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जब 'कलकत्ते' के दम पर अकड़ते थे अंग्रेज, भव्य इमारतें लंदन-रोम को टक्कर देती थीं

कलकत्ता ब्रिटिश साम्राज्य के दौरान लंदन के बाद दूसरा सबसे महत्वपूर्ण शहर था. फिर ऐसा क्या हुआ कि वही शहर सियासी उन्माद, पलायन और अनवरत पतन की अमिट पहचान बन गया

कभी लंदन को टक्कर देती थी कलकत्ता की इमारतें
कभी लंदन को टक्कर देती थी कलकत्ता की इमारतें
अपडेटेड 13 अप्रैल , 2026

"कलकत्ते का जो जिक्र किया तूने हमनशीं, इक तीर मेरे सीने में मारा कि हाय-हाय." ये पंक्ति फारसी-उर्दू के महान शायर मिर्जा गालिब की है. दरअसल, 1828 में गालिब अपनी पेंशन से जुड़े कामकाज के चलते कलकत्ता गए थे. फिर यह शहर उनके मन को ऐसा भाया कि डेढ़ साल यहीं रह गए. जब लौटे तो इतनी गहरी यादें लेकर लौटे कि कलकत्ता की याद में उन्होंने यह पंक्ति लिख डाली.

गालिब को कलकत्ता और दुनिया छोड़े अरसों बीत चुके हैं. अब न कलकत्ता वैसा रहा और न वहां का जिक्र. कलकत्ता (अब तो कोलकाता हुए भी लंबा अरसा बीत चुका) की चर्चा अब सियासी रस्साकशी के अलावा किसी दूसरे मुद्दे पर मुश्किल ही होती है.

ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर 'गेटवे ऑफ ईस्ट' के नाम से दुनिया में मशहूर इस शहर ने धीरे-धीरे कैसे अपनी रौनक खो दी?

अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जर्नल में बिजनसमैन और लेखक राजीव मंत्री लिखते हैं कि 1965 में सिंगापुर के संस्थापक और पीएम ली कुआन यू ने कहा था कि वे सिंगापुर को कलकत्ते की तरह बनाना चाहते हैं.

58 साल बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सितंबर 2024 में उसी सिंगापुर की तारीफ में कहते हैं, "सिंगापुर हर विकासशील देश के लिए प्रेरणा है. हम भारत में कई सिंगापुर बनाना चाहते हैं."

मतलब साफ है कि बीते सालों में सिंगापुर जहां तरक्की की राह पर चला कलकत्ता के साथ ठीक इसका उलट हुआ. तो आखिर कलकत्ता के साथ ऐसा क्या हुआ कि उसने सपनों के शहर का दर्जा खो दिया?

19वीं सदी के कलकत्ता की तस्वीर (फोटो साभार: historyfinder.in)
19वीं सदी के कलकत्ता की तस्वीर (फोटो साभार: historyfinder.in)

 कलकत्ता बनने की शुरुआत 

कलकत्ता को 2001 के बाद कोलकाता कहा जाता है. इसके नाम और स्थापना की 3 अलग-अलग थ्योरी हैं :

1. कुछ लोगों का मानना है कि कलकत्ता बंगाली नाम कालीकता का अंग्रेजीकृत रूप है. 'कालीकता' बंगाली शब्द कालीक्षेत्र से लिया गया है, जिसका अर्थ है काली देवी की भूमि.

2. एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका के मुताबिक, इस शहर का नाम कलिकाता नाम के गांव पर रखा गया है. ऐसा कहा जाता है कि इस शहर की स्थापना हुगली नदी के किनारे बसे 3 छोटे गांवों सूतानुति, कलिकाता और गोविंदपुर के मिलने से हुई थी.

3. तीसरी थ्योरी के मुताबिक, कलकत्ता सीप के चूने के लिए काफी फेमस था. बंगाल में चूने (कैल्शियम ऑक्साइड) को काली और सीप को  काटा कहते हैं.  इसके चलते शहर को कलकत्ता कहा गया.

जादवपुर विश्वविद्यालय की प्रोफेसर सुकांता चौधरी ने कलकत्ता के इतिहास पर किताब लिखी है, 'कलकत्ता: द लिविंग सिटी'. इसके मुताबिक 24 अगस्त 1690 को ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के एजेंट जॉब चार्नोक ने पहली बार सूतानुति गांव में कंपनी का कारखाना बनवाया था. माना जाता है कि इसी के साथ शहर के कदम आधुनिकता की तरफ बढ़े.

ऐसा इसलिए क्योंकि अंग्रेजी सरकार ने अपनी विस्तारवादी नीतियों के तहत कलकत्ता का खूब विकास किया. अंग्रेजों ने यहां कई भव्य इमारतें बनवाईं, जिसके चलते कलकत्ता को 'महलों का शहर' और 'पूर्व का रोम' कहा जाने लगा.

स्वेज नहर बनने से पहले व्यस्त कलकत्ता पोर्ट की तस्वीर
स्वेज नहर बनने से पहले व्यस्त कलकत्ता पोर्ट की तस्वीर

1772 में भारत के पहले ब्रिटिश गवर्नर-जनरल वारेन हेस्टिंग्स ने मुर्शिदाबाद से बंगाल की राजधानी कलकत्ता स्थानांतरित करने का फैसला लिया, जो 1911 तक ब्रिटिश भारत की राजधानी भी रही. इसके अलावा कलकत्ता में कई अलग-अलग विचारधाराओं से प्रेरित एलीट शैक्षणिक संस्थान खुले जैसे बंगाल स्कूल ऑफ आर्ट्स, प्रेसिडेंसी यूनिवर्सिटी, एशियाटिक सोसायटी.
 
वहीं, राजा राममोहन रॉय,  रवींद्रनाथ ठाकुर, स्वामी विवेकानंद जैसे विद्वानों ने यहां के समाज में नई तरह के विचारों की नींव डाली और तर्क के आधार पर सोचने संस्कृति को बढ़ावा दिया.    
 
हालांकि साल 2003 में एक दिलचस्प घटना घटी, जब कलकत्ता हाईकोर्ट ने जॉब चार्नोक को कलकत्ता शहर को बसाने वाला मानने से इनकार कर दिया. कोर्ट ने कहा कि उनका नाम स्कूली पाठ्यपुस्तकों, आधिकारिक दस्तावेजों और वेबसाइटों से हटा दिया जाना चाहिए क्योंकि इस शहर को बसाने का श्रेय किसी एक अंग्रेज को नहीं दिया जा सकता.

अंग्रेजी हुकूमत में कलकत्ता का जलवा कैसा था? 

1800 तक कलकत्ता शहर को देश की आर्थिक शक्ति का मुकुट माना जाता था. सेंट जेवियर्स कॉलेज कोलकाता से जुड़ी जेवियर फाइनेंस कम्युनिटी ने अपनी रिसर्च में पाया कि मुगल काल में कोलकाता का दुनिया की GDP में 12 फीसदी योगदान था.

ईस्ट इंडिया कंपनी के लिए लंदन के बाद कलकत्ता दूसरा सबसे महत्वपूर्ण शहर बन गया था. 1870 से 1940 तक कलकत्ता से होते हुए सामान दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में भेजा जाता था.

अमेरिकी अर्थशास्त्री चार्ल्स किंडलबर्गर के मुताबिक, कलकत्ता न केवल ब्रिटिश शासन की राजनीतिक राजधानी थी, बल्कि वाणिज्यिक राजधानी भी थी. 1871 से 1939 के बीच अधिकांश समय में बंगाल से होने वाला व्यापार बंबई से अधिक था.

इस ग्राफिक्स में देख सकते हैं कि 1930 तक कलकत्ता में बॉम्बे से ज्यादा कंपनियां थीं
इस ग्राफिक्स में देख सकते हैं कि 1930 तक कलकत्ता में बॉम्बे से ज्यादा कंपनियां थीं

ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में कलकत्ता में ही पहली बार बैंकिंग सिस्टम शुरू किया था. 1806 में बैंक ऑफ कलकत्ता की स्थापना के करीब 34 साल बाद 1840 में बॉम्बे बैंक की स्थापना हुई.

कलकत्ता के विकास के साथ ही आसपास के इलाके में कई सारी कंपनियों के दफ्तर खुले. 1918 तक करीब 45 से 50 फीसद भारतीय कंपनियों का रजिस्ट्रेशन बंगाल में हुआ, जबकि बॉम्बे में यह हिस्सा 13 से 15 फीसद ही था.

1913 में कुल क्लियरिंग हाउस लेनदेन (बैंकों के बीच का लेनदेन) 65,035 लाख रुपए था, जिनमें से कलकत्ता का हिस्सा 51 फीसद था, जबकि बॉम्बे का 33.7 फीसद. यह आंकड़ा दोनों शहरों की आर्थिक स्थिति के अंतर को दिखाता है. हालांकि, 1913 तक कलकत्ता का प्रभुत्व कम होने लगा था.  

ग्राफिक्स में देख सकते हैं कि बैंक ऑफ बंगाल में 1900 से पहले बॉम्बे की तुलना में ज्यादा पैसों का लेन-देन होता था
ग्राफिक्स में देख सकते हैं कि बैंक ऑफ बंगाल में 1900 से पहले बॉम्बे की तुलना में ज्यादा पैसों का लेन-देन होता था

कलकत्ता के पतन की कहानी 

देश की आजादी के वक्त तक कलकत्ता की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर हो गई थी. तमाम चुनौतियों के बावजूद 1960 के दशक की शुरुआत तक कलकत्ता के व्यस्त बंदरगाह और जीवंत व्यापार ने पश्चिम बंगाल को एक शीर्ष आर्थिक राज्य बनाए रखा था. इस शहर की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से 127.5 फीसद अधिक थी, लेकिन बावजूद इसके कलकत्ता से ज्यादा अब भारत के दो अन्य शहरों बॉम्बे और मद्रास की GDP थी.

जेवियर फाइनेंस कम्युनिटी ने कलकत्ता और बंगाल के आर्थिक पतन की 4 मुख्य वजहें बताई हैं:

1. स्वेज नहर का निर्माण: 1869 में स्वेज नहर बनने से पहले तक कलकत्ता खूब विकसित हुआ. यह अंग्रेजों के लिए  एशिया से आयात और निर्यात का प्रमुख केंद्र बन गया था. हालांकि, स्वेज नहर खुलने से अब यूरोप और पश्चिमी देशों में जाने के लिए रास्ता छोटा हो गया. इससे पहले केप ऑफ गुड होप का लंबा रास्ता तय कर जहाज कलकत्ता पहुंचती थी. वहीं जब स्वेज नहर से आवाजाही शुरु हुई तो बॉम्बे से सामान लाना और ले जाना ज्यादा आसान हो गया. कलकत्ता पहले की तरह व्यापार केंद्र नहीं रहा, इसकी जगह बॉम्बे ने ले ली.

2. सेकेंड वर्ल्ड वॉर का असर : कलकत्ता बंदरगाह की स्थापना ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1870 में की थी. यहां से जूट, चाय, कोयला और कच्चा कपास जैसी वस्तुओं का परिवहन होता था. इसके अलावा, यह शहर जहाज निर्माण और मरम्मत का भी एक प्रमुख केंद्र था.

उस समय कलकत्ता में बड़े-बड़े ड्राई डॉक होते थे, जिन्हें जहाजों का सर्विस सेंटर भी कह सकते हैं. 1942 में जापानी सेना ने शहर पर कई बार बमबारी की, जिससे कोलकाता बंदरगाह बुरी तरह प्रभावित हुआ.

3. बंगाल का अकाल: 1943 में अंग्रेजों की गलत नीतियों से बंगाल में अकाल पड़ा. इसने कोलकाता की अर्थव्यवस्था को भीषण आघात पहुंचाया. बंगाल में फसल बर्बादी के चलते 30 लाख से ज्यादा लोग भूख से मर गए. इस अकाल का असर लंबे समय तक पश्चिम बंगाल और कलकत्ता पर रहा, जिसने शहर की अर्थव्यवस्था को तबाह कर दिया था.

बंगाल में अकाल के दौरान भूख से तड़पते बच्चों की तस्वीर (फोटो साभार गेटी इमेजेज)
बंगाल में अकाल के दौरान भूख से तड़पते बच्चों की तस्वीर (फोटो साभार गेटी इमेजेज)

4. विभाजन का असर :1947 में बंगाल के विभाजन से पूर्वी पाकिस्तान का निर्माण हुआ, जिसके आर्थिक प्रभावों में विशेष रूप से जूट उद्योग पर गहरा असर पड़ा. इससे पहले कलकत्ता पूरे राज्य के जूट की खेती और उससे जुड़े व्यापार का प्रमुख केंद्र था.

विभाजन के बाद कलकत्ता की मिलों के लिए कच्चे माल की उपलब्धता कम हो गई. इससे पश्चिम बंगाल में जूट प्रोडक्ट्स की उत्पादन क्षमता में कमी आई. इसके बाद लगातार उद्योगपतियों को सरकारी समर्थन की कमी और निराशा का सामना करना पड़ा.

आजादी के बाद भी हालात कुछ खास नहीं बदले. इसकी एक बड़ी वजह वहां ट्रेड यूनियन्स को मिली मजबूती को भी बताया जाता है. दरअसल बंगाल में आजादी के बाद 34 साल तक वामदलों की सरकार रही. इन्होंने वहां तेजी से भूमि सुधार जैसे कानूनों को लागू किया. इससे ग्रामीण विकास को तो गति मिली लेकिन मजदूर संगठनों की ताकत के चलते यहां कंपनियों ने आने में न के बराबर दिलचस्पी दिखाई, जिससे यहां बड़े उद्योग धंधे नहीं आ सके.

प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (ईएसी-पीएम) ने अपने हालिया कार्यपत्र में बताया है कि भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में पश्चिम बंगाल की हिस्सेदारी 1960-61 में 10.5 फीसद थी, जो घटकर 2023-24 में मात्र 5.6 फीसद रह गई है.

कोलकाता कैसे बन गया सियासी दंगों का शहर?

पॉलिटिकल एक्सपर्ट का कहना है कि बंगाल में गरीब लोग आसानी से राजनीतिक हिंसा का शिकार बन रहे हैं. कॉल ऑफ जस्टिस की रिपोर्ट के मुताबिक, 2021 विधानसभा से पहले पूरे बंगाल में 1,300 से अधिक हिंसक घटनाएं हुई थीं.

अप्रैल में 123 और मई में 88 घटनाओं के साथ हिंसा चरम पर थी. सैकड़ों घटनाएं कोलकाता और इसके आसपास के इलाके में भी दर्ज की गईं. इसी तरह 2024 लोकसभा चुनाव से पहले भी करीब 24 लोगों की राजनीतिक हिंसा में मौत हो गई.

ORF सीनियर फेलो निरंजन साहू ने एक मीडिया इंटरव्यू में बंगाल की राजनीति पर कहा था," यहां राजनीतिक हिंसा की पुरानी संस्कृति है. कोलकाता की यह पहचान 1946 के भयानक दंगों से बनी, लेकिन हाल के 10-15 साल में राजनीतिक ध्रुवीकरण से इसे बढ़ावा मिला है. TMC और BJP के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा ने सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को बढ़ा दिया है. BJP राज्य में पैर जमाने की कोशिश कर रही है, जबकि ममता बनर्जी अपनी सत्ता बचाने के लिए मुस्लिम वोटरों को संभाल रही हैं."

वहीं, पॉलिटिकल एनालिस्ट बिस्वजीत भट्टाचार्य ने एक अंग्रेजी अखबार से बातचीत में कहा, "मुर्शिदाबाद जैसी हिंसा ने BJP को अपना नैरेटिव (इस्लामोफोबिया) सेट करने का मौका दे दिया. पहले ममता नैरेटिव सेट करती थीं, अब BJP उल्टा हमला कर रही है." इन दोनों ही एक्सपर्ट का मानना है कि सियासी सरगर्मी बढ़ते ही कोलकाता और बंगाल में सांप्रदायिक घटनाओं की संख्या बढ़ जाती है.  

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