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पाकिस्तानी लड़ाकू जेट पर इंडोनेशिया की नजर...क्या ब्रह्मोस सौदे पर नहीं बनी बात?

इंडोनेशिया ब्रह्मोस मिसाइल खरीदने के लिए भारत से बातचीत पूरी कर चुका था लेकिन अब वह पाकिस्तानी लड़ाकू जेट खरीदने पर भी विचार कर रहा है

Brahmos missile
पिछले साल नवंबर में ब्रह्मोस डील फाइनल हुई थी
अपडेटेड 16 जनवरी , 2026

इंडोनेशिया की तरफ से पाकिस्तान से जेएफ-17 थंडर लड़ाकू जेट खरीदने की संभावनाएं तलाशने की खबरों के बाद भारतीय रक्षा प्रतिष्ठान सतर्क हो गया है. यह घटनाक्रम ऐसे नाजुक समय सामने आया है जब नई दिल्ली और जकार्ता ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइलों के लिए 45 करोड़ डॉलर के सौदे को अंतिम रूप देने की दिशा में काफी आगे बढ़ चुके हैं.

पिछले हफ्ते इस्लामाबाद में इंडोनेशियाई रक्षा मंत्री शफरी शमसुद्दीन और पाकिस्तान के वायु सेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल जहीर अहमद बाबर सिद्धू के बीच उच्चस्तरीय बैठक के बाद मामला और गंभीर हो गया. बैठक के दौरान पाकिस्तान ने कथित तौर पर 40 जेएफ-17 बहुउद्देश्य लड़ाकू जेट बेचने की पेशकश की, जिसे पाकिस्तान और चीन ने संयुक्त रूप से विकसित किया है.

भारत दक्षिण चीन सागर में चीन की बढ़ती सैन्य आक्रामकता के मुकाबले के लिए इंडोनेशिया को एक प्रमुख रणनीतिक साझेदार मानता है, ऐसे में इस्लामाबाद और बीजिंग से जुड़े सैन्य प्लेटफॉर्म के साथ जकार्ता के बढ़ते रक्षा संबंध नई दिल्ली के लिए चिंता का सबब बन गए हैं.

यह देखते हुए भारत की चिंता और भी ज्यादा बढ़ गई है कि इंडोनेशिया पाकिस्तान निर्मित लड़ाकू ड्रोन खरीदने पर विचार कर रहा है. इसी बीच, पाकिस्तान के साथ अपने रक्षा संबंधों को तेजी से आगे बढ़ाते हुए बांग्लादेश की वायु सेना ने भी जेएफ-17 लड़ाकू विमानों की खरीद पर बातचीत शुरू कर दी है, जिससे पता चलता है कि पाकिस्तान क्षेत्रीय स्तर पर चीन की मदद से तैयार विमानों को बेचने के प्रयासों में जुटा है.

पिछले साल मई में जब पाकिस्तान के साथ तनाव बढ़ा, तब ब्रह्मोस मिसाइल भारत की सबसे बड़ी सैन्य ताकत बनकर उभरी. भारतीय वायु सेना ने ऑपरेशन सिंदूर के तहत 9-10 मई की रात अपने सुखोई-30 लड़ाकू विमानों से करीब 15 ब्रह्मोस मिसाइलें दागीं. अचानक किए गए इस हमले ने पाकिस्तान के 12 मुख्य एयरबेस में से 11 को तबाह कर दिया, जिनमें चकलाला (नूर खान), रफीकी, सरगोधा. जैकोबाबाद, भोलारी और स्कार्दू जैसे अहम ठिकाने शामिल थे.

ब्रह्मोस मिसाइल दागो और भूल जाओ की तकनीक पर काम करती है, जिसकी मारक क्षमता 300 km और रफ्तार Mach 3 यानी ध्वनि से तीन गुना तेज है. इसी तेज रफ्तार की वजह से पाकिस्तान का चीनी डिफेंस सिस्टम इसे रोक नहीं पाया. इन मिसाइलों ने पाकिस्तान के रडार, कमांड सेंटर और रनवे को इतनी सटीकता से बर्बाद किया कि पाकिस्तान जवाबी हमला ही नहीं कर पाया. खुद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने माना कि इस हमले ने उनकी सेना को संभलने का मौका तक नहीं दिया.

इसकी वजह से ही पाकिस्तान को बातचीत के लिए मजबूर होना पड़ा और यह साबित हो गया कि भारत के सैन्य भंडार में ब्रह्मोस एक बेहद शक्तिशाली हथियार है.

रणनीतिकारों का मानना है कि भारत की सबसे बड़ी चिंता यह है कि इंडोनेशिया उसके साथ रणनीतिक ब्रह्मोस समझौते को अंतिम रूप देने के कगार पर होने के बावजूद पाकिस्तान के जेएफ-17 लड़ाकू विमानों को खरीदने पर विचार कर रहा है. उनका मानना है कि यह कदम न केवल द्विपक्षीय भरोसे को कमजोर करने वाला है, बल्कि क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरणों की जटिलता को भी बढ़ाता है. यही नहीं, ऐसे समय में इससे गलत संकेत भी जाता है जब विश्वसनीयता और साझा रणनीतिक हितों पर आधारित साझेदारियां अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई हैं.

गौरतलब है कि बीते नवंबर में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और उनके इंडोनेशियाई समकक्ष शमसुद्दीन की सह-अध्यक्षता में तीसरे भारत-इंडोनेशिया रक्षा मंत्री संवाद के दौरान दोनों पक्षों ने ब्रह्मोस समझौते पर हस्ताक्षर की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति की थी. यह समझौता होने पर फिलीपींस के बाद इंडोनेशिया यह मिसाइल प्रणाली हासिल करने वाला दूसरा दक्षिणपूर्वी एशियाई देश होगा.

नई दिल्ली और जकार्ता के बीच वार्ता लगभग पूरी हो चुकी है, केवल रूस की औपचारिक मंजूरी मिलनी बाकी है. क्योंकि भारत के साथ ब्रह्मोस संयुक्त उद्यम में रूस की 49.5 फीसद हिस्सेदारी के मद्देनजर यह आवश्यक है. ब्रह्मोस एयरोस्पेस भारत के रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) और रूस के गैर-लाभकारी संगठन मशीनोस्त्रोयेनिया के संयुक्त स्वामित्व में है. भारत इसमें 50.5 फीसद की नियंत्रक हिस्सेदारी रखता है.

ब्रह्मोस मिसाइल सौदे पर चर्चा उस वक्त हुई जब इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो गणतंत्र दिवस परेड 2025 के मुख्य अतिथि के तौर पर भारत आए थे. ब्रह्मोस मिसाइल में इंडोनेशिया की रुचि समुद्री रक्षा मजबूत करने की उसकी तात्कालिक जरूरत को दर्शाती है. भारत और रूस की संयुक्त भागीदारी में विकसित यह मिसाइल अपनी गति, सटीकता, बहुउद्देश्यीय दक्षता और मारक क्षमता (290 किमी) के लिए प्रसिद्ध है. विशेषज्ञों का मानना है कि ब्रह्मोस मिसाइल नटुना सागर में आक्रामक सैन्य गतिविधियों को रोकने की इंडोनेशिया की क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि कर सकती और इससे उसके सैन्य आधुनिकीकरण के लक्ष्यों को भी मजबूती मिलेगी.

फिलीपींस ने 2022 में 375 मिलियन डॉलर (लगभग 3,390 करोड़ रुपये) के सौदे के तहत ब्रह्मोस मिसाइलें खरीदकर एक मिसाल कायम की. पश्चिमी लूजोन में इन मिसाइलों की तैनाती से मनीला को रणनीतिक लाभ भी मिला है, खासकर दक्षिण चीन सागर में स्कारबोरो शोल के निकट चुनौतियों से निपटने में मदद मिली. फिलीपींस अपनी सुरक्षा और मजबूत करने के लिए अमेरिका निर्मित टाइफून जैसी उन्नत मिसाइल प्रणाली हासिल करने की कोशिश में भी जुटा है.

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