भारत में गर्मी से निपटने का जो सरकारी सिस्टम है, उसमें एक बहुत बड़ी कमी है जिसे अनदेखा किया जा रहा है. जब सरकार हीटवेव घोषित करती है तो वह सिर्फ बाहर के तापमान को देखकर फैसला लेती है. यानी मौसम विभाग के खुले में लगे उपकरणों से जो तापमान रिकॉर्ड होता है, उसी के आधार पर चेतावनी जारी होती है.
लेकिन असली परेशानी घरों के अंदर की गर्मी है, जिस पर अब तक ध्यान ही नहीं दिया गया. दिल्ली की रिसर्च संस्था क्लाइमेट ट्रेंड्स (Climate Trends) की 13 मई को जारी एक स्टडी में बताया गया है कि शहरों में रहने वाले गरीब और मध्यम वर्ग के लोग अपने ही घरों में लगातार खतरनाक गर्मी झेल रहे हैं.
यह स्टडी चेन्नई के 50 घरों में लगाए गए सेंसर के आधार पर की गई है. रिसर्च अक्टूबर 2025 से अप्रैल 2026 के बीच हुई, यानी सबसे तीखी गर्मी के मौसम से पहले. इसके बावजूद घरों के अंदर का तापमान कई बार 32 डिग्री सेल्सियस से ऊपर मिला.
इस स्टडी का मकसद एक शुरुआती आंकड़ा (बेसलाइन) तैयार करना था. और इस शुरुआती दौर में ही जो आंकड़े सामने आए हैं, वे डराने वाले हैं.
जिन घरों पर नजर रखी गई, उनमें घर के अंदर का तापमान अक्सर 32 डिग्री सेल्सियस के पार चला गया. यहां तक कि कम गर्मी वाले महीनों में भी, रात के 8 बजे से सुबह 6 बजे के बीच घर के अंदर का तापमान शायद ही कभी 31 डिग्री सेल्सियस से नीचे आया हो.
कई घरों में साल के 3,000 से 5,000 घंटे तक तापमान 32 डिग्री से ऊपर रहा. सबसे ज्यादा प्रभावित घरों में यह आंकड़ा 5,700 से 5,800 घंटे तक पहुंच गया, यानी करीब 8 महीने लगातार हीट स्ट्रेस जैसी स्थिति.
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि घरों के अंदर सबसे ज्यादा गर्मी दोपहर में नहीं बल्कि रात 8 से 9 बजे के बीच रिकॉर्ड हुई. तापमान करीब 34.7 डिग्री तक पहुंच गया. वजह यह है कि कंक्रीट की छत और दीवारें दिनभर की गर्मी को सोख लेती हैं और रात में धीरे-धीरे छोड़ती रहती हैं.
इसके साथ रात में नमी 75 प्रतिशत से ज्यादा बनी रही. इससे शरीर को पसीने के जरिए खुद को ठंडा करने में दिक्कत होती है और अच्छी नींद लेना मुश्किल हो जाता है.
स्टडी में पाया गया कि ज्यादातर घरों में RCC यानी रीइन्फोर्स्ड सीमेंट कंक्रीट का इस्तेमाल हुआ है जो गर्मी को लंबे समय तक रोककर रखता है. अमीर और गरीब, दोनों के घरों में यह समस्या दिखी. फर्क सिर्फ इतना था कि अमीर परिवारों के पास AC था जबकि गरीब परिवार सिर्फ पंखे पर निर्भर थे.
रिसर्चर्स का कहना है कि सिर्फ AC लगाने से समस्या पूरी तरह हल नहीं होगी क्योंकि कंक्रीट की इमारतें 24 घंटे तक गर्मी पकड़े रहती हैं. AC बंद होते ही गर्मी फिर लौट आती है.
भारत में इस समय 300 से ज्यादा हीट एक्शन प्लान हैं और करीब 100 नए प्लान तैयार हो रहे हैं. लेकिन इनमें से किसी में भी घरों के अंदर का तापमान मॉनिटर करने का नियम नहीं है. सभी प्लान सिर्फ बाहर के तापमान के आधार पर काम करते हैं.
स्टडी में सुझाव दिया गया है कि गरीब और मध्यम वर्ग के घरों में कूल रूफ और रिफ्लेक्टिव कोटिंग जैसी तकनीकों को सब्सिडी के साथ बढ़ावा दिया जाए. बिल्डिंग डिजाइन में हवा आने-जाने की बेहतर व्यवस्था हो. ऐसे निर्माण सामग्री का इस्तेमाल बढ़ाया जाए जो कम गर्मी सोखती हो. साथ ही हीट एक्शन प्लान में इनडोर तापमान की मॉनिटरिंग भी जरूरी की जाए.
इसी हफ्ते नेचर कम्युनिकेशंस (Nature Communications) में छपी एक दूसरी स्टडी में दुनिया के करीब 9,000 शहरों का विश्लेषण किया गया. इसमें पाया गया कि शहरों में पेड़ों की संख्या बढ़ने से अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट (Urban Heat Island Effect) को 41-49% तक कम किया जा सकता है. लेकिन गरीब और घनी आबादी वाले इलाकों में पेड़ कम हैं, इसलिए वहां गर्मी का असर ज्यादा है.
दोनों स्टडी का निष्कर्ष एक जैसा है. भारत की गर्मी से निपटने की व्यवस्था अभी सिर्फ दिन में बाहर की गर्मी पर केंद्रित है. जबकि सबसे ज्यादा खतरा उन लोगों को है जो रात में कंक्रीट के गर्म घरों के अंदर रहने को मजबूर हैं.

