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ईरान की जंग कब खत्म होगी?

युद्धविराम की बातचीत की अफवाहें ही अब बस एक इकलौती उम्मीद बची हैं

शांति वार्ता की सुगबुगाहट के बीच ईरान में अमेरिका अपनी सेना उतारने को तैयार
शांति वार्ता की सुगबुगाहट के बीचअमेरिका ईरान में अपनी सेना उतारने को तैयार
अपडेटेड 31 मार्च , 2026

ईरान युद्ध कितने समय तक चलेगा, इसका कोई भी सटीक अनुमान लगाने के लिए उलझाने वाले सिग्नल्स की एक पूरी भूलभुलैया से गुजरना होगा. एक तरफ ईरान पर अमेरिका/इजरायल के हमले जारी हैं, तो दूसरी तरफ इजरायल और खाड़ी देशों पर तेहरान की मिसाइलों और ड्रोन्स की बारिश रुकने का नाम नहीं ले रही.

इस पूरे इलाके पर मंडरा रहे खतरों के बीच- अमेरिकी सेना वेस्ट एशिया में हजारों मरीन कमांडो और सैन्य साजो-सामान तैनात कर रही है. वहीं, ईरान पर क्रूज मिसाइलें दागने में सक्षम ब्रिटेन की परमाणु पनडुब्बी 'HMS Anson' अरब सागर में पहुंच चुकी है.

20 मार्च को ईरान ने हिंद महासागर के डिएगो गार्सिया द्वीप पर स्थित अमेरिकी सैन्य बेस को 4,000 किलोमीटर दूर से टू-स्टेज लंबी दूरी की मिसाइल से निशाना बनाया. भले ही मिसाइल को इंटरसेप्ट कर लिया गया, लेकिन उनका इरादा दुनिया ने साफ देख लिया. इसके अलावा, ईरान ने एक सीधा मैसेज भी दे दिया है. अगर उसके पावर प्रोजेक्ट्स पर कोई हमला हुआ, तो खाड़ी में मौजूद अमेरिका और इजरायल के एनर्जी और 'डिसैलिनेशन' इंफ्रास्ट्रक्चर को तबाह कर दिया जाएगा.

23 मार्च को उम्मीद की एक किरण तब नजर आई, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि उनके देश और ईरान के बीच इस विवाद को सुलझाने के लिए "बातचीत हुई है". ट्रंप ने यह भी ऐलान किया कि वह ईरान की पावर फैसिलिटीज पर हमला करने की अपनी 21 मार्च वाली धमकी को पांच दिनों के लिए टाल रहे हैं. हालांकि, ईरान की संसद के स्पीकर मोहम्मद-बागर गालिबाफ ने इसे "फेक न्यूज" कहकर खारिज कर दिया. लेकिन, कुछ रिपोर्ट इशारा करती हैं कि ईरान और अमेरिका के बीच हाई-लेवल कॉन्टैक्ट हुआ है, जिसके नतीजे में जल्द ही मिस्र, तुर्की और पाकिस्तान की मध्यस्थता में बातचीत शुरू हो सकती है. एक पॉजिटिव सिग्नल के तौर पर, ईरान ने 25 मार्च को यह ऐलान भी किया कि वह होर्मुज स्ट्रेट से "गैर-दुश्मन" जहाजों को गुजरने देगा.

भारतीय सैन्य जानकारों का मानना है कि यूक्रेन में रूस की ही तरह, अमेरिका और इजरायल भी अब एक लंबे युद्ध में फंस गए हैं. उनका कहना है कि ईरान को घुटनों पर लाने के लिए जमीन पर सेना उतारनी होगी. चूंकि अमेरिका के NATO सहयोगी इस पूरे मामले से दूरी बनाए हुए हैं, इसलिए एक्सपर्ट का मानना है कि यह युद्ध जल्द खत्म होने वाला नहीं है. मिलिट्री ऑपरेशंस के पूर्व महानिदेशक (DGMO) लेफ्टिनेंट जनरल विनोद भाटिया ने कहा, "इस युद्ध में किसी के पास भी कोई सटीक रणनीति नहीं है." उन्होंने यह भी जोड़ा कि असल में यह युद्ध अब एक ज्यादा विनाशकारी दौर में एंट्री कर सकता है.

भारतीय वायु सेना के पूर्व उप-प्रमुख, एयर मार्शल एस.बी.पी. सिन्हा कहते हैं, "इस युद्ध की उम्र इस बात से तय होगी कि ईरान होर्मुज स्ट्रेट से अपना कंट्रोल कब खोता है, जो अभी बारूदी माइंस और एंटी-शिप मिसाइलों व ड्रोन्स से घिरा हुआ है." सेना के एक और शीर्ष अधिकारी ने जोड़ा, "सैन्य नजरिए से देखें तो, होर्मुज स्ट्रेट का ईरानी हिस्सा किसी भी 'डिफेंडर का सपना' है क्योंकि वहां की सभी ऊंचाइयों और चोटियों पर उसी का कंट्रोल है."

भारत का स्टैंड

भारत के लिए, यह युद्ध उसके प्रमुख राष्ट्रीय हितों में एक बड़ी रुकावट है: एनर्जी सिक्योरिटी, व्यापार, प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा और इस पूरे रीजन का 'बैलेंस ऑफ पावर'. इम्पोर्टेड कच्चे तेल पर भारत की निर्भरता, जिसका एक बड़ा हिस्सा इसी स्ट्रेट से होकर आता है, उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बनी हुई है. इस रास्ते पर किसी भी तरह की लंबी नाकेबंदी भारत की अर्थव्यवस्था को गहरी चोट पहुंचा सकती है.

रणनीतिक तौर पर, यह युद्ध भारत को एक बहुत ही नाजुक स्थिति में डाल देता है. अमेरिका के साथ उसकी गहरी होती साझेदारी और इजरायल के साथ उसका मजबूत डिफेंस/टेक्नोलॉजी सहयोग अब ईरान के साथ उसके अच्छे रिश्तों के तराजू पर तौला जाना चाहिए. ईरान के साथ रिश्ते चाबहार पोर्ट जैसे कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट्स के लिए बहुत अहम हैं. खाड़ी देश भी भारत के मजबूत सहयोगी हैं और IMEC (भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे) जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए बेहद जरूरी हैं. इसलिए, भारत को अपने प्रमुख हितों की रक्षा करते हुए किसी को भी नाराज करने से बचना होगा.

सबसे बड़ा आउटरीच

किसी भी बड़े एनर्जी संकट से बचने के लिए, भारत रूस जैसे स्रोतों से कच्चा तेल खरीद रहा है, अपने स्ट्रैटेजिक रिजर्व का इस्तेमाल कर रहा है और अपने कोयला उत्पादन को बढ़ा रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले चार हफ्तों में 'टेलीफोन डिप्लोमेसी' को बहुत तेज कर दिया है. उन्होंने UAE, इजरायल, सऊदी अरब, जॉर्डन, बहरीन, ओमान, कुवैत और कतर के नेताओं को फोन किया, उनके इंफ्रास्ट्रक्चर पर हुए हमलों की निंदा की, भारत के लिए ईंधन, गैस और फर्टिलाइजर्स की लगातार सप्लाई की जरूरत पर जोर दिया, और उनसे इस पूरे रीजन में रह रहे लाखों भारतीयों की सुरक्षा पक्की करने की अपील की. 12 मार्च को पीएम मोदी ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन से बात की और तनाव कम करने व होर्मुज स्ट्रेट को खोलने की अपील की. इसके बाद 24 मार्च को, डोनाल्ड ट्रंप ने पीएम मोदी से बात की और वेस्ट एशिया के हालात पर चर्चा की.

भारत के लिए आगे का रास्ता एक 'बैलेंस्ड न्यूट्रैलिटी' यानी संतुलित तटस्थता ही है. यानी शांति की वकालत करना और सभी पक्षों के साथ अपने रिश्ते बनाए रखना. एनर्जी प्रोक्योरमेंट (खरीद) में ज्यादा विविधता की जरूरत है, जिसमें अमेरिका और अफ्रीका से सोर्सिंग शामिल है और साथ ही पेट्रोलियम रिजर्व को भी बढ़ाना होगा. यह युद्ध साफ दिखाता है कि कैसे भारत जैसे युद्ध में शामिल न होने वाले देश भी इसके नतीजों में बहुत गहराई से उलझे हुए हैं.

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