किया, से यह पैच बनाने में सलाह-मशविरा भी किया गया था. अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष कार्यक्रमों में मिशन पैच आम होते हैं, लेकिन उनका आधिकारिक डाक टिकट में रूपांतरण दुर्लभ है.
स्टैम्प में मूल पैच डिजाइन को काफी हद तक बरकरार रखा गया है. इसमें एक छोटा, लेकिन प्रतीकात्मक डिजाइन है, जैसा आमतौर पर स्पेस सूट पर देखा जाता है. डाक विभाग के अनुसार, यह भारत की मानव अंतरिक्ष उड़ान में बढ़ती भूमिका को दिखाता है और डिजाइन, विज्ञान तथा कहानी को एक साथ जोड़ता है.
इंडिया टुडे से बातचीत में मनीष त्रिपाठी ने कहा, “एक डाक टिकट केवल संचार का माध्यम नहीं है; अब यह एक रिकॉर्ड या अभिलेख है.” उन्होंने कहा कि डिजाइन को इस तरह तैयार किया गया था कि मिशन समाप्त होने के बाद भी यह प्रासंगिक बना रहे.

यह पैच छोटे फ्रेम में कई प्रतीकों को समेटे हुए है. इसका स्वरूप डाक टिकट जैसा रखा गया था. इसमें बना फिंगरप्रिंट राष्ट्रीय पहचान का संकेत देता है, जबकि इसकी बनावट सूक्ष्म रूप से एक एस्ट्रोनॉट के वाइजर (अंतरिक्ष यात्रियों की हेलमेट सरीखी डिवाइस) का आकार बनाती है, जिसमें पृथ्वी दिखाई देती है.
इस डिजाइन में खगोलीय संदर्भ भारत की पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों से लिए गए हैं, जैसे की Pi का फॉर्मूला. इसकी खोज का श्रेय भारतीय गणितज्ञ आर्यभट्ट को दिया जाता है जो आज से करीब 1700 साल पहले हुए थे. Pi को ब्रह्मांड की समझ का आधार माना जाता है. त्रिपाठी के अनुसार, “इस पैच में संस्कृति, कहानी और आध्यात्मिकता है. यह भारत का गौरव है.”
डिजाइन प्रक्रिया भी खास रही. इसमें तकनीक का सीमित उपयोग किया गया और पैच को बेसिक स्टेशनरी की मदद से हाथों से तैयार करने में 35 दिन लगे. इसके बाद ही इसे डिजिटाइज किया गया. त्रिपाठी कहते हैं, “मैं चाहता था कि सोच मानवीय बनी रहे.” नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (NIFT) के स्नातक त्रिपाठी ने कस्टम फैशन, संस्थागत प्रोजेक्ट्स और सांस्कृतिक कार्यों में काम किया है. उनका कहना है कि उनका काम पोर्टफोलियो नहीं, बल्कि उद्देश्य से प्रेरित होता है.
उत्तर प्रदेश के अंबेडकर नगर जिले के एक गांव में पले-बढ़े त्रिपाठी का शुरुआती जीवन डिजाइन से दूर रहा. हालांकि स्कूल की सांस्कृतिक गतिविधियों में भागीदारी ने उनकी विजुअल समझ को विकसित किया. डिजाइन को करियर के रूप में अपनाने के लिए उन्हें अपने पिता को मनाने में भी संघर्ष करना पड़ा.
बाद में उन्होंने NIFT में शीर्ष उम्मीदवारों में स्थान हासिल किया और स्वतंत्र रूप से काम शुरू किया. COVID-19 महामारी के दौरान उनका काम आजीविका पर केंद्रित हो गया. उन्होंने स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर ग्रामीण महिलाओं को कपड़े के मास्क बनाने का प्रशिक्षण दिया, जिनमें कई प्रवासी महिलाएं भी शामिल थीं.
इस पहल में लगभग 7,000 महिलाओं ने भाग लिया. उत्पादन और वितरण की ऐसी प्रणाली बनाई गई, जिससे मास्क की खरीद और दान—दोनों संभव हो सके. 2021 में उत्तर प्रदेश में इस पहल की एक बड़ी प्रदर्शनी भी आयोजित की गई.
हालांकि यह परियोजना सीमित स्तर की थी, लेकिन इसने यह दिखाया कि डिजाइन को आजीविका के साधन के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है. त्रिपाठी ने अयोध्या के राम मंदिर में देवता के वस्त्रों के डिजाइन में भी योगदान दिया. इस काम में केवल पोशाक डिजाइन ही नहीं, बल्कि भारतीय हस्तनिर्मित कपड़ों का उपयोग भी शामिल था.
उन्होंने देश के विभिन्न हिस्सों के वस्त्रों को मंदिर की दैनिक परंपरा में शामिल करने का सुझाव दिया, जिससे धार्मिक प्रथाएं हस्तकरघा को बढ़ावा देने का माध्यम बन सकें. उनके अनुसार, अब इसी तरह के प्रयोग अन्य मंदिरों में भी अपनाए जा रहे हैं.
त्रिपाठी का कहना है कि उनका मुख्य उद्देश्य सांस्कृतिक स्थलों को कारीगरों की आजीविका से जोड़ना है. वे कहते हैं, “अगर डिजाइन लोगों तक नहीं पहुंचता है, तो वह अधूरा रहता है.”
फिलहाल यह डाक टिकट एक प्रतीकात्मक रिकॉर्ड के रूप में भी उपयोग में है. अपनी छोटी सी साइज के साथ यह भारत के वैज्ञानिक लक्ष्यों, सांस्कृतिक कथाओं और इन दोनों को जोड़ने की एक डिजाइनर की कोशिश को दिखाती है.

