बीते साल जनवरी की तुलना में इस साल भारतीय अर्थव्यवस्था में सिर्फ डिजिटल भुगतान नहीं, बल्कि करेंसी सर्कुलेशन में भी भारी उछाल देखने को मिला है. जनवरी 2026 में करेंसी सर्कुलेशन रिकॉर्ड 40 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गई, जो पिछले जनवरी की तुलना में 11 फीसदी ज्यादा है.
करेंसी सर्कुलेशन में अचानक हुई वृद्धि काफी हैरान करने वाली है. अब एक बड़ा सवाल यह है कि UPI के जरिए डिजिटल भुगतान में भारी वृद्धि के बावजूद करेंसी सर्कुलेशन की मात्रा इतनी कैसे बढ़ सकती है? जनवरी में UPI लेनदेन का मूल्य रिकॉर्ड 28.33 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया, जो पिछले साल के इसी महीने की तुलना में करीब 20 फीसद ज्यादा है.
ऐसा कैसे हुआ? स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) के एक रिसर्च नोट के मुताबिक, टैक्स एनफोर्समेंट (टैक्स की सख्ती) एक वजह थी. दूसरी वजहें थीं ब्याज दरों में कमी से बढ़ी खपत और कीमती धातुओं (सोना-चांदी) की ऊंची कीमतें, जिसकी वजह से घरों में लोग सोना और चांदी बेच रहे थे.
कुछ समय पहले तक करेंसी सर्कुलेशन यानी चलन में नकदी को आम लोगों के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण डेटा नहीं माना जाता था, लेकिन नवंबर 2016 में बड़े नोटों की कानूनी मान्यता खत्म होने के बाद इस शब्द ने काफी महत्व हासिल कर लिया. काले धन पर रोक लगाने के अलावा, केंद्र सरकार ने नोटबंदी का एक मुख्य उद्देश्य यह भी बताया था कि चलन में नकदी की मात्रा को कम करके डिजिटल भुगतान को बढ़ावा दिया जाएगा.
दिलचस्प बात यह है कि पिछले कुछ वर्षों में डिजिटल भुगतान में वृद्धि के साथ-साथ नकदी का प्रचलन भी बढ़ा है. SBI की रिपोर्ट के मुताबिक, ATM से प्रति माह नकद निकासी 25 लाख रुपए के दीर्घकालिक औसत को पार कर सकती है, जिसमें कर्नाटक, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में ATM से नकदी निकासी में वृद्धि का रुझान देखा गया है.
UPI लेनदेन के आधार पर छोटे विक्रेताओं को लगभग 18,000 वस्तु एवं सेवा कर (GST) नोटिस जारी किए गए, और यह कर्नाटक, पश्चिम बंगाल और केरल में ATM से निकासी में वृद्धि के साथ मेल खाता है.
SBI की रिपोर्ट में कहा गया है, "ब्याज दर में कमी के कारण नकदी की मांग बढ़ रही है. खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में जहां चीजों और वस्तुओं के उपभोग की प्रवृत्ति बढ़ी है." रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष करों में कटौती के कारण शहरी क्षेत्रों में भी उपभोग बढ़ रहा है.
रिपोर्ट की मानें तो GST और आयकर दरों में कटौती ने घरेलू उपभोग को बढ़ावा देने में प्रोत्साहन का काम किया है. इस बीच, 100, 200 और 500 रुपए के नोटों का हिस्सा बढ़ गया है, जिन्होंने 2,000 रुपए के नोटों की जगह ले ली है. 2023 और 2025 के बीच 50 और 100 रुपए के नोटों में 1.5 फीसद की वृद्धि हुई, जबकि 200 और 500 रुपए के नोटों में 4 फीसद की वृद्धि हुई.
SBI की रिपोर्ट के मुताबिक, 19 मई, 2023 से 3.56 लाख करोड़ रुपए मूल्य के 2,000 रुपए के नोटों को चलन से बाहर करने के बाद 2,000 रुपए के नोटों का हिस्सा वित्त वर्ष 2023 में 11.3 से घटकर 0.02 फीसदी हो गया है.
हालांकि, जनता की सुविधा के लिए, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने अप्रैल 2025 में बैंकों को एटीएम में 100, 200 रुपए के नोटों की संख्या बढ़ाने और यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि मार्च 2026 के अंत तक 96 फीसद ATM से 100, 200 रुपए के नोट निकलने लगें.
एक ओर प्रचलन में नकदी की मात्रा में लगातार वृद्धि हो रही है. वहीं, दूसरी तरफ हाल के वर्षों में "नकदी-से-GDP" अनुपात वित्त वर्ष 2021 के 14.4 फीसद से घटकर वित्त वर्ष 2026 में 11 फीसद हो गया है. इसका मतलब देश की कुल अर्थव्यवस्था (GDP) की तुलना में प्रचलन में मौजूद कुल नकदी (नोट और सिक्के) के फीसद से है. यह बताता है कि अर्थव्यवस्था डिजिटल होने के बजाय कितनी नकद-आधारित है.

