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लोकसभा चुनाव 2024: वे निर्दलीय जिन्होंने उड़ाई भाजपा सहित सभी पार्टियों की नींद

लोकसभा चुनाव 2024 में कुछ ऐसे निर्दलीय उम्मीदवार हैं जो अपने-अपने क्षेत्र में भाजपा, कांग्रेस समेत क्षेत्रीय पार्टियों के लिए भी खतरा साबित हो सकते हैं

बाड़मेर-जैसलमेर लोकसभा सीट से निर्दलीय उम्मीदवार रविंद्र सिंह भाटी
बाड़मेर-जैसलमेर लोकसभा सीट से निर्दलीय उम्मीदवार रविंद्र सिंह भाटी
अपडेटेड 24 अप्रैल , 2024

लोकसभा चुनाव 2024 में बिहार से लेकर राजस्थान और बंगाल से लेकर महाराष्ट्र तक कई नेता ऐसे हैं जो किसी पार्टी के बैनर तले तो नहीं हैं, लेकिन उनके मैदान में होने से सबसे ज्यादा टेंशन राजनीतिक पार्टियों को ही हो रही है. इसकी बड़ी वजह है अपने इलाकों में उन नेताओं की मजबूत जमीनी पकड़.

इस लोकसभा चुनाव में बीजेपी को चुनौती देने के लिए बने 'इंडिया गठबंधन' की नींव बिहार में रखी गई. बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इसके सूत्रधार बने. हालांकि नीतीश के दोबारा एनडीए के पाले में जाने के बाद गठबंधन की पार्टियों राजद और कांग्रेस को बिहार में एक अदद मजबूत सहयोगी की दरकार थी.

यह जरूरत पूरी हुई बिहार के ही बाहुबली माने जाने वाले नेता पप्पू यादव के रूप में. पप्पू एक वक्त लालू यादव के काफी करीबी माने जाते थे, यहां तक कि उनको लालू का उत्तराधिकारी तक कहा जाता था. वे पांच बार लोकसभा सांसद भी रह चुके हैं.

हालांकि समय के साथ-साथ पप्पू और लालू के बीच में दूरियां बढ़ती गईं और पप्पू ने साल 2015 'जन अधिकार पार्टी' बनाई. इस पार्टी ने 2015 में बिहार के विधानसभा चुनावों में हिस्सा लिया. हालांकि उनकी पार्टी को कुछ खास सफलता हासिल नहीं हो पाई. इसके बाद साल 2024 में पप्पू ने अपनी पार्टी का विलय कांग्रेस के साथ कर लिया.

इस विलय के बाद से ही ऐसा अंदेशा था कि गठबंधन की ओर से पप्पू पूर्णिया में कांग्रेसी उम्मीदवार होंगे. लेकिन राजद के विरोध के बाद यह बात आगे नहीं बढ़ सकी. हालांकि अब पूर्णिया सीट पर बीमा भारती राजद के टिकट पर गठबंधन उम्मीदवार हैं. लेकिन पप्पू ने भी इसी सीट से निर्दलीय के तौर पर अपना पर्चा भरा है. वहीं एनडीए गठबंधन की तरफ से संतोष कुशवाहा भी मैदान में हैं.

भले ही संतोष कुशवाहा पूर्णिया के मौजूदा सांसद भी हों, पर बीमा और एनडीए गठबंधन दोनों के लिए पप्पू बड़ी चुनौती साबित हो सकते हैं. इसकी सबसे बड़ी वजह है कि वे इस क्षेत्र के पुराने और सबसे कद्दावर नेताओं की लिस्ट में शामिल हैं. इसके अलावा उन्होंने अपने आपराधिक इतिहास के बावजूद क्षेत्र में 'रॉबिनहुड' की छवि बनाने के लिए कड़ी मेहनत भी की है.

पप्पू यादव तीन बार पूर्णिया सीट से ही संसद तक का और एक बार विधानसभा तक का सफर तय कर चुके हैं. पप्पू ने पूर्णिया से अपना पहला और तीसरा लोकसभा चुनाव निर्दलीय के तौर पर ही जीता था. इसके अलावा वे खुद को इस जिले का बेटा भी बताते रहे हैं. हालांकि 2019 के लोकसभा चुनाव में पप्पू ने मधेपुरा से अपनी दावेदारी पेश की थी पर इसमें उनको बुरी हार का सामना करना पड़ा था. इस चुनाव में जदयू नेता दिनेश चंद्र यादव को जीत मिली थी.

लोकसभा चुनाव के दूसरे चरण में जिन सीटों पर मतदान होना है उनमें बाड़मेर-जैसलमेर सीट चुनावी एक्सपर्ट्स के बीच चर्चा का टॉपिक बनी हुई है. इसकी सबसे बड़ी वजह हैं राजस्थान की शिव सीट के निर्दलीय विधायक रवीन्द्र सिंह भाटी, जिन्होंने भाजपा उम्मीदवार और केंद्रीय कृषि राज्य मंत्री कैलाश चौधरी और कांग्रेस के प्रत्याशी उम्मेदराम की मुश्किलों को बढ़ा दिया है.

चुनाव के ऐलान के बाद से ही इस सीट पर कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधा मुकाबला माना जा रहा था, लेकिन भाटी की उम्मीदवारी ने अब चुनाव को त्रिकोणीय बना दिया है. भाटी इससे पहले विधानसभा चुनाव में भी निर्दलीय रहते हुए अपनी राजनीतिक ताकत का परिचय दे चुके हैं. वहीं क्षेत्र में होने वाली उनकी रैलियों में समर्थकों का हुजूम भी खूब देखने को मिल रहा है. क्योंकि भाटी ने छात्र राजनीति से अपने करियर की शुरुआत की है तो उनको युवाओं का भी खूब साथ मिल रहा है.

बिहार की ही सिवान लोकसभा सीट पर भी निर्दलीय प्रत्याशी हिना शहाब की दावेदारी की वजह से इंडिया गठबंधन और एनडीए दोनों ही टेंशन में हैं. सिवान और बिहार की सियासत के साथ अपराध की दुनिया के बड़े नाम शहाबुद्दीन की पत्नी हिना का कहना है कि वे यह चुनाव अपने पति शहाबुद्दीन को श्रद्धांजलि देने के लिए लड़ रही हैं. उनके इस कदम से आरजेडी को मुस्लिम वोटों के छिटकने का डर सता रहा है.

हिना शहाब सिवान की सबसे मजबूत उम्मीदवार भी बताई जा रही हैं. इसकी एक सबसे बड़ी वजह यह बताई जा रही है कि इस इलाके में उनके पति शहाब का दबदबा था. इसके अलावा शहाब और लालू की नजदीकियां बिहार में किसी से छुपी नहीं है. एक वक्त शहाब लालू के एम वाई समीकरण के पोस्टर बॉय तक बताए जाते थे.

शहाब को सिवान के अलावा सारण मंडल के कई जिलों के मुस्लिम वोटों पर एकछत्र पकड़ हासिल थी. इसके अलावा लोकल लोगों का सपोर्ट भी साथ देता था. हालांकि शहाब की मौत के बाद उनके परिवार की लालू परिवार के साथ दूरियां बढ़ती चली गईं. जिसका नतीजा यह है कि हिना अब अकेले चुनावी मैदान में हैं जिसका सबसे ज्यादा नुकसान आरजेडी को ही उठाना पड़ सकता है.

यूपी से सटे राजस्थान के जिले भरतपुर में भी भाजपा की बागी और निर्दलीय प्रत्याशी विधायक ऋतु बनावत राज्य और केंद्र की सत्ताधारी पार्टी बीजेपी के लिए सरदर्द बनी हुई हैं. ऋतु ने राजस्थान का विधानसभा चुनाव बयाना से लड़ा था और पार्टी की दमदार लहर के बावजूद वे चुनाव जीतने में कामयाब रहीं.

वहीं इस लोकसभा चुनाव में भी अब वे निर्दलीय के तौर पर ही भरतपुर से मैदान में हैं. उनकी उम्मीदवारी का सबसे ज्यादा नुकसान बीजेपी उम्मीदवार रामस्वरूप कोली को हो सकता है. लोकसभा चुनाव जीतने के लिए ऋतु जमीनी स्तर से अपनी तैयारियों को पुख्ता करने में जुटी हुई हैं. वे जनसंपर्क यात्राएं करने की योजना भी बना रही हैं. अपने भाषण में वे भाजपा और कांग्रेस दोनों पर खुलकर हमलावार भी हैं.

राजस्थान की तरह पश्चिम बंगाल में भी भाजपा के ही एक और विधायक बिष्णु प्रसाद शर्मा भी पार्टी की मुश्किलें बढ़ा रहे हैं. शर्मा ने दार्जलिंग लोकसभा सीट से निर्दलीय के तौर पर अपना पर्चा भरा है. उन्होंने भाजपा के प्रत्याशी राजू बिस्वा को बाहरी बताया है. उन्होंने भाजपा से दार्जलिंग में किसी लोकल उम्मीदवार को ही टिकट देने की गुजारिश की थी. 

शर्मा का कहना है कि उनको राजू बिस्वा से कोई समस्या नहीं है, लेकिन भाजपा के राज्य में बाहरी लोगों को भेजे जाने से दिक्कत है. बाहरी लोगों ने इस क्षेत्र के लिए कुछ नहीं किया है. हम चाहते हैं कि दार्जलिंग का प्रतिनिधित्व एक 'भूमिपुत्र' करे. भले ही शर्मा निर्दलीय के तौर पर चुनावी मैदान में हों पर उनका यह भी कहना है कि वे भाजपा कि सदस्यता नहीं छोड़ेंगे. 

जहां बंगाल में अपने ही नेता की वजह से भाजपा की मुश्किलें बढ़ी हैं तो वहीं महाराष्ट्र में अपने ही नेता के चलते कांग्रेस टेंशन में आ गई है. दरअसल महाराष्ट्र के दिवंगत मुख्यमंत्री वसंतदादा पाटिल के पोते और कांग्रेस के पुराने नेता विशाल पाटिल ने सांगली लोकसभा सीट से निर्दलीय पर्चा भरा है. यह इलाका कांग्रेस का गढ़ माना जाता है. हालांकि 2024 के चुनाव में गठबंधन के तहत यह सीट शिव सेना (यूबीटी) को दी गई है. 

विशाल पाटिल कांग्रेस से सांगली सीट के लिए टिकट की मांग कर रहे थे. सीट-बंटवारे समझौते के तहत, पूर्व मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे का शिवसेना (यूबीटी) गुट 21 सीटों पर चुनाव लड़ेगा, कांग्रेस 17 सीटों पर चुनाव लड़ेगी, जबकि शरद पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी 10 सीटों पर चुनाव लड़ेगी. 

अपना नामांकन दाखिल करने के बाद एक सार्वजनिक बैठक को संबोधित करते हुए विशाल ने कहा कि मैं 1998 से 25 वर्षों तक कांग्रेस के लिए काम कर रहा हूं. 2002 में, मैंने कांग्रेस से जिला परिषद सदस्य के रूप में टिकट मांगा था. 2005 में जब मेरे पिता का निधन हुआ तो मुझे लगा कि मुझे चुनाव लड़ना चाहिए, लेकिन मेरी जगह हमारे परिवार के किसी अन्य सदस्य को टिकट मिल गया. 

शिवसेना (यूबीटी) ने पहलवान से नेता बने चंद्रहार पाटिल को सांगली से मैदान में उतारा है. हालांकि सांगली से पिछले कई चुनावों में वसंतदादा पाटिल का परिवार ही जीत दर्ज करता आया है. लेकिन 2019 के चुनाव में विशाल पाटिल को भाजपा के उम्मीदवार के हाथों हार का सामना करना पड़ा था. 

दक्षिण भारत के सबसे ज्यादा सीटों वाले राज्य तमिलनाडु में पूर्व मुख्यमंत्री और अन्नाद्रमुक से निष्कासित नेता ओ. पन्नीरसेल्वम उर्फ ओपीएस ने रामनाथपुरम लोकसभा क्षेत्र में एआईएडीएमके की परेशानियों को बढ़ा दिया है. यह ओपीएस का पहला लोकसभा चुनाव होने वाला है. अन्नाद्रमुक पर दावा करने के अपने सभी कानूनी विकल्पों के साथ और राज्य विधानसभा में अपने उपनेता पद से भी छीन लिए जाने के बाद, ओपीएस ने अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गा राइट्स रिट्रीवल ऑर्गनाइजेशन लॉन्च किया था. 

पूर्व मंत्री वैथीलिंगम और मनोज पांडियन अन्नाद्रमुक के ऐसे दो नेता हैं जो अन्नाद्रमुक को फिर हासिल करने की लड़ाई में ओपीएस का साथ दे रहे हैं. हालांकि अब ओपीएस के सामने लोकसभा चुनाव में खुद की पहचान स्थापित करने की चुनौती भी है. 

तमिलनाडु के अलावा दक्षिण भारत के एक और राज्य कर्नाटक के पूर्व उप मुख्यमंत्री ईश्वरप्पा की वजह से बीजेपी मुश्किल में दिखाई दे रही है. ईश्वरप्पा हावेरी सीट से अपने बेटे केई कांतेश के लिए टिकट की मांग कर रहे थे. लेकिन बीजेपी के नकारने के बाद उन्होंने खुद इस सीट से निर्दलीय लड़ने का फैसला किया. हालांकि उनके इस कदम से खफा होते हुए पार्टी ने उनको छह साल के लिए निष्कासित भी कर दिया है. हावेरी में ईश्वरप्पा का मुकाबला बीजेपी के बसवराज बोम्मई से होगा.

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