पंच कुन नाम के एक बंदर के बच्चे ने, जिसे उसकी मां ने छोड़ दिया था और जिसे जापान के एक चिड़ियाघर में पाला गया, खामोशी से हमारी स्क्रीन्स पर कब्जा कर लिया है. बच्चे इस वीडियो को लूप में देखते हैं. बड़े इसे फैमिली ग्रुप्स में फॉरवर्ड करते हैं.
टीनएजर्स इसकी नकल उतारते हैं. इस बंदर की इंसानों जैसी जिज्ञासा, उसके सीधे खड़े होकर चलने की अटपटी कोशिशें, अपने केयरटेकर की नकल करने की उसकी फितरत, यह सब बहुत जाना-पहचाना सा लगता है, बिल्कुल किसी बच्चे को सीखते हुए देखने जैसा.
लेकिन ठीक यही वजह है कि यह बात मायने रखती है. अगर एक मासूम सी रील लोगों का ध्यान इस कदर अपनी तरफ खींच सकती है, तो तब क्या होगा जब यही एल्गोरिदम कुछ ज्यादा खतरनाक परोसने लगे, जैसे हिंसा, सेक्शुअल कंटेंट, गलत जानकारी, या ऐसे 'इमोशनल ट्रिगर्स' जिन्हें यूजर्स को स्क्रीन से चिपकाए रखने के लिए बड़ी चालाकी से डिजाइन किया गया हो?
यही सवाल अब भारत में हो रहे एक बड़े नीतिगत बदलाव के केंद्र में है. एक संसदीय समिति ने सोशल मीडिया, डेटिंग और गेमिंग प्लैटफॉर्म्स के लिए 'नो योर कस्टमर' (KYC) वेरिफिकेशन को अनिवार्य करने की सिफारिश की है. इसका मकसद फर्जी प्रोफाइल्स, ट्रोलिंग और साइबर क्राइम पर लगाम लगाना है. लेकिन इसका असर इससे कहीं ज्यादा व्यापक हो सकता है.
अकाउंट्स को वेरिफाइड पहचान और उम्र से जोड़कर, KYC असल में बच्चों के लिए सोशल मीडिया के दरवाजे हमेशा के लिए बंद कर सकता है. ऐसा हो सकता है कि भारत बिना कोई औपचारिक ऐलान किए ही, नाबालिगों के ऑनलाइन होने पर एक 'डिफैक्टो बैन' यानी अघोषित पाबंदी की तरफ बढ़ रहा हो. भारत अभी प्रयोग कर रहा है. कर्नाटक और आंध्र प्रदेश जैसे राज्य नाबालिगों के लिए स्क्रीन टाइम और डेटा के इस्तेमाल की सीमा तय करने पर विचार कर रहे हैं.
रेगुलेशन की यह मांग अब सिर्फ नैतिकता से नहीं उपजी है. यह सबूतों और अब अदालतों पर टिकी है. अमेरिका में, कैलिफोर्निया की एक जूरी ने हाल ही में 'मेटा' और यूट्यूब को एक ऐसे मामले में जिम्मेदार ठहराया है, जहां एक युवती ने कहा था कि बचपन में उसे इन प्लेटफॉर्म्स की लत लग गई थी. जूरी ने माना कि कंपनियों ने ऐसे लत लगाने वाले सिस्टम बनाने और यूजर्स को इसके खतरों के बारे में चेतावनी न देने में लापरवाही बरती है. इस फैसले को एक टर्निंग पॉइंट माना जा रहा है, और ऐसे 1,500 से ज्यादा मामले कतार में हैं. हालांकि, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इसके खिलाफ अपील करेंगे.
इस फैसले की गूंज आसानी से भारत तक पहुंचती है, जहां चीजों को अपनाने के मुकाबले नियम-कानून बहुत पीछे छूट गए हैं. यहां, बच्चे सिर्फ यूजर नहीं हैं. वे इस ‘अटेंशन इकॉनमी’ के सबसे बड़े टारगेट हैं. एल्गोरिदम बहुत जल्दी सीखते हैं. आप एक क्राइम वीडियो देखिए, और आपकी फीड वैसे ही और वीडियोज से भर जाएगी. किसी सनसनीखेज रील पर थोड़ा रुकिए, और प्लेटफॉर्म आपको वैसी ही दर्जनों रील्स परोस देगा. जो चीज सिर्फ एक जिज्ञासा के तौर पर शुरू होती है, वह अक्सर एक लूप बन जाती है.
खतरे कई परतों में
पोर्नोग्राफी और हिंसक कंटेंट तक खुली पहुंच, फैक्ट्स के नाम पर परोसी जा रही गलत जानकारी, और ऐसे टूल्स जो नाबालिगों को भी 'डीपफेक' या फेक तस्वीरें बनाने की ताकत देते हैं. फिल्मों या टेलीविजन के उलट, यहां उम्र का कोई 'मीनिंगफुल बैरियर' नहीं है. कोई सर्टिफिकेशन नहीं है. कोई ब्रेक नहीं है. बस एक न खत्म होने वाला स्क्रॉल है. अब चिंता इस बात की नहीं है कि बच्चे क्या देख सकते हैं, बल्कि इस बात की है कि वे इस दलदल में कितनी गहराई तक धंसते जा रहे हैं और वहां से बाहर निकलना कितना मुश्किल है.
KYC कैसे खींचेगा नई लकीर : संसदीय समिति की सिफारिश सुनने में एकदम सीधी लगती है. यूजर्स को वैसे ही वेरिफाई करें जैसे बैंक या टेलीकॉम कंपनियां करती हैं. अकाउंट्स को यूजर्स की असली पहचान से जोड़ें. उनकी उम्र कन्फर्म करें. और इस प्रोसेस को समय-समय पर दोहराएं.
लेकिन इसके नतीजे पूरी तरह से 'स्ट्रक्चरल' होंगे. अगर उम्र वेरिफाई हो जाती है, तो एक तय सीमा से कम उम्र के बच्चों की एंट्री पूरी तरह से रोकी जा सकती है. अगर पहचान बताना अनिवार्य हो जाता है, तो गुमनामी खत्म हो जाएगी. अगर प्लेटफॉर्म्स को जवाबदेह ठहराया जाता है, तो नियमों का सख्ती से पालन करना ही होगा. असल में, KYC डिजिटल उपभोक्ता बनने की उम्र तय करने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार कर देता है. एक ऐसा गेट जो आज के आसानी से बाईपास हो जाने वाले "अपनी जन्मतिथि दर्ज करें" सिस्टम से कहीं ज्यादा मजबूत है. पहली बार, नाबालिगों पर पाबंदी लगाना तकनीकी रूप से मुमकिन हो जाएगा. लेकिन यहीं से स्पष्टता खत्म होती है और असली उलझन शुरू होती है.
बदलता समाज
यह पूरी बहस बच्चों के इर्द-गिर्द बुनी गई है. लेकिन हकीकत इससे कहीं ज्यादा बड़ी है. घरों में, अब सबसे छोटी स्क्रीन ने सबसे बड़ी स्क्रीन की जगह ले ली है. स्मार्टफोन, जो कभी बातचीत का जरिया हुआ करता था, अब एक पर्सनल टेलीविजन बन गया है. इसी पर सीरियल देखे जाते हैं. इसी पर फिल्में स्ट्रीम होती हैं. इसी पर खबरें पढ़ी जाती हैं. अक्सर इसे हाथ से नीचे ही नहीं रखा जाता- यहां तक कि खाना बनाते, खाते या बातचीत करते वक्त भी.
जो बड़े-बुजुर्ग कभी बच्चों के बहुत ज्यादा टीवी देखने को लेकर चिंता करते थे, वे खुद भी अब शॉर्ट वीडियोज, फॉरवर्ड्स और स्ट्रीमिंग कंटेंट के कभी न खत्म होने वाले स्क्रॉल में डूब गए हैं. यह लत अब सिर्फ किसी एक पीढ़ी की नहीं रही. यह 'यूनिवर्सल' हो चुकी है. यह बात नैतिक तर्कों को उलझा देती है. अगर बड़े खुद अपने इस्तेमाल पर कंट्रोल नहीं कर पा रहे हैं, तो क्या बच्चों से ऐसा करने की उम्मीद करना व्यवहारिक है? और अगर रेगुलेशन जरूरी है, तो क्या इसे सिर्फ नाबालिगों तक सीमित रहना चाहिए?
जब कनेक्शन बन जाए तबाही
एक और बदलाव है जिस पर ज्यादा बात नहीं होती. भारत जैसे समाज में, जहां पुरुषों और महिलाओं के बीच सामाजिक मेलजोल कभी बहुत नपा-तुला और सीमित हुआ करता था, वहां सोशल मीडिया ने एकदम नए रास्ते खोल दिए हैं. पुरानी दोस्तियां फिर से जिंदा हो रही हैं. अजनबी अब जाने-पहचाने लगने लगे हैं. जो बातचीत कभी नामुमकिन सी लगती थी, वह अब रोज, निजी तौर पर और लगातार हो रही है.
कई लोगों के लिए, इसका मतलब आजादी और अभिव्यक्ति रहा है. लेकिन दूसरों के लिए, यह एक उथल-पुथल लेकर आया है. कैजुअल ऑनलाइन बातचीत के भावनात्मक जुड़ाव और कभी-कभी 'एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर्स' में बदलने से कई शादियां टूटने के कगार पर आ गई हैं. यह बदलाव बहुत बारीक लेकिन गहरा है: शारीरिक निकटता से डिजिटल जान-पहचान की तरफ.
कुछ मामलों में, इसके नतीजे बहुत खौफनाक रहे हैं. अलग-अलग राज्यों के पुलिस रिकॉर्ड बताते हैं कि कैसे ऑनलाइन रिश्तों के कारण सिर्फ विवाद या तलाक ही नहीं, बल्कि भारी हिंसा भी हुई है. राजस्थान में, 30-35 साल की एक महिला स्कूल टीचर कथित तौर पर सैकड़ों किलोमीटर का सफर तय करके बाड़मेर में उस आदमी से मिलने पहुंची, जिससे उसकी ऑनलाइन दोस्ती हुई थी. आरोप है कि उस पहले से शादीशुदा आदमी ने उसकी हत्या कर दी.
ऐसे मामले भले ही कोई नियम न हों. लेकिन ये अलग-थलग घटनाएं भी नहीं हैं. वे एक कड़वे सच को उजागर करते हैं: सोशल मीडिया इंसानी बर्ताव को सिर्फ 'एम्प्लीफाई' यानी बढ़ाता है, वह उसे कंट्रोल नहीं करता.
इस माहौल में बड़े हो रहे बच्चों के लिए, खतरा सिर्फ कंटेंट का नहीं है, बल्कि 'इंटरैक्शन' का है. वे किस पर भरोसा करते हैं, जान-पहचान कितनी जल्दी बढ़ती है, और आभासी व असली दुनिया के बीच की लकीर कितनी धुंधली हो सकती है.
वह विरोधाभास जिससे भारत बच नहीं सकता: भले ही पॉलिसीमेकर्स पाबंदियों पर विचार कर रहे हों, लेकिन भारत की डिजिटल पहुंच पर निर्भरता लगातार गहरी होती जा रही है. क्लासरूम ऑनलाइन हो गए हैं. असाइनमेंट डिजिटल हो गए हैं. ट्यूटोरियल यूट्यूब पर हैं. कोडिंग, AI टूल्स और रिसर्च, सबके लिए इंटरनेट चाहिए. जिस डिवाइस से पढ़ाई होती है, वही 'डिस्ट्रैक्शन' के दरवाजे भी खोलता है.
यह एक ऐसा विरोधाभास पैदा करता है जिसे अकेले कोई पॉलिसी नहीं सुलझा सकती. एक बच्चे से यह उम्मीद की जाती है कि वह पढ़ाई के लिए स्मार्टफोन का इस्तेमाल करे, लेकिन सोशल मीडिया से दूर रहे. एक टीनएजर को इंटरनेट खंगालने के लिए बढ़ावा दिया जाता है, लेकिन इसके सबसे बड़े प्लैटफॉर्म्स को इग्नोर करने को कहा जाता है.
किसी 'क्लीन बैन' (पूरी तरह पाबंदी) के लिए ये लकीरें बहुत धुंधली हैं. क्या यूट्यूब एजुकेशन है या एंटरटेनमेंट? क्या व्हाट्सएप कम्युनिकेशन है या सोशल मीडिया? गेमिंग कहां खत्म होती है और नेटवर्किंग कहां शुरू होती है? एक एकमुश्त पाबंदी से इस गहराई से जुड़े हुए इकोसिस्टम को बहुत ज्यादा 'ओवरसिम्प्लीफाई' करने का खतरा है.
दुनिया क्या कर रही है कोशिश: दुनिया भर की सरकारें इसी दुविधा से जूझ रही हैं. ऑस्ट्रेलिया 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर बैन लगाने की तरफ बढ़ रहा है, जिसे लागू करने की जिम्मेदारी प्लैटफॉर्म्स की होगी. नीदरलैंड्स ने स्कूलों में स्मार्टफोन्स पर बैन लगा दिया है, जिसके बाद वहां बच्चों के फोकस और पढ़ाई के नतीजों में सुधार दर्ज किया गया है. अब वहां इन पाबंदियों को क्लासरूम के बाहर भी लागू करने पर चर्चा चल रही है. दूसरे देश भी एल्गोरिदम और कंटेंट पर कंट्रोल सख्त कर रहे हैं, क्योंकि वे समझ गए हैं कि समस्या सिर्फ एक्सेस में नहीं, बल्कि 'डिजाइन' में है. इशारा साफ है: प्लैटफॉर्म्स के 'सेल्फ-रेगुलेशन' पर निर्भरता कम होगी, और सरकारी दखल ज्यादा होगा.

