जब इजरायल-अमेरिका और ईरान युद्ध के दौरान खाड़ी के आसमान में मिसाइलें चमकीं, तो पूरे एशिया के मार्केट सहम गए. 2 मार्च को, कच्चे तेल की कीमतें 82 डॉलर प्रति बैरल की तरफ जाने लगीं, जो एक साल से ज्यादा का सबसे ऊंचा स्तर है. यह डर गहरा गया है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को अपनी चपेट में लेने वाला यह संघर्ष दुनिया के सबसे अहम 'एनर्जी कॉरिडोर' का गला घोंट सकता है.
एक दिन पहले, 'स्काईलाइट' नाम के एक ऑयल टैंकर (जिस पर पलाऊ का झंडा लगा था और जिसमें 15 भारतीय और 5 ईरानी नाविक सवार थे) को मुसंदम प्रायद्वीप के पास स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में निशाना बनाया गया. इस बढ़ते खाड़ी संकट के बीच चार क्रू मेंबर घायल हो गए और उन्हें वहां से निकालना पड़ा.
इसके बाद, सैटेलाइट और मैरीटाइम-ट्रैकिंग डेटा ने दिखाया कि क्रूड ऑयल टैंकर, LNG कैरियर और बल्क कार्गो शिप समेत 200 से ज्यादा जहाज स्ट्रेट के दोनों तरफ या तो लंगर डाले खड़े हैं या यूं ही भटक रहे हैं. यानी करीब 70 प्रतिशत सामान्य कमर्शियल ट्रैफिक रुक गया है या उसका रास्ता बदल दिया गया है.
ग्लोबल इंश्योरेंस कंपनियों ने 'वॉर-रिस्क कवरेज' को या तो रोक दिया है या 300 प्रतिशत तक बढ़ा दिया है. इस वजह से ज्यादातर शिपर्स अपने जहाजों को अरब प्रायद्वीप और केप ऑफ गुड होप (अफ्रीका) के लंबे रास्ते से मोड़ रहे हैं, जिससे हर सफर में करीब दो हफ्ते का समय और ईंधन पर लाखों डॉलर का खर्च बढ़ गया है.
ग्लोबल ऑयल सप्लाई का कम से कम 15-20 प्रतिशत, यानी लगभग 1.5 करोड़ बैरल हर दिन, आमतौर पर होर्मुज से होकर गुजरता है. इस कॉरिडोर के पूरी तरह जाम हो जाने से दुनिया भर के रिफाइनर्स और ट्रेडर्स अब दूसरे विकल्पों की तलाश में भागदौड़ कर रहे हैं. मैरीटाइम एजेंसियां इस इलाके को एक "फ्लोटिंग बॉटलनेक" (तैरता हुआ जाम) बता रही हैं, जहां मुसंदम से फुजैरा तक जहाज ही जहाज खड़े हैं. इसका नतीजा यह है कि इराक, कुवैत और सऊदी अरब के कुछ हिस्सों से होने वाला क्रूड एक्सपोर्ट लगभग ठप हो गया है, जो 1991 के खाड़ी युद्ध के बाद 'गल्फ शिपिंग' के लिए सबसे बड़ी रुकावट है. जाने-माने अर्थशास्त्री अभिरूप सरकार इंडिया टुडे से बातचीत में कहते हैं, "भारत अपनी तेल की जरूरतों का करीब 90 प्रतिशत आयात करता है और इसमें भी 50 प्रतिशत खाड़ी देशों से आयात करता है. पूरी दुनिया में खाड़ी देश कच्चे तेल के सबसे बड़े सप्लायर हैं. अगर गल्फ देशों में क्रूड ऑयल की कीमतें बढ़ती हैं तो रूसी तेल भी महंगा होगा.”
खाड़ी संकट का यह डराने वाला असर भारत में भी साफ दिख रहा है. भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले फिसलकर 91 के पार चला गया, और मुंबई से लेकर सिंगापुर तक शेयर बाजार धड़ाम हो गए. ट्रेडर्स को लग रहा है कि ईरान और अमेरिका-इजरायल धुरी के बीच यह टकराव लंबा खिंचेगा, जिसने फारस की खाड़ी को युद्ध के एक 'लाइव थिएटर' में बदल दिया है. ईरानी कमांड और बड़े नेताओं की हत्या के कथित अमेरिकी-इजरायली हमले के बाद, तेहरान ने पूरे खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी और सहयोगी ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन की झड़ी लगा दी है.
दुबई, दोहा और मनामा में हुए धमाकों से खलबली मच गई, जिसके बाद बड़ी संख्या में फ्लाइट्स कैंसिल हुईं और जहाजों के रास्ते बदले गए. वॉर-रिस्क इंश्योरेंस के रेट रातों-रात 50 प्रतिशत से ज्यादा बढ़ गए. वह इलाका जो दुनिया के एक-तिहाई हिस्से को ईंधन देता है और आधी फ्लाइट्स को जोड़ता है, अचानक लकवाग्रस्त हो गया.
फरवरी में, जब वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने केंद्रीय बजट 2026 पेश किया था, तो उन्होंने स्थिरता का इंतजाम रखा था. 2026-27 के बजट में क्रूड ऑयल की औसत कीमत 70-75 डॉलर प्रति बैरल मानी गई थी, जो महंगाई और राजकोषीय गणित के लिए एक 'सेफ्टी कुशन' था. अब ब्रेंट के 82 डॉलर के आसपास मंडराने और सप्लाई चेन में रुकावट बने रहने पर इसके और ऊपर जाने के आसार के बीच, वह गणित बहुत नाजुक दिख रहा है.
भारत हर दिन 48 से 50 लाख बैरल, या सालाना करीब 1.7 अरब बैरल क्रूड ऑयल इम्पोर्ट करता है, जो उसकी 85 प्रतिशत से ज्यादा जरूरतें पूरी करता है. मौजूदा रेट्स पर, वित्त वर्ष 2026 के लिए तेल का इम्पोर्ट बिल 130 अरब डॉलर पार कर सकता है, जो भारत की GDP का करीब 3 प्रतिशत है. अगर क्रूड 90 डॉलर तक गया, तो यह बिल 150 बिलियन डॉलर के करीब पहुंच सकता है. कच्चे तेल में हर 10 डॉलर के उछाल से महंगाई में 0.3 प्रतिशत का इजाफा होता है और 'करंट-अकाउंट डेफिसिट' 0.2-0.3 पॉइंट बढ़ जाता है.
रुपये की गिरावट से 'इम्पोर्टेड इन्फ्लेशन' का असर और बड़ा हो जाता है, जिससे बिजली, खाद और ट्रांसपोर्ट की लागत बढ़ जाती है. भारत का पूरा लॉजिस्टिक्स डीजल पर चलता है, रसोई की आंच LPG से जलती है. अगर तेल की कीमतों में लंबा उछाल रहा, तो इसका सीधा असर घर के बजट पर पड़ेगा, फिस्कल डिसिप्लिन खतरे में आ जाएगा और RBI को महंगाई कंट्रोल करने और ग्रोथ को सपोर्ट देने के बीच एक तंग रस्सी पर चलना होगा.
भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 723.61 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया है, जो करीब पांच सालों में सबसे ज्यादा है और 11 महीने के इम्पोर्ट को कवर करने के लिए काफी है. ऐसे में RBI के पास अपने टारगेटेड दखल और लिक्विडिटी ऑपरेशंस के जरिए रुपये को संभालने की पूरी ताकत है. फिर भी, 'मॉनेटरी पॉलिसी कमिटी' की अगली बैठक अप्रैल की शुरुआत में ही होनी है. इसलिए RBI के तुरंत उठाए जाने वाले कदम सिर्फ फॉरेक्स मैनेजमेंट और शॉर्ट-टर्म लिक्विडिटी सपोर्ट तक ही सीमित हैं. बीच में रेट्स को लेकर कोई भी फैसला क्रेडिट और ग्रोथ को अस्थिर कर सकता है. फिलहाल, सेंट्रल बैंक की रणनीति खामोशी से बचाव की है, यानी उतार-चढ़ाव को सोखना और अगर 'इम्पोर्टेड इन्फ्लेशन' स्ट्रक्चरल हो जाए, तो एक्शन लेने के लिए तैयार रहना.
भारत और खाड़ी देशों के बीच रोजाना करीब 950-1,000 फ्लाइट्स चलती हैं, जिनमें एक तरफ से लगभग 1,80,000 यात्री सफर करते हैं. दुबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट और हमाद इंटरनेशनल एयरपोर्ट के प्रतिबंधों या आंशिक शटडाउन के तहत काम करने के कारण, भारतीय एयरलाइंस का भारी नुकसान हो रहा है. एविएशन इंडस्ट्री का अनुमान है कि फ्लाइट्स कैंसिल होने, डायवर्ट होने और लंबे रास्तों की वजह से हर हफ्ते 480-500 करोड़ रुपये का घाटा हो रहा है.
इस रुकावट ने अमेरिका और यूरोप की 'लॉन्ग-हॉल' कनेक्टिविटी की भी कमर तोड़ दी है, क्योंकि भारत से पश्चिम की ओर जाने वाली ज्यादातर फ्लाइट्स ईंधन भरने और 'ओवरफ्लाइट कॉरिडोर' के लिए खाड़ी के एयरस्पेस का ही इस्तेमाल करती हैं. इन रास्तों में कटौती और भारतीय एयरलाइंस के लिए पाकिस्तान का एयरस्पेस पहले से ही बंद होने के कारण, अब जो चक्कर काटना पड़ रहा है वह और भी सजा जैसा है.
फ्लाइट्स अब उत्तर की ओर कजाकिस्तान, जॉर्जिया या लाल सागर से होकर चक्कर लगा रही हैं, जिससे उड़ान के समय में तीन से पांच घंटे जुड़ गए हैं और किराये में 25-40 प्रतिशत का उछाल आ गया है. यात्रियों और एयरलाइंस दोनों के लिए, पश्चिम की यात्रा अचानक लंबी, महंगी और बहुत ज्यादा अनिश्चित हो गई है.
इस पूरे नेटवर्क में संयुक्त अरब अमीरात (UAE) सबसे अहम कड़ी है. यह भारत का तीसरा सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर है, जिसके साथ FY25 में 85 बिलियन डॉलर का द्विपक्षीय कारोबार हुआ, और अमेरिका के बाद यह दूसरा सबसे बड़ा एक्सपोर्ट डेस्टिनेशन है. जेबेल अली फ्री जोन के रास्ते मशीनरी, जूलरी, फूड प्रोडक्ट्स और टेक्सटाइल की सप्लाई होती है, जो भारतीय एक्सपोर्ट का लॉजिस्टिक्स हब है. वहां रुकावट आने से सप्लाई चेन का दम घुटता है और हजारों भारतीय छोटे और मझोले कारोबारियों के पेमेंट्स में देरी होती है.
UAE एक बहुत बड़ा इन्वेस्टर भी है. अबू धाबी के सॉवरेन वेल्थ फंड्स ने भारतीय इंफ्रास्ट्रक्चर, फिनटेक और ग्रीन-एनर्जी प्रोजेक्ट्स में 15 बिलियन डॉलर से ज्यादा लगाने का वादा किया है. अगर लंबे समय तक अस्थिरता बनी रही जिससे दुबई या अबू धाबी में इन्वेस्टर्स का भरोसा डगमगाया, तो इसका असर नए फंड्स के आने पर पड़ेगा और भविष्य में होने वाली FDI डील्स पटरी से उतर सकती हैं.
लेकिन सबसे ज्यादा अनिश्चितता 'नॉन-स्टेट एक्टर्स' की भूमिका को लेकर है. खुफिया ब्रीफिंग और रीजनल मॉनिटरिंग रिपोर्ट्स चेतावनी देती हैं कि हिजबुल्लाह, हूती और इराक व सीरिया में ईरान-समर्थित मिलिशिया जैसे समूह इस मौके का फायदा उठाकर तनाव और बढ़ा सकते हैं. हूती विद्रोहियों ने फरवरी के आखिर से बाब अल-मंडेब स्ट्रेट में कमर्शियल जहाजों पर कम से कम पांच ड्रोन और मिसाइल हमलों की जिम्मेदारी ली, जिसमें भारत आ रहा लाइबेरिया के झंडे वाला एक क्रूड कैरियर भी शामिल है. इससे ग्लोबल इंश्योरेंस कंपनियों को पूरे कॉरिडोर को "वॉर-रिस्क ज़ोन" घोषित करना पड़ा. इस सकरे रास्ते से आमतौर पर भारत का पश्चिम की ओर जाने वाला करीब 10 प्रतिशत कार्गो और यूरोप जाने वाला 20 प्रतिशत कंटेनर ट्रैफिक गुजरता है. यहां से गुजरने का औसत समय अब दोगुने से ज्यादा होकर 20 दिन हो गया है, और फ्रेट व इंश्योरेंस प्रीमियम 40-50 प्रतिशत तक बढ़ गए हैं.
इस बीच, इजरायल की उत्तरी सीमा पर हिजबुल्लाह की लामबंदी ने अमेरिका और उसके सहयोगियों की निगरानी और नौसैनिक बेड़ों को खाड़ी के काफिलों की सुरक्षा से हटाकर अपनी तरफ खींच लिया है. इससे अरब सागर और लाल सागर में कमर्शियल रास्ते और ज्यादा असुरक्षित हो गए हैं. लॉयड्स के एनालिस्ट्स का अनुमान है कि अगर ऐसे 'प्रॉक्सी अटैक' मार्च में भी जारी रहे, तो ग्लोबल मैरीटाइम इंश्योरेंस बिल हर महीने 1.5 अरब डॉलर से ज्यादा बढ़ सकता है, जिससे शिप किए जाने वाले क्रूड के हर बैरल पर एक नया रिस्क प्रीमियम जुड़ जाएगा. यह सब मिलकर एक धीमी आंच वाले 'सप्लाई-चेन वॉर' में बदल रहा है, जो भाड़े और ईंधन की कीमतों को दर्दनाक हद तक ऊंचा रखेगा और भारत जैसे एनर्जी-इम्पोर्ट करने वाले देशों के लिए रिकवरी के प्लान को मुश्किल बना देगा.
एक बड़े क्षेत्रीय संघर्ष का दबाव खाड़ी के लेबर मार्केट्स पर भी पड़ेगा. अशांति, उड़ानों पर रोक या अमीरात में कम समय के लिए निकाले जाने से वहां काम करने वाले प्रवासियों के वीज़ा रिन्यूअल या वेतन मिलने में देरी हो सकती है. खाड़ी देशों से आने वाला 'रेमिटेंस', जिसका अनुमान सालाना 45-50 बिलियन डॉलर है और जो भारत के कुल रेमिटेंस का करीब 40 प्रतिशत है, केरल, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में घरेलू खर्च की रीढ़ है. खाड़ी में रोजगार पर लंबे समय तक कोई भी रुकावट घर वापसी पर ग्रामीण मांग, रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट और छोटे शहरों के क्रेडिट साइकिल को सुस्त कर सकती है.
फाइनेंशियल मार्केट्स में भी यह घबराहट साफ दिख रही है. बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज (BSE) के बेंचमार्क इंडेक्स में भारी उथल-पुथल रही, क्योंकि इन्वेस्टर्स खाड़ी संघर्ष के असर का हिसाब लगा रहे हैं. 2 मार्च को सेंसेक्स 1,000 अंक से ज्यादा गिरकर नवंबर 2025 के बाद पहली बार 80,000 के नीचे फिसल गया, जबकि निफ्टी 50 गिरकर लगभग 24,850 पर आ गया; दोनों एक ही दिन में करीब 1.2 प्रतिशत लुढ़क गए. निफ्टी VIX (Nifty VIX) 25 के ऊपर छलांग लगा गया- जो मार्केट स्ट्रेस का एक रेड-ज़ोन सिग्नल है. सेक्टर्स का हाल भी साफ था. एनर्जी और डिफेंस स्टॉक्स में ज्यादा मार्जिन और नए ऑर्डर्स की उम्मीद में 6-8 प्रतिशत की तेजी आई, जबकि एविएशन और ऑटो स्टॉक्स जेट-फ्यूल की बढ़ती कीमतों के कारण 4-5 प्रतिशत डूब गए.
विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) ने दो हफ्तों में शेयरों से करीब 15,200 करोड़ रुपये (1.8 बिलियन डॉलर) निकाल लिए, हालांकि घरेलू फंड्स ने करीब 12,000 करोड़ रुपये की खरीदारी करके इस गिरावट को थोड़ा संभाला. 10-साल की सरकारी-बॉन्ड यील्ड बढ़कर 7.19 प्रतिशत हो गई, और रिस्क प्रीमियम बढ़ने से कॉर्पोरेट-बॉन्ड स्प्रेड 10-12 बेसिस पॉइंट्स बढ़ गए. RBI ने लिक्विडिटी भरपूर बनाए रखी, 25,000 करोड़ रुपये के ओपन-मार्केट ऑपरेशंस किए और रुपये का बचाव करने की तैयारी का संकेत दिया. डॉलर के मुकाबले करेंसी का 91 के पार गिरना, इम्पोर्ट बिल के झटके और दुनिया भर के इन्वेस्टर्स का सुरक्षित ठिकानों की तरफ भागने का नतीजा है.
1 मार्च की शाम, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने नए दफ्तर सरदार पटेल भवन (PMO का नया कमांड सेंटर) में कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी (CCS) की एक इमरजेंसी मीटिंग बुलाई. मेज के चारों ओर राजनाथ सिंह, अमित शाह, एस. जयशंकर, निर्मला सीतारमण के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल, प्रधान सचिव पी.के. मिश्रा और शक्तिकांत दास, कैबिनेट सचिव टी.वी. सोमनाथन और सेनाओं के प्रमुख बैठे थे.
एजेंडा बिल्कुल साफ था - उस इलाके में फंसे भारतीयों, एनर्जी और शिपिंग सिक्योरिटी, और फाइनेंशियल-मार्केट की स्थिरता पर खाड़ी युद्ध के असर का आकलन करना. CCS ने क्रूड ऑयल के 82 डॉलर प्रति बैरल के पार जाने पर लोगों को सुरक्षित निकालने के प्रोटोकॉल, क्रूड-सप्लाई के वैकल्पिक रास्तों और एविएशन व रुपये पर पड़ने वाले असर की समीक्षा की.
दिल्ली के वित्त मंत्रालयों के गलियारों में, गणित गंभीर है लेकिन जाना-पहचाना है. तेल में हर 10 डॉलर की बढ़ोतरी से इम्पोर्ट बिल में लगभग 1.4 लाख करोड़ रुपये जुड़ जाते हैं. 1.2 प्रतिशत जीडीपी के टारगेट वाला 'करंट-अकाउंट डेफिसिट' अब 1.8 प्रतिशत तक बढ़ने का जोखिम ले रहा है, जबकि अगर ईंधन या खाद पर सब्सिडी वापस लानी पड़ी तो 'फिस्कल कंसोलिडेशन' के लक्ष्य भी फिसल सकते हैं. हेडलाइन इन्फ्लेशन, जो अभी 4.9 प्रतिशत है, अगर यह रुकावट गर्मियों तक खिंचती है तो 6 प्रतिशत की बर्दाश्त की सीमा को पार कर सकती है.
राहत के लिए कुछ बफर भी मौजूद हैं. भारत के स्ट्रेटेजिक पेट्रोलियम रिज़र्व - मैंगलोर SPR, विशाखापट्टनम SPR और पाडुर SPR में करीब 10-15 दिनों की मांग को कवर करते हैं. RBI के पास रिकॉर्ड 723.6 बिलियन डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है, जो 11 महीने के इम्पोर्ट के लिए काफी है और जिससे उसे रुपये के उतार-चढ़ाव को संभालने की जगह मिलती है. भारतीय रिफाइनर्स रूस, गुयाना और पश्चिमी अफ्रीकी देशों से एक्स्ट्रा कार्गो खींच रहे हैं, हालांकि ऊंचे भाड़े और इंश्योरेंस की लागत इस फायदे को काफी हद तक कम कर देती है.
फिलहाल, आंकड़े होश उड़ाने वाले हैं. 130 बिलियन डॉलर के करीब पहुंचने वाला 'ऑयल-इम्पोर्ट बिल' पहले ही केंद्र के कुल स्वास्थ्य और शिक्षा बजट के बराबर है. हर 10 डॉलर की अतिरिक्त बढ़ोतरी इसमें 17 बिलियन डॉलर और जोड़ देती है. पेट्रोलियम व प्राकृतिक गैस मंत्रालय और विदेश मंत्रालय टैंकरों के रास्तों को सुरक्षित करने, सप्लाई को डाइवर्सिफाई करने और 'इमरजेंसी स्वैप' को-ऑर्डिनेट करने के लिए मिलकर काम कर रहे हैं, लेकिन जब तक खाड़ी में स्थिरता नहीं आती, रिस्क प्रीमियम बना रहेगा.
जैसे-जैसे होर्मुज के पास टैंकर खाली खड़े हैं और एयरलाइंस अफ्रीका के ऊपर से चक्कर काट रही हैं, एक सच्चाई बिल्कुल साफ है: ग्लोबलाइजेशन खतरे में है. एनर्जी, शिपिंग, फाइनेंस और लेबर, सब खाड़ी के इसी रेगिस्तानी हिस्से में आकर मिलते हैं. भारत के लिए, यह युद्ध कोई दूर का तमाशा नहीं है, बल्कि हमारी अपनी निर्भरता का आईना है. पटना में डीजल की कीमत, JNPT पर इंतजार करता कंटेनर, रियाद से आने वाला पैसा, और दुबई में बैठा इन्वेस्टर, सब अब रेगिस्तान के ऊपर मिसाइलों की धुन पर नाच रहे हैं. यह खाड़ी की आग एक गुजरता हुआ बुखार बनती है या कोई गहरा निशान छोड़ती है, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि आने वाले हफ्तों में भारत कितनी चतुराई से अपनी कूटनीति, एनर्जी रणनीति और 'इकोनॉमिक रेजिलिएंस' के बीच तालमेल बिठाता है.

