अमेरिका और ईरान के बीच संघर्ष विराम की घोषणा से बहुत पहले खाड़ी क्षेत्र के युद्ध ने दूर दक्षिण भारत में अपनी एक अलग ही लड़ाई छेड़ दी थी. प्रवासी मजदूरों पर भारी निर्भर रहने वाले औद्योगिक कस्बे कुकिंग गैस (LPG) की कमी से जूझ रहे थे और उन्हें डर था कि कहीं इसके कारण बड़े पैमाने पर मजदूर पलायन न कर जाएं.
आशंकित औद्योगिक संगठन लगातार यह सुनिश्चित करने में जुटे रहे कि इस अस्थिर LPG संकट के बावजूद मजदूर यहीं टिके रहें. तमिलनाडु के टेक्सटाइल हब तिरुपुर में इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए कुछ खास काम किए गए.
तिरुपुर एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के संयुक्त सचिव और ईस्टर्न ग्लोबल क्लोदिंग के सीईओ कुमार दुरईस्वामी बताते हैं, "LPG की कमी के बावजूद हम स्थिति को संभाल रहे हैं. फिलहाल मजदूर तिरुपुर में ही रुके हुए हैं." उन्होंने स्पष्ट किया कि 5-10 प्रतिशत वर्कफोर्स जा रहा है, जो अप्रैल-मई की अवधि के लिए सामान्य बात है. साथ ही, मजदूरों का यह हिस्सा ज्यादातर पश्चिम बंगाल से है और इस महीने होने वाले चुनावों में मतदान करने के लिए अपने घर जा रहा है.
दुरईस्वामी ने बताया कि LPG संकट- सिलेंडरों की कमी और उनकी बढ़ती कीमतें सैन्य अभियान के अगले कुछ महीनों तक खिंचने की आशंका के कारण और भी गहरा सकता था. इससे कहीं अधिक मजदूरों को अपने पैतृक स्थानों पर लंबे समय के लिए लौटने पर मजबूर होना पड़ता. उनके मुताबिक, "एक बार जब कामगार अपने गांवों और कस्बों में लौट जाते हैं, तो वे जल्दी वापस नहीं आते. इससे उत्पादकता पर गहरा असर पड़ सकता है."
तिरुपुर में अधिकांश प्रवासी मजदूर नियोक्ताओं द्वारा उपलब्ध कराए गए हॉस्टलों में रहते हैं. कुछ अपने परिवारों के साथ औद्योगिक क्लस्टर के पास किराए पर रहते हैं. हॉस्टल की सुविधा देने वाले अधिकांश नियोक्ताओं ने मजदूरों के लिए पका हुआ भोजन उपलब्ध कराना शुरू कर दिया है ताकि उन्हें कोई असुविधा न हो. साथ ही, कई हॉस्टल वैकल्पिक ईंधन जैसे तेल भट्टी और लकड़ी आधारित खाना पकाने की ओर रुख कर रहे हैं. कुछ हॉस्टलों में पाइप्ड नेचुरल गैस की पहुंच हो गई है.
स्थानीय प्रशासन CNG को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहा है और इस क्षेत्र में पाइप्ड नेचुरल गैस के विस्तार में तेजी लाने के लिए अदाणी गैस को नियुक्त किया गया है. यह काम युद्ध स्तर पर किया जा रहा है और उद्योग को उम्मीद है कि अगले 15 दिनों के भीतर इसकी आपूर्ति शुरू हो जाएगी.
दुरईस्वामी बताते हैं, "हम सक्रिय रूप से स्थिति पर नजर रख रहे हैं और सामुदायिक रसोई की व्यवस्था कर रहे हैं. अगर सामूहिक रूप से भोजन तैयार किया जाता है, तो ऊर्जा की खपत काफी कम की जा सकती है." तिरुपुर एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के प्रतिनिधियों ने हाल ही में तमिलनाडु के मुख्य सचिव एन. मुरुगनंदन से मुलाकात की और LPG समस्या के कारण मजदूरों की बुरी हालत पर चर्चा करते हुए उनसे सहयोग मांगा.
LPG की कमी ने सिलेंडरों की कीमतों में भारी उछाल ला दिया है. दुरईस्वामी के अनुसार, "19 किलोग्राम वाला कमर्शियल गैस सिलेंडर जो पहले लगभग 1,200 रुपए में मिलता था, अब उसे करीब 3,000 रुपए में लेना पड़ रहा है."
भारत की निटवियर राजधानी के रूप में जाना जाने वाला तिरुपुर प्रवासी मजदूरों का एक बड़ा केंद्र है, जो प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से दस लाख से अधिक लोगों को रोजगार देता है. स्थानीय उद्योग खुद भी मुश्किल में है क्योंकि LPG टेक्सटाइल प्रोसेसिंग के विभिन्न चरणों, जैसे स्टेंटर, ड्रायर और बॉयलर के लिए गर्मी पैदा करने और रंगाई व छपाई के साथ-साथ हॉस्टल कैंटीन के संचालन के लिए एक महत्वपूर्ण ईंधन स्रोत है.
इसके अलावा, सहायक उद्योग जैसे होटल, लॉज, बेकरी और चाय की दुकानों को भी LPG की जरूरत होती है. तिरुपुर में ये सभी क्षेत्र मिलकर प्रतिदिन लगभग 150 टन LPG की खपत करते हैं. टेक्सटाइल क्षेत्र की आवश्यकता को मिलाकर, तिरुपुर में कुल LPG मांग लगभग 350 टन प्रतिदिन होने का अनुमान है.
इसी तरह, मार्च में कोयंबटूर डिस्ट्रिक्ट स्मॉल इंडस्ट्रीज एसोसिएशन (CODISSIA) ने 50 अन्य निर्माता संघों के साथ मिलकर जिला आपूर्ति अधिकारियों के समक्ष LPG संकट का मुद्दा उठाना शुरू किया. एक सप्ताह के भीतर, प्रशासन ने उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए IOCL, BPCL और HPCL के साथ समन्वय किया.
CODISSIA के अध्यक्ष एम. कार्तिकेयन बताते हैं, "उन्होंने विशेष रूप से मजदूरों के लिए 5 किलो के सिलेंडर उपलब्ध कराए. इससे कोयंबटूर को मजदूरों के पलायन को अच्छी तरह से संभालने में मदद मिली है." अब तक केवल प्रवासी मजदूरों को 1,645 सिलेंडर दिए जा चुके हैं और अधिक आपूर्ति की प्रक्रिया जारी है. कोयंबटूर पंप और मोटर निर्माण का एक बड़ा केंद्र है और यहां 250,000 से अधिक MSME इकाइयां स्थित हैं.

