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अधर में क्यों लटक गईं जेवर एयरपोर्ट की उड़ानें

जेवर में बने नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट से उड़ानें शुरू न हो पाने के पीछे केंद्रीय गृह मंत्रालय का एक नियम है. बिना इसमें ढील के एयरपोर्ट का संचालन नहीं हो सकता

नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट
अपडेटेड 22 अप्रैल , 2026

नोएडा के जेवर में बने बहुप्रतीक्षित नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट से उड़ानें शुरू होने का इंतज़ार जितना लंबा होता जा रहा है, उतना ही यह सवाल गहराता जा रहा है कि आखिर अड़चन कहां है. कागज़ों पर पहले चरण की उड़ानों के लिए लगभग तैयार दिखने वाला यह प्रोजेक्ट अब एक ऐसे पेच में फंस गया है, जो तकनीकी कम और नीतिगत ज्यादा है. केंद्र के गृह मंत्रालय द्वारा एक अहम प्रस्ताव ठुकराए जाने के बाद एयरपोर्ट की उड़ानों की टाइमलाइन फिर अनिश्चित हो गई है. 

मामले की जड़ में एयरपोर्ट सुरक्षा से जुड़ा एक नियम है, जो पहली नजर में छोटा लगता है, लेकिन उसके प्रभाव बड़े हैं. दरअसल ब्यूरो आफ सिविल एविएशन सिक्युरिटी (BCAS) ने 17 जनवरी, 2011 को एक आदेश पारित किया था: “हर ग्रीनफ़ील्ड भारतीय हवाई अड्डे पर भारतीय नागरिकता वाला मुख्य कार्यकारी अधिकारी, और AAI के उन हवाई अड्डों पर जहां नागरिक उड़ानें आती-जाती हैं, हवाई अड्डा निदेशक या हवाई अड्डा प्रबंधन का प्रभारी व्यक्ति, संबंधित हवाई अड्डों पर सुरक्षा समन्वयक होगा...” 

यानी यह नियम कहता है कि किसी भी ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट का मुख्य कार्यकारी अधिकारी यानी CEO भारतीय नागरिक होना चाहिए, क्योंकि वही एयरपोर्ट का सुरक्षा समन्वयक भी होता है. इस नियम में बदलाव की मांग की गई थी, ताकि विदेशी नागरिक को भी CEO बनाया जा सके. लेकिन गृह मंत्रालय ने इस प्रस्ताव को साफ तौर पर खारिज कर दिया. 

 पीएम मोदी ने पिछले महीने इस एयरपोर्ट का उद्घाटन किया था
पीएम मोदी ने पिछले महीने इस एयरपोर्ट का उद्घाटन किया था

इस फैसले का सीधा असर जेवर एयरपोर्ट पर पड़ा है, जहां संचालन करने वाली कंपनी का नेतृत्व एक विदेशी नागरिक के हाथ में है. जेवर एयरपोर्ट का विकास और संचालन यमुना इंटरनेशनल एयरपोर्ट प्राइवेट लिमिटेड (YIAPL) कर रही है, जो स्विस कंपनी Zurich Airport International AG की सहायक है. कंपनी के CEO क्रिस्टोफ श्नेलमैन हैं, जो स्विस नागरिक हैं. यही वह बिंदु है जहां पूरा मामला अटक गया है. नियमों के मुताबिक, एयरपोर्ट का CEO ही सुरक्षा समन्वयक होता है, और सुरक्षा समन्वयक के पास संवेदनशील सूचनाओं और प्रोटोकॉल तक पहुंच होती है. ऐसे में सरकार का मानना है कि इस पद पर भारतीय नागरिक होना अनिवार्य है.

असल में यह विवाद नया नहीं है. वर्ष 2022 से ही इस नियम में संशोधन की कोशिशें चल रही थीं. नागर विमानन सुरक्षा ब्यूरो ने नागरिक उड्डयन मंत्रालय के तहत रहते हुए गृह मंत्रालय को प्रस्ताव भेजा था कि ग्रीनफील्ड एयरपोर्ट के लिए CEO पद पर विदेशी नागरिक को अनुमति दी जाए. तर्क यह था कि कई अंतरराष्ट्रीय कंपनियां भारत में एयरपोर्ट विकसित कर रही हैं और उनके शीर्ष प्रबंधन में विदेशी अधिकारी होते हैं. लेकिन सुरक्षा एजेंसियों, खासकर खुफिया इनपुट के आधार पर गृह मंत्रालय ने इसे मंजूरी देने से इनकार कर दिया. यहीं से जेवर एयरपोर्ट की मुश्किलें बढ़ गईं. 

एयरपोर्ट को संचालन शुरू करने के लिए जिस अंतिम मंजूरी की जरूरत है, वह है एयरड्रोम सिक्योरिटी प्रोग्राम (ASP) की स्वीकृति. यह स्वीकृति नागर विमानन सुरक्षा ब्यूरो यानी BCAS देता है, और इसके बिना एयरपोर्ट पर किसी भी तरह का कमर्शियल संचालन संभव नहीं है. ASP के तहत एयरपोर्ट की सुरक्षा व्यवस्था, स्टाफ की तैनाती, एंट्री-एक्जिट सिस्टम, और इमरजेंसी प्रोटोकॉल का पूरा खाका तय होता है.

दिलचस्प बात यह है कि एयरपोर्ट को पहले ही तकनीकी रूप से काफी मंजूरियां मिल चुकी हैं. 6 मार्च को डायरेक्टरेट जनरल ऑफ सिविल एविएशन से एयरोड्रोम लाइसेंस मिल चुका है, जो इस बात का प्रमाण है कि एयरपोर्ट उड़ानों के लिए तकनीकी रूप से तैयार है. इसके बाद 8 मार्च को ASP के लिए आवेदन भी कर दिया गया था. आमतौर पर इस प्रक्रिया के बाद कुछ हफ्तों में उड़ानें शुरू हो जाती हैं. लेकिन यहां मामला अटक गया, क्योंकि CEO की नागरिकता को लेकर सुरक्षा मंजूरी लंबित है. 

पहले उम्मीद जताई जा रही थी कि उद्घाटन होने के एक-डेढ़ महीने बाद इस एयरपोर्ट से उड़ानें शुरू हो जाएंगी
पहले उम्मीद जताई जा रही थी कि उद्घाटन होने के एक-डेढ़ महीने बाद इस एयरपोर्ट से उड़ानें शुरू हो जाएंगी

स्थिति यह है कि BCAS ने एयरपोर्ट के सुरक्षा ढांचे का आकलन करते हुए पाया कि कंपनी के CEO विदेशी नागरिक हैं, जबकि नियम इसके विपरीत है. चूंकि CEO ही सुरक्षा समन्वयक होता है, इसलिए बिना इस मुद्दे के समाधान के ASP को मंजूरी नहीं दी जा सकती. इसका मतलब है कि एयरपोर्ट के लिए जरूरी स्टाफ की एंट्री पास जारी नहीं हो पा रहे हैं, एयरलाइंस अपने ऑपरेशन की तैयारी पूरी नहीं कर पा रही हैं, और पूरी प्रक्रिया रुकी हुई है.

यहां एक और दिलचस्प पहलू सामने आता है. कंपनी ने यह दलील दी है कि उसके ढांचे में राज्य सरकार और नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट लिमिटेड (NIAL) के वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल हैं, जो फैसलों में अहम भूमिका निभाते हैं. यानी सुरक्षा से जुड़े निर्णय केवल CEO के हाथ में नहीं हैं. लेकिन अभी तक यह तर्क सरकार को संतुष्ट नहीं कर पाया है. सरकारी अधिकारियों के अनुसार, सुरक्षा समन्वयक की भूमिका बेहद संवेदनशील होती है. इस पद पर बैठे व्यक्ति को खुफिया सूचनाओं, सुरक्षा प्रोटोकॉल और आपातकालीन फैसलों तक सीधी पहुंच होती है. ऐसे में राष्ट्रीय सुरक्षा के मद्देनजर इस पद पर भारतीय नागरिक की अनिवार्यता को लेकर कोई ढील देने का जोखिम सरकार नहीं लेना चाहती. 

इस फैसले का असर अब सीधे एयरपोर्ट की टाइमलाइन पर दिख रहा है. पहले उम्मीद जताई जा रही थी कि उद्घाटन के एक से डेढ़ महीने के भीतर उड़ानें शुरू हो जाएंगी. नरेंद्र मोदी ने 28 मार्च को इसका उद्घाटन भी कर दिया था, जिससे यह संदेश गया था कि एयरपोर्ट जल्द ही चालू हो जाएगा. लेकिन अब उद्घाटन के करीब एक महीने बाद भी उड़ानों का कोई ठोस शेड्यूल सामने नहीं आया है. एयरपोर्ट प्रबंधन फिलहाल सार्वजनिक तौर पर यही कह रहा है कि वह BCAS के साथ मिलकर ASP की मंजूरी के लिए काम कर रहा है. लेकिन अंदरखाने यह साफ है कि असली अड़चन CEO की सुरक्षा मंजूरी और नागरिकता से जुड़ा मुद्दा है. अधिकारियों के मुताबिक, CEO को अभी गृह मंत्रालय से सिक्योरिटी क्लीयरेंस मिलनी बाकी है, और BCAS द्वारा उनकी जांच भी पूरी नहीं हुई है. 

इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़े सवाल को भी जन्म दिया है- क्या भारत में विदेशी निवेश के साथ आने वाले प्रबंधन ढांचे को स्थानीय सुरक्षा नियमों के हिसाब से ढालना होगा, या फिर नियमों में लचीलापन लाना पड़ेगा? जेवर एयरपोर्ट इस बहस का पहला बड़ा उदाहरण बन गया है. फिलहाल इस पेच को सुलझाने के लिए कई विकल्पों पर विचार किया जा रहा है. एक संभावना यह है कि कंपनी CEO पद पर किसी भारतीय नागरिक की नियुक्ति करे, ताकि नियमों का पालन हो सके. दूसरा विकल्प यह हो सकता है कि सुरक्षा समन्वयक की भूमिका किसी भारतीय अधिकारी को सौंप दी जाए और CEO अलग भूमिका में रहें. हालांकि, मौजूदा नियमों में यह व्यवस्था स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं है, इसलिए इसे लागू करना आसान नहीं होगा.

इस बीच, एयरपोर्ट से जुड़े अधिकारी यह भी मानते हैं कि क्रिस्टोफ श्नेलमैन ने इस प्रोजेक्ट के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, इसलिए उन्हें पूरी तरह हटाना कंपनी के लिए आसान फैसला नहीं होगा. यही वजह है कि “बीच का रास्ता” निकालने की कोशिश चल रही है. लेकिन जब तक गृह मंत्रालय और BCAS की मंजूरी नहीं मिलती, तब तक कोई भी समाधान अंतिम नहीं माना जाएगा. जमीन पर इसका असर साफ दिख रहा है. एयरपोर्ट के भीतर काम करने वाले कर्मचारियों, एयरलाइंस स्टाफ और अन्य एजेंसियों के लिए जरूरी एंट्री पास जारी नहीं हो पा रहे हैं. एयरलाइंस अपने स्लॉट प्लान नहीं कर पा रही हैं और सबसे महत्वपूर्ण, यात्रियों के लिए कोई स्पष्ट तारीख सामने नहीं आ रही है कि आखिर कब से यहां से उड़ान भर सकेंगे.

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