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IGI बनाम जेवर : दिल्ली के मुकाबले महंगा क्यों पड़ रहा है नोएडा एयरपोर्ट?

एविएशन टरबाइन फ्यूल पर टैक्स राहत और विश्वस्तरीय दावों के बावजूद यात्रियों के लिए जेवर एयरपोर्ट दिल्ली के IGI से महंगा पड़ रहा है

Noida International Airport, Jewar Airport, Commercial Flights
15 जून से नोएडा एयरपोर्ट से फ्लाइट शुरू होंगी
अपडेटेड 11 मई , 2026

गाजियाबाद के राजनगर में रहने वाले आईटी प्रोफेशनल अमित त्यागी 18 जून को बेंगलुरु जाने की तैयारी कर रहे हैं. शुरुआत में उन्होंने सोचा कि नए नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट से उड़ान भरना ज्यादा सुविधाजनक और सस्ता होगा. लेकिन जब उन्होंने पूरा खर्च जोड़ा तो गणित उल्टा निकला. 

जेवर एयरपोर्ट तक कैब का किराया करीब 1200 रुपए दिखा, जबकि दिल्ली के इंदिरा गांधी इंटरनेशनल (IGI) एयरपोर्ट तक यही सफर 850 रुपए में हो रहा था. फ्लाइट टिकट में भी कोई खास फर्क नहीं मिला. ऐसे में अमित ने आखिरकार IGI एयरपोर्ट से टिकट बुक कर ली. अमित जैसे हजारों यात्रियों के सामने यही सवाल है कि आखिर जेवर एयरपोर्ट का फायदा उन्हें मिलेगा कब?

दिल्ली-एनसीआर के दूसरे अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के रूप में विकसित हो रहा नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट यानी जेवर एयरपोर्ट देश की सबसे महत्वाकांक्षी इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में गिना जा रहा है. दावा था कि यह एयरपोर्ट दिल्ली के इंदिरा गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट (IGI) पर दबाव कम करेगा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और एनसीआर के लाखों यात्रियों को नजदीकी विकल्प देगा और सस्ती हवाई यात्रा का नया केंद्र बनेगा. 

लेकिन 15 जून से कमर्शियल उड़ानें शुरू होने से पहले ही एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है. जब यहां तक पहुंचना महंगा है, टिकट किराया भी लगभग दिल्ली जितना या उससे अधिक है और सार्वजनिक परिवहन अभी अधूरा है, तो आखिर यात्री जेवर एयरपोर्ट क्यों चुनेंगे? यही सवाल अब एयरलाइंस, यात्रियों और सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है.

टैक्सी का किराया ही तोड़ रहा गणित

नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट की सबसे बड़ी दिक्कत फिलहाल एयरपोर्ट तक पहुंचना है. दिल्ली का IGI एयरपोर्ट मेट्रो, डीटीसी बस, एयरपोर्ट एक्सप्रेस और हजारों टैक्सियों से जुड़ा हुआ है. इसके उलट जेवर एयरपोर्ट तक फिलहाल यात्रियों के पास टैक्सी या निजी वाहन ही मुख्य विकल्प हैं. यही वजह है कि एयरपोर्ट तक पहुंचने का खर्च यात्रियों की जेब पर भारी पड़ रहा है. 

गाजियाबाद के राजनगर से IGI एयरपोर्ट तक ऊबर या ओला का किराया लगभग 850 से 900 रुपए बैठता है, जबकि नोएडा एयरपोर्ट तक यही किराया करीब 1200 रुपए तक पहुंच रहा है. इसकी वजह दूरी भी है. राजनगर से IGI की दूरी करीब 51 किलोमीटर है, जबकि जेवर एयरपोर्ट लगभग 77 किलोमीटर दूर पड़ता है. नोएडा सेक्टर-62 से भी यही स्थिति है. यहां से IGI तक टैक्सी करीब 800 रुपए में मिल जाती है, जबकि जेवर एयरपोर्ट तक लगभग 900 रुपए खर्च करने पड़ रहे हैं. सेक्टर-62 से IGI की दूरी करीब 40 किलोमीटर है, जबकि जेवर एयरपोर्ट लगभग 74 किलोमीटर दूर है. 

ग्रेटर नोएडा वेस्ट की गौर सिटी से दोनों एयरपोर्ट तक का टैक्सी किराया लगभग समान यानी 800 से 900 रुपए के बीच है, लेकिन यात्रियों के सामने सवाल यह है कि जब दिल्ली एयरपोर्ट ज्यादा सुविधाजनक और ज्यादा उड़ानों वाला विकल्प है तो वे समान किराया देकर जेवर क्यों जाएं? एक ट्रांसपोर्ट कंपनी चलाने वाले रविंद्र सिंह कहते हैं “असल में यात्रियों के लिए केवल फ्लाइट टिकट मायने नहीं रखती. एयरपोर्ट तक पहुंचने की लागत, समय और सुविधा भी उतनी ही अहम होती है. जेवर एयरपोर्ट फिलहाल इसी मोर्चे पर कमजोर दिखाई दे रहा है.”

मेट्रो नहीं, बस सेवा अधूरी

जेवर एयरपोर्ट को लेकर सबसे बड़ी उम्मीद थी कि इसे आधुनिक मल्टी-मोडल ट्रांसपोर्ट हब के रूप में विकसित किया जाएगा. लेकिन कमर्शियल उड़ानें शुरू होने तक न तो मेट्रो पहुंच सकी है और न ही मजबूत सिटी बस नेटवर्क तैयार हो पाया है. यूपी रोडवेज, दिल्ली परिवहन निगम और अन्य एजेंसियों के साथ समझौते जरूर हुए हैं, लेकिन जमीन पर अभी इन सेवाओं का संचालन दिखाई नहीं देता. 

यात्रियों के पास फिलहाल कैब ही मुख्य विकल्प है. हालांकि अब सरकार तेजी से ई-बस नेटवर्क तैयार करने में जुटी है. उत्तर प्रदेश परिवहन निगम और नोएडा अथॉरिटी ने एयरपोर्ट के लिए 25 ई-बस रूट फाइनल किए हैं. इनमें गाजियाबाद, मेरठ, हापुड़, इंदिरापुरम और कौशांबी जैसे इलाके शामिल हैं. लेकिन इन रूटों का नियमित संचालन अभी शुरू नहीं हुआ है. सरकारी अधिकारियों का तर्क है कि एयरपोर्ट शुरू होने के साथ चरणबद्ध तरीके से बस सेवाएं शुरू की जाएंगी. लेकिन शुरुआती महीनों में यात्रियों को महंगी टैक्सियों पर निर्भर रहना पड़ेगा. यही वजह है कि आम यात्रियों के बीच यह धारणा बन रही है कि जेवर एयरपोर्ट फिलहाल ‘प्रीमियम ट्रैवल’ का विकल्प बनता जा रहा है.

ATF पर टैक्स कम, फिर भी टिकट महंगी

नोएडा एयरपोर्ट को प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने एविएशन टरबाइन फ्यूल (ATF) पर बड़ा टैक्स बेनिफिट दिया है. दिल्ली में एयरलाइंस को ATF पर लगभग 25 प्रतिशत वैट देना पड़ता है, जबकि जेवर एयरपोर्ट के लिए इसे घटाकर सिर्फ एक प्रतिशत कर दिया गया. सैद्धांतिक तौर पर इसका फायदा टिकट कीमतों में दिखना चाहिए था. एयरलाइंस का ईंधन खर्च कम होता तो टिकट सस्ती हो सकती थीं. लेकिन शुरुआती किराए इस दावे के उलट दिखाई दे रहे हैं.

15 जून के किरायों पर नजर डालें तो लखनऊ से नोएडा एयरपोर्ट की फ्लाइट लगभग 4981 से 5072 रुपए तक दिख रही है, जबकि इसी समय दिल्ली के IGI एयरपोर्ट से यही किराया करीब 3600 से 4562 रुपए के बीच उपलब्ध है. बेंगलुरु के लिए IGI और जेवर दोनों से किराया लगभग समान यानी करीब 8900 रुपए है. हैदराबाद के लिए भी दोनों एयरपोर्ट के किराए में मामूली अंतर दिखाई देता है. यात्रियों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब एयरलाइंस को ईंधन पर इतना बड़ा टैक्स लाभ मिल रहा है तो उसका फायदा टिकट में क्यों नहीं दिख रहा?

असली वजह यूजर फीस और एयरपोर्ट चार्ज

इस सवाल का जवाब एयरपोर्ट के टैरिफ मॉडल में छिपा है. एयरलाइंस का कहना है कि जेवर एयरपोर्ट पर यूजर डेवलपमेंट फीस (UDF) और अन्य एयरोनॉटिकल चार्ज दिल्ली से कहीं ज्यादा हैं. यही वजह है कि कम VAT का फायदा खत्म हो जा रहा है. इंडिगो ने एयरपोर्ट्स इकोनॉमिक रेगुलेटरी अथॉरिटी (AERA) को लिखे अपने पत्र में साफ कहा है कि नोएडा एयरपोर्ट के ऊंचे शुल्क यात्रियों पर अतिरिक्त बोझ डालेंगे और इससे एयरपोर्ट की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता कमजोर होगी. इंडिगो के मुताबिक बड़े विमानों के लिए लैंडिंग चार्ज दिल्ली एयरपोर्ट की तुलना में घरेलू उड़ानों के लिए 119 प्रतिशत तक ज्यादा हैं.  घरेलू यात्रियों पर लगने वाला UDF भी IGI की तुलना में 400 प्रतिशत से अधिक बताया गया है. 

एयरलाइन का दावा है कि अगर कोई Airbus A321 विमान नोएडा एयरपोर्ट से एक घरेलू राउंड ट्रिप ऑपरेट करता है तो उसे दिल्ली की तुलना में लगभग 1.88 लाख रुपए अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ सकता है. अगर कोई एयरलाइन रोजाना 15 राउंड ट्रिप चलाती है तो सालाना अतिरिक्त लागत 100 करोड़ रुपए से ऊपर जा सकती है. यानी सरकार ने ईंधन सस्ता कर दिया, लेकिन एयरपोर्ट के संचालन शुल्क इतने अधिक हैं कि कुल लागत फिर बढ़ जा रही है.

नया एयरपोर्ट, इसलिए ज्यादा वसूली?

नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट का पहला चरण लगभग 6500 करोड़ रुपए की लागत से तैयार किया गया है. एयरपोर्ट ऑपरेटर का कहना है कि इतनी बड़ी पूंजी लागत की रिकवरी भी करनी है. इसलिए शुरुआती टैरिफ अपेक्षाकृत अधिक रखना जरूरी है. ऑपरेटर का दावा है कि एयरपोर्ट आधुनिक तकनीक, तेज प्रोसेसिंग और बेहतर यात्री अनुभव के हिसाब से डिजाइन किया गया है. लंबे समय में इससे एयरलाइंस की ऑपरेटिंग लागत कम होगी. रवींद्र सिंह कहते हैं “एयरपोर्ट की सफलता केवल आधुनिक टर्मिनल या रनवे से तय नहीं होती. यात्रियों के लिए सबसे अहम चीज कुल यात्रा लागत और सुविधा होती है. अगर एयरपोर्ट तक पहुंचना ही महंगा और समय लेने वाला होगा तो बड़ी संख्या में यात्री IGI को प्राथमिकता देना जारी रखेंगे.” 

दिल्ली एयरपोर्ट का सबसे बड़ा फायदा उसका विशाल नेटवर्क है. वहां बड़ी संख्या में एयरलाइंस और उड़ानें संचालित होती हैं. इससे एयरलाइंस के बीच प्रतिस्पर्धा बनी रहती है और किराए नीचे आते हैं. इसके उलट जेवर एयरपोर्ट से शुरुआत में सीमित एयरलाइंस ही उड़ानें संचालित करेंगी. इंडिगो ने 15 जून से सेवा शुरू करने का ऐलान किया है. अकासा एयर 16 जून से उड़ानें शुरू करेगी. एयर इंडिया एक्सप्रेस भी संचालन की तैयारी में है. लेकिन शुरुआती चरण में उड़ानों की संख्या कम रहने से किरायों पर प्रतिस्पर्धात्मक दबाव नहीं बन पाएगा. यही वजह है कि फिलहाल दिल्ली और जेवर के किरायों में बड़ा अंतर नहीं दिख रहा. विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक यहां पर्याप्त संख्या में एयरलाइंस और उड़ानें नहीं बढ़ेंगी, तब तक यात्रियों को वास्तविक किराया लाभ मिलना मुश्किल है.

कार्गो और सड़क कनेक्टिविटी भी अधूरी

जेवर एयरपोर्ट केवल यात्री उड़ानों के लिए ही नहीं, बल्कि बड़े कार्गो हब के रूप में भी विकसित किया जा रहा है. लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि कार्गो कनेक्टिविटी भी अभी अधूरी है. फिलहाल एयरपोर्ट तक पहुंचने का मुख्य रास्ता केवल यमुना एक्सप्रेस-वे है. 60 मीटर चौड़ी वीआईपी रोड दयानतपुर के आगे अभी तक पूरी नहीं बन पाई है. कार्गो रोड का भी केवल लगभग 8 किलोमीटर हिस्सा तैयार हुआ है. बाकी सड़क निर्माण अभी बाकी है. इसका मतलब यह है कि शुरुआती चरण में मालवाहक ट्रैफिक भी जेवर के संकरे रास्तों पर निर्भर रहेगा. इससे लॉजिस्टिक लागत बढ़ सकती है. 

फिलहाल जेवर एयरपोर्ट का सबसे बड़ा फायदा उसकी लोकेशन मानी जा रही है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश, अलीगढ़, आगरा, मथुरा, बुलंदशहर और ग्रेटर नोएडा क्षेत्र के लोगों के लिए यह दिल्ली की तुलना में नजदीकी विकल्प बन सकता है. लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि केवल लोकेशन लंबे समय तक पर्याप्त नहीं होगी. अगर किराया, टैक्सी खर्च और यूजर फीस लगातार ज्यादा रहे तो यात्री फिर दिल्ली एयरपोर्ट की ओर लौट सकते हैं. फिलहाल तस्वीर यही दिखाती है कि दिल्ली-एनसीआर को दूसरा एयरपोर्ट तो मिल गया है, लेकिन सस्ती हवाई यात्रा का वादा अभी जमीन पर उतरता नजर नहीं आ रहा.

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