भारतीय जूलरी खरीदने वालों की पसंद अब बदल रही है और दुर्लभ रत्न (Gemstones) उनकी नई पसंद बन गए हैं. अब कम ही लोग माणिक यानी रूबी के रंग की गहराई या पन्ना की पारदर्शिता पर मोलभाव करते हैं.
इसकी जगह अब पैराइबा (Paraiba), त्सावोराइट (Tsavorite) और पैड्परैड्शा (Padparadscha) जैसे नाम सुनाई देते हैं. इन्हें लोग पूरे भरोसे के साथ लेते हैं मानो उन्होंने पहले अच्छी तरह जानकारी जुटा ली हो.
यह बदलाव सिर्फ बदलते फैशन का नतीजा नहीं है. भारत का रत्नों से रिश्ता हमेशा आध्यात्मिक मान्यताओं, ज्योतिष और उनके रंगों की खूबसूरती से जुड़ा रहा है. लेकिन अब यह रिश्ता नई शर्तों पर तय हो रहा है.
'बिग थ्री' की चमक फीकी पड़ रही है
सदियों तक भारत की महंगी जूलरी लाल, नीले और हरे रंग के तीन प्रमुख रत्नों- माणिक, नीलम और पन्ना के इर्द-गिर्द घूमती रही. लेकिन अब इन तीनों की पकड़ कमजोर पड़ रही है. इसकी वजह सिर्फ लोगों की पसंद बदलना नहीं है. इनकी आपूर्ति घट रही है, कीमतें लगातार बढ़ रही हैं और अच्छी गुणवत्ता वाले पत्थर मिलना मुश्किल होता जा रहा है.
हाई-एंड जूलरी ब्रांड 'देश्या बाय मा पैशन' की क्रिएटिव डायरेक्टर और जूलरी डिजाइनर रिया पोद्दार लोयलका कहती हैं, "इन तीनों प्रमुख रत्नों की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं और अच्छी गुणवत्ता वाले पत्थर अब पहले से ज्यादा दुर्लभ और जुटाना कठिन हो गए हैं. बाजार में नए विकल्प आ रहे हैं. ये नए पत्थर अपने साथ अलग कहानियां और नए रंगों के शेड लेकर लग्जरी बाजार में जगह बना रहे हैं."
नीले रंग के लिए अब टैंज़नाइट (Tanzanite) और आयोलाइट (Iolite) का इस्तेमाल बढ़ रहा है. हरे रंग में त्सावोराइट (Tsavorite) और ग्रीन टूरमलीन (Green Tourmaline) जगह बना रहे हैं. वहीं लाल रंग में स्पिनेल (Spinel) और रुबेलाइट (Rubellite) की मांग बढ़ रही है. यानी रत्नों की दुनिया की शब्दावली भी बदल रही है और 'कीमती' की परिभाषा भी.
इस समय के सबसे पसंदीदा रत्न
अगर कोई एक रत्न भारतीय जूलरी के भविष्य की दिशा दिखाता है तो वह पैराइबा टूरमलीन है. यह दुनिया में सिर्फ कुछ ही जगहों पर मिलता है. इसकी चमकदार नियॉन-नीली आभा प्रकृति में किसी और पत्थर जैसी नहीं होती.
लोयलका कहती हैं, "पैराइबा टूरमलीन आज दुनिया के सबसे लोकप्रिय रत्नों में से एक है. इसकी वजह इसकी नियॉन-नीली चमक है. भारतीय ग्राहकों को हमेशा से नीला रंग पसंद रहा है. इसलिए जो लोग अलग पहचान बनाने वाला जूलरी पीस चाहते हैं वे इन दुर्लभ टूरमलीन को चुन रहे हैं. यह निवेश के लिहाज से भी अच्छा विकल्प है."
इस बदलाव में एक दिलचस्प सांस्कृतिक पहलू भी है. भारतीय परंपरा में नीलम का ज्योतिषीय महत्व बहुत बड़ा माना जाता है. इसे शनि ग्रह का रत्न माना जाता है और बिना उचित सलाह के पहनना जोखिम भरा समझा जाता है. वहीं टैंज़नाइट के साथ ऐसी कोई धार्मिक या ज्योतिषीय धारणा नहीं जुड़ी है. यह बिना किसी आध्यात्मिक सावधानी के गहरा नीला रंग देता है. दूसरी ओर, कई रंगों वाले सैफायर और टूरमलीन अब रत्न संग्रह करने वालों की नई पसंद बनते जा रहे हैं.
पुरानी जड़ें, नई भाषा
इस समय की सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह परंपरा को छोड़ने का नहीं बल्कि उसे नए तरीके से अपनाने का दौर है. भारत का प्राचीन नौ रत्नों वाला नवरत्न अब आधुनिक डिजाइन हाउसों में नए रूप में दिखाई दे रहा है. इसमें समान रंगों वाले दूसरे रत्नों का इस्तेमाल किया जा रहा है.
लोयलका कहती हैं, "जो ग्राहक भारत की विरासत से जुड़े रहना चाहते हैं लेकिन आधुनिक समय के साथ भी चलना चाहते हैं उन्हें इस तरह की नई व्याख्या पसंद आती है. साफ-सुथरी डिजाइन और नए सेटिंग स्टाइल के साथ पारंपरिक और आध्यात्मिक विरासत को आधुनिक लग्जरी अंदाज में पेश किया जा रहा है. इससे ऐसी नई विरासत बन रही है जो एक साथ प्राचीन भी लगती है और आधुनिक भी."
यही सोच जड़ाऊ और पोल्की जूलरी को भी बदल रही है. लाल और हरे रंग की पारंपरिक रंग-संरचना में अब धीरे-धीरे दुर्लभ रत्नों के ज्यादा आकर्षक रंग शामिल हो रहे हैं. इससे डिजाइनर पहले से ज्यादा नए और प्रयोगधर्मी डिजाइन तैयार कर रहे हैं.
भविष्य के लिए समझदारी भरा निवेश
युवा कलेक्टर अगर यह सोच रहे हैं कि उन्हें अपना पैसा कहां लगाना चाहिए तो लोयलका का जवाब साफ है. हीरों की बजाय रत्नों में निवेश करें. वे कहती हैं, "लैब में बने हीरों या लैब डायमंड के बाजार में आने के बाद कम से कम फिलहाल के लिए, हीरा उद्योग को नुकसान हुआ है. मैं निवेशकों से कहूंगी कि वे अपना पैसा रत्नों में लगाएं. इससे मिलने वाला लाभ उम्मीद से ज्यादा होगा."
साल 2026 के लिए उनकी पसंद की सूची में पैराइबा टूरमलीन, एलेक्ज़ेंड्राइट, मैंडरिन गार्नेट, स्पिनेल, बर्मी माणिक और पैड्परैड्शा नीलम शामिल हैं. ये ऐसे रत्न हैं जिनकी प्राकृतिक उपलब्धता बहुत कम है. इसलिए इनकी कीमतें आमतौर पर लगातार बढ़ती रहती हैं.
वे एक सलाह भी देती हैं. हमेशा भरोसेमंद स्रोत से प्रमाणित रत्न ही खरीदें और उनके साथ प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय प्रयोगशालाओं के दस्तावेज जरूर लें. लोयलका कहती हैं, "सर्टिफिकेट सुरक्षा और भविष्य में दोबारा बेचने, दोनों के लिए बेहद महत्वपूर्ण होते हैं."

