scorecardresearch

ममता के समर्थन में विपक्षी गोलबंदी, कांग्रेस के लिए खतरे की घंटी?

अगर ममता बनर्जी बंगाल चुनाव जीत जाती हैं तो इंडिया ब्लॉक में कांग्रेस के साथ एक और शक्ति केंद्र उभर सकता है

ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल (फाइल फोटो)
ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल (फाइल फोटो)
अपडेटेड 28 अप्रैल , 2026

पश्चिम बंगाल के चुनाव के दौरान विपक्षी एकजुटता का एक साफ पैटर्न उभरकर सामने आ रहा है. यह पैटर्न अब सिर्फ दिखावे से कहीं आगे है. INDIA गठबंधन के प्रमुख नेताओं का ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) के समर्थन में एकजुट होना अब प्रतीकात्मक नहीं रहा, बल्कि संगठनात्मक और सोची-समझी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा बन गया है.

यह सब तब हो रहा है, जब INDIA गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में ममता बनर्जी पर लगातार तेज हमले कर रही है. इतना ही नहीं, कांग्रेस के सबसे बड़े नेता राहुल गांधी का एक सहयोगी पर लंबे समय से चुप रहना अब साफ-साफ राजनीतिक हमले में बदल गया है.

29 अप्रैल को होने वाले दूसरे चरण के मतदान से पहले ममता के समर्थन में प्रचार करने आम आदमी पार्टी (AAP) के प्रमुख और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पहुंचे. इससे पहले तेजस्वी यादव और झारखंड के सीएम हेमंत सोरेन ने भी ममता बनर्जी के समर्थन में चुनाव प्रचार किया था. 25 अप्रैल को कोलकाता पहुंचकर अरविंद केजरीवाल ने TMC के दो उम्मीदवार कुणाल घोष और सोभनदेब चट्टोपाध्याय के लिए बेलेघाटा और बालीगंज में प्रचार किया.

इस चुनाव प्रचार के जरिए केजरीवाल ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि बंगाल का चुनाव BJP के खिलाफ देशव्यापी लड़ाई का हिस्सा है. कई विपक्षी नेताओं ने यहां चुनाव प्रचार करके ममता बनर्जी को एक प्रमुख विपक्षी नेता के रूप में पेश करने की कोशिश की है.

राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के नेता तेजस्वी यादव का चुनाव प्रचार जनसांख्यिकीय और राजनीतिक दृष्टिकोण पर अधिक केंद्रित रहा है. वे प्रवासी या हिंदी भाषी आबादी वाले क्षेत्रों में सक्रिय रूप से दौरा कर रहे हैं और बिहारी मूल के मतदाताओं से संपर्क साध रहे हैं. तेजस्वी ने इस चुनाव को लोकतंत्र के अस्तित्व की लड़ाई के रूप में पेश किया है और इस बात पर जोर दिया है कि बिहारी समुदाय के लोग ममता बनर्जी के साथ खड़े हैं.

विपक्षी नेताओं का यह समर्थन ममता के लिए बेहद महत्वपूर्ण है. ऐसा इसलिए क्योंकि उत्तर भारतीय क्षेत्रीय दलों के समर्थन से TMC के सामाजिक गठबंधन को उसके पारंपरिक बंगाली के साथ बाहरी लोगों का समर्थन हासिल होगा. झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के प्रमुख और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने चुनाव प्रचार में संघीय और क्षेत्रीय दृष्टिकोण को प्रमुखता दी है. उन्होंने इससे पहले TMC के समर्थन में जंगलमहल क्षेत्र में रैलियों को संबोधित किया, जहां अच्छी-खासी आदिवासी आबादी है.

चुनाव प्रचार के दूसरे चरण में सोरेन ने हावड़ा के शिबपुर और उत्तर के दमदम में रैलियों को संबोधित किया. उन्होंने कहा कि बंगाल को केंद्र सरकार अस्थिर करने की कोशिश कर रही है. सोरेन ने बाहरी ताकतों के बारे में चेतावनी देते हुए कहा कि ममता बनर्जी सरकार के मामलों में केंद्र सरकार लंबे समय से हस्तक्षेप करने की कोशिश कर रही है, जो गलत है.

इस तरह बंगाल के आदिवासी इलाकों में उनकी उपस्थिति BJP की कथित चालों के खिलाफ राज्य की स्वायत्तता की रक्षा करने वाले क्षेत्रीय नेताओं के गठबंधन के विचार को मजबूत करती है. विश्लेषकों का कहना है कि ये अभियान केवल आकस्मिक समर्थन नहीं हैं, बल्कि राजनीतिक तौर पर सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है.

इसके बिल्कुल विपरीत, कांग्रेस नेता राहुल गांधी का चुनाव प्रचार अभियान चल रहा है, जिसमें उन्होंने बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की कड़ी आलोचना की है. राहुल ने अब तक चार रैलियों को संबोधित किया है और उन सभी में ममता बनर्जी पर बंगाल को आर्थिक और राजनीतिक रूप से विफल करने का आरोप लगाया है. उन्होंने तर्क दिया कि राज्य के उद्योगों को दोहरी मार पड़ रही है. इतना ही नहीं राहुल ने आरोप लगाया कि ममता ने कारखानों को बंद कर दिया है, जबकि नरेंद्र मोदी सरकार ने राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को कमजोर कर दिया है.

राहुल ने ममता की BJP विरोधी नेता के रूप में विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाया. उन्होंने यह भी पूछा कि अगर ममता BJP का विरोध करती है तो उनके खिलाफ 36, 38 या 40 मामले क्यों नहीं दर्ज हैं. एक अन्य रैली में राहुल ने आरोप लगाया कि मोदी और ममता दोनों अमीरों की मदद करते हैं, गरीबों की नहीं.

हमले की यह रणनीति विपक्षी गठबंधन में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत देती है. राहुल ने बंगाल में कथित तौर पर TMC समर्थकों के जरिए कांग्रेस कार्यकर्ता की हत्या पर सोशल मीडिया पर चिंता व्यक्त की है. संसद में परिसीमन विधेयक के विफल होने के बाद राहुल ने TMC के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी को फोन करके धन्यवाद और बधाई दी थी. अब कुछ ही दिनों बाद उन्होंने आक्रामक रुख अपनाया है. दिलचस्प बात यह है कि राहुल ने अपने चुनावी भाषणों में अभिषेक पर कोई सीधा हमला नहीं किया है.

यह विरोधाभास स्पष्ट है. एक तरफ केजरीवाल, तेजस्वी और सोरेन हैं, जो ममता बनर्जी को विपक्ष की एक प्रमुख हस्ती के रूप में स्थापित कर रहे हैं. उन्हें बड़े विपक्षी नेता के तौर पर वैधता प्रदान कर रहे हैं. दूसरी तरफ कांग्रेस है, जो ममता बनर्जी के इस दावे को खारिज करके विपक्ष में अपनी प्रमुखता फिर हासिल करने का प्रयास कर रही है.

क्या इस तनाव के बीच एक नई राजनीतिक संभावना आकार ले रही है? TMC के एक नेता का कहना है, "बंगाल में उनकी पार्टी की निर्णायक जीत इस उभरते गठबंधन को औपचारिक रूप दे सकती है, लेकिन निश्चित रूप से हम कांग्रेस को दरकिनार नहीं करेंगे. हालांकि, कांग्रेस नेताओं को भी यह वास्तविकता स्वीकार करनी होगी कि नरेंद्र मोदी-अमित शाह गठजोड़ को ममता बनर्जी ने ही हराया है.”

बंगाल में जो कुछ भी हो रहा है, उसे बंगाल में विपक्षी दलों के बीच औपचारिक टूट के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए. लेकिन, यह महज एक रणनीतिक मतभेद भी नहीं रह गया है. ऐसा लगता है कि बंगाल चुनाव राष्ट्रीय स्तर पर भी विपक्षी दलों के नेतृत्व, वैधता और विपक्षी राजनीति की भावी संरचना को तय कर रहा है.

अगर ममता की TMC निर्णायक जीत हासिल करती है, तो केजरीवाल, तेजस्वी और सोरेन के चुनाव प्रचार को इंडिया ब्लॉक के भीतर एक नए सत्ता केंद्र की शुरुआती नींव के रूप में याद किया जा सकता है. एक ऐसा केंद्र, जहां क्षेत्रीय नेता कांग्रेस से बाहर के किसी व्यक्ति के इर्द-गिर्द एकजुट होते दिख रहे हैं.

Advertisement
Advertisement