दिल्ली के समयपुर बदली में पाटलीपुत्र नर्सिंग होम के डॉ. सुरेंद्र चड्ढा हर साल लेड पॉइजनिंग यानी सीसे के जहर के शिकार 80-90 लोगों का इलाज करते हैं. इनके पास दिल्ली NCR, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और दूर-दराज के जम्मू-कश्मीर से कई सारे मरीज आते हैं.
ये ज्यादातर मरीज औद्योगिक कामगार होते हैं, जो इलाज कराने के लिए बहुत दूर से आते हैं. लेड पॉइजनिंग से आमतौर पर पेट दर्द और उल्टी होती है, लेकिन गंभीर मामलों में मरीज कोमा में चला जाता है. दौरे पड़ सकते हैं या मौत भी हो सकती है.
इस जहर के शिकार मरीजों की अगर जान बच भी जाए, फिर भी स्थाई तौर पर उसके नर्वस सिस्टम को नुकसान पहुंच सकता है. इस जहर को और भी खतरनाक बनाने वाली बात यह है कि इसके लक्षण बहुत सामान्य होते हैं, जिसकी वजह से अक्सर इसकी पहचान ही नहीं हो पाती.
इसलिए इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि दिल्ली-NCR, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में बैटरी रीसाइक्लिंग इकाइयों के आसपास की मिट्टी में काफी ज्यादा मात्रा में लेड यानी सीसा पाया गया है. इसके कारण इस पूरे आसपास क्षेत्र की मिट्टी प्रदूषित हो गई है. पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाली संस्था टॉक्सिक्स लिंक ने अपनी एक रिपोर्ट में इसका खुलासा किया है. इस संस्था का कहना है कि बैटरी रीसाइक्लिंग के कारण इस पूरे इलाके में सीसा की मात्रा ज्यादा हो गई है.
इस रिपोर्ट में अधिकृत (केंद्रीय या राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों के जरिए सूचीबद्ध) और अनधिकृत (अनौपचारिक) लेड-एसिड बैटरी रिसाइक्लिंग करने वाली कंपनियों के पास से एकत्र किए गए 23 तरह की मिट्टी के नमूनों में प्रदूषण का जांच किया गया. ये नमूने आवासीय क्षेत्रों, स्थानीय समुदायों और प्राथमिक विद्यालयों के निकट स्थित स्थानों से लिए गए थे.
जांच में सभी नमूनों में बड़े स्तर पर सीसा प्रदूषण पाया गया, जिसकी मात्रा 100 पार्ट्स प्रति मिलियन (पीपीएम) से लेकर 43,800 पीपीएम तक थी. चिंताजनक रूप से 52 फीसद यानी 23 में से 12 मिट्टी के नमूने में सीसे की मात्रा 5,000 पीपीएम के मानक से अधिक दर्ज की गई. मिट्टी में इतना ज्यादा लेड मिलने के कारण इन क्षेत्रों को पर्यावरण संरक्षण (प्रदूषित स्थलों का प्रबंधन) नियम, 2025 के तहत खतरनाक प्रदूषित स्थलों के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है.
अन्य नमूनों में से 31 फीसद में नियमों के तहत तय मात्रा से ज्यादा लेड की मात्रा पाई गई. कई स्थानों पर बैटरी रिसाइक्लिंग इकाइयों से निकलने वाला कचरा खुले में फेंका हुआ पाया गया, जिससे मिट्टी और भूजल प्रदूषण का खतरा काफी बढ़ जाता है.
विडंबना यह है कि औपचारिक रिसाइक्लिंग कंपनियों से एकत्र किए गए नमूनों में अनौपचारिक इकाइयों की तुलना में ज्यादा सीसे की मात्रा पाई गई है. टॉक्सिक्स लिंक के एसोसिएट डायरेक्टर सतीश सिन्हा के मुताबिक, "ये नतीजे इस भारी धातु के पर्यावरणीय रिसाव के प्रबंधन में खामियों की ओर इशारा करते हैं."
सीसा जहर फैलने की प्रमुख वजह
सीसा एक ऐसा विषैला पदार्थ है, जो शरीर में पानी, खाना आदि के जरिए धीरे-धीरे पहुंचता है. इसके संपर्क में आने पर कोई सुरक्षित नहीं रह सकता. इसे वैश्विक स्तर पर सबसे गंभीर पर्यावरणीय स्वास्थ्य जोखिमों में से एक माना जाता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, इससे हर साल अनुमानित 540,000 मौतें होती हैं और लाखों लोगों को बीमारी-विकलांगता से जूझना पड़ता है. इसके कारण निम्न और मध्यम आय वाले देशों (LMICs) के ज्यादातर लोग बीमार पड़ते हैं.
लेड यानी सीसा कई तरीकों से शरीर में प्रवेश कर सकता है, जैसे कि सांस लेना, दूषित भोजन, पानी, धूल और त्वचा का संपर्क. एक बार शरीर के अंदर पहुंचने पर सीसा गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं पैदा कर सकता है. बच्चे और गर्भवती महिलाएं विशेष रूप से संवेदनशील होती हैं क्योंकि कम मात्रा में भी सीसा मस्तिष्क के विकास को बाधित कर सकता है. इससे पहचान संबंधी समस्या, अनुचित व्यवहारों का पैटर्न, ध्यान केंद्रित करने में समस्याएं हो सकती हैं.
सीसा प्रदूषण से आर्थिक नुकसान भी काफी अधिक होता है. न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय के जरिए किए गए एक वैश्विक अध्ययन के मुताबिक, निम्न और मध्यम आय वाले देशों में सीसा के संपर्क में आने वाले बच्चों की बुद्धि और उत्पादकता में कमी के कारण प्रतिवर्ष 977 अरब डॉलर (91.1 लाख करोड़ रुपए) का नुकसान होता है. अकेले भारत में ही यह आर्थिक नुकसान प्रति वर्ष 236 अरब डॉलर (22 लाख करोड़ रुपए) होने का अनुमान है, जो देश के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का लगभग 5 फीसद है.
आखिर कैसे होगा इसका समाधान
इंडियन सोसाइटी फॉर लीड अवेयरनेस एंड रिसर्च के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. वेंकटेश थुप्पिल भारत में 'लेड मैन' के नाम से मशहूर हैं. उन्होंने कहा कि सभी जिलों को शामिल करते हुए लेड और अन्य खतरनाक पदार्थों से फैलने वाले जहर के बारे में राष्ट्रीय डेटाबेस तैयार करना सर्वोच्च प्राथमिकता है. उन्होंने सीसा, कीटनाशक, कीटनाशक और अन्य प्रदूषकों जैसे विषाक्त पदार्थों के संपर्क में आने वाले लोगों की निगरानी के लिए एक राष्ट्रव्यापी जैव निगरानी प्रणाली का भी प्रस्ताव रखा. यह प्रणाली न केवल मनुष्यों में बल्कि मिट्टी, हवा, पानी, भोजन और जानवरों में भी लागू होगी. इसे जिला स्तरीय सरकारी अस्पतालों के माध्यम से कार्यान्वित किया जा सकता है.
टॉक्सिक्स लिंक रिपोर्ट में तत्काल इस पूरे मामले में दखल देने की मांग की गई है. इसमें कहा गया है कि जागरूकता, सक्रिय परीक्षण और व्यवहार में बदलाव से सीसा के कारण फैलने वाले प्रदूषण को रोका जा सकता है. प्रमुख सिफारिशों में सीसा-एसिड बैटरियों के अनियमित और बिना कानूनी प्रक्रिया पूरे किए रिसाइक्लिंग पर रोक लगाना. विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR) दिशानिर्देशों के प्रवर्तन को मजबूत करना और सभी संयंत्रों में सबसे बेहतर उपलब्ध प्रौद्योगिकी (BAT) और पर्यावरणीय प्रक्रियाओं (BEP) को लागू करना शामिल है.
रिपोर्ट में रिसाइक्लिंग वाली जगहों के आसपास की मिट्टी, हवा, पानी और घरेलू धूल में सीसे के स्तर की निगरानी बढ़ाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया है, ताकि पर्यावरणीय प्रदूषण और मानव और पशु स्वास्थ्य पर इसके संभावित प्रभाव को रोका जा सके.
सीसा के संपर्क में आने वाली आबादी का नियमित स्वास्थ्य मूल्यांकन करने की बात कही गई है. भविष्य में होने वाले नुकसान की शीघ्र पहचान और रोकथाम के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है. इसके अतिरिक्त, उपभोक्ताओं को सीसे की विषाक्तता के खतरों के बारे में जागरूक करना काफी जरूरी है. इसके अलावा, कानूनी चैनलों के जरिए इस्तेमाल किए गए बैटरियों को रिसाइक्लिंग करना स्वास्थ्य जोखिमों को काफी हद तक कम कर सकता है.

