अमेरिका, इस्राइल और ईरान के बीच छिड़ी जंग से भारत की बेचैनी बढ़ गई है. भारत का नफा-नुकसान इस बात पर निर्भर करेगा कि यह युद्ध कितना लंबा खिंचता है. यदि अमेरिका का मुख्य उद्देश्य ईरान में सत्ता परिवर्तन था, तो सुप्रीम लीडर की मौत के बाद वह लक्ष्य करीब आता दिख रहा है, जो युद्ध के जल्द समाप्त होने का संकेत है.
हालांकि, जिस तरह ईरान इस संघर्ष में फंस गया है और अन्य क्षेत्रीय देशों पर मिसाइलें दागकर उन्हें भी लपेटे में ले रहा है, उससे पूरा क्षेत्र अशांत हो गया है. इस अस्थिरता का वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की आपूर्ति और कीमतों पर गहरा असर पड़ रहा है, जो भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है. इसके अलावा, खाड़ी देशों को होने वाला भारतीय निर्यात और वहां से आने वाला पैसा (रेमिटेंस) भी काफी मायने रखते हैं.
सबसे पहले बात कच्चे तेल की. 2 मार्च को ब्रेंट क्रूड 9 प्रतिशत से अधिक की उछाल के साथ 80 डॉलर प्रति बैरल के पार चला गया. यदि कच्चे तेल की कीमतें इसी तरह बढ़ती रहीं, तो देश में पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ेंगे, जिससे महंगाई बढ़ेगी और आम आदमी पर चौतरफा मार पड़ेगी. अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि यदि कच्चे तेल की कीमतों में 10 डॉलर का उछाल आता है, तो भारत का वार्षिक तेल आयात खर्च लगभग 15,000 करोड़ रुपये तक बढ़ सकता है.
इसके अन्य प्रभावों में चालू खाता घाटा (CAD) बढ़ना और रुपये की कमजोरी शामिल है, जिससे महंगाई पर अंकुश लगाने के लिए केंद्रीय बैंक पर ब्याज दरें बढ़ाने का दबाव बढ़ जाता है. भारत की मुख्य चिंता कच्चे तेल की कीमतों को लेकर है. प्रख्यात अर्थशास्त्री अभिरूप सरकार ने एक बातचीत में कहा, "भारत अपनी तेल जरूरतों का लगभग 90 प्रतिशत आयात करता है, जिसमें से 50 प्रतिशत हिस्सा खाड़ी देशों से आता है. खाड़ी देश दुनिया में कच्चे तेल के सबसे बड़े आपूर्तिकर्ता हैं. यदि वहां कीमतें बढ़ती हैं, तो रूसी तेल भी महंगा हो जाएगा."
कच्चे तेल की आपूर्ति के लिए महत्वपूर्ण 'हरमूज जलसंधि' पर ईरान का नियंत्रण एक बड़ा कारक है. दुनिया के कुल कच्चे तेल का 20 प्रतिशत परिवहन इसी मार्ग से होता है, लेकिन वर्तमान युद्ध के कारण यहां जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई है.
जहां तक खाड़ी देशों को होने वाले भारतीय निर्यात का सवाल है, तो फिलहाल इस पर कोई बड़ा असर नहीं दिख रहा है. अभिरूप सरकार के अनुसार, "भारत का लगभग 20 प्रतिशत निर्यात अमेरिका को होता है. कुछ कारणों से अन्य देशों को होने वाला निर्यात घटा है, जैसा कि पिछले वर्षों के आंकड़े दर्शाते हैं, हालांकि चीन को होने वाले निर्यात में वृद्धि हुई है. हमारी आर्थिक वृद्धि काफी हद तक घरेलू खपत पर टिकी है. यदि घरेलू मांग बढ़ती है और आपूर्ति उस अनुपात में नहीं बढ़ पाती, तो निर्यात में कमी आती है. इस संकट के बावजूद मुझे नहीं लगता कि निर्यात पर कोई खास असर पड़ेगा, क्योंकि भारत लंबे समय से अपनी निर्यात क्षमताएं बढ़ाने के प्रयास कर रहा है."
अब बात करते हैं रेमिटेंस (प्रवासियों द्वारा भेजा गया धन) की. खाड़ी सहयोग परिषद (GCC) के सदस्य देशों- सऊदी अरब, यूएई, कतर, कुवैत, ओमान और बहरीन में लगभग 1 करोड़ भारतीय रहते हैं. अकेले यूएई में करीब 30 लाख भारतीय निवास करते हैं, जो वहां से विदेशी मुद्रा भारत भेजते हैं. अमेरिका के बाद सबसे ज्यादा (लगभग 20 प्रतिशत) रेमिटेंस यूएई से ही आता है.
विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान युद्ध का भारत आने वाले रेमिटेंस पर फिलहाल कोई बड़ा प्रभाव नहीं पड़ेगा. स्पष्ट है कि युद्ध लंबा खिंचने की स्थिति में ही भारत के लिए आर्थिक मोर्चे पर चुनौतियां बढ़ेंगी. युद्ध के लंबा होने की आशंका इस बात पर निर्भर है कि ईरान को किसी तीसरे देश से कितनी मदद मिलती है, क्योंकि वर्तमान में ईरान की अपनी सैन्य और आर्थिक क्षमताएं कमजोर पड़ती दिखाई दे रही हैं.

