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भारत में महिलाएं नौकरी से दूर क्यों, नई रिसर्च ने तोड़ी पुरानी धारणा

अगर भारत के वर्कफोर्स में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ जाए GDP में एक ट्रिलियन डॉलर तक का इजाफा हो सकता है

भारत महिलाओं को रोजगार देने में बांग्लादेश से भी पीछे है (फाइल फोटो)
अपडेटेड 30 जून , 2026

एक नया अध्ययन उस आम धारणा को चुनौती देता है कि भारत के वर्कफोर्स में महिलाओं की संख्या इसलिए कम है क्योंकि परिवारों की रूढ़िवादी सोच उन्हें घर तक सीमित रखती है. सेंटर फॉर सोशल एंड इकोनॉमिक प्रोग्रेस (CSEP) के लिए तैयार एक वर्किंग पेपर में अर्थशास्त्री शिशिर गुप्ता और आल्ह्या सभरवाल का तर्क है कि सामाजिक मान्यताओं जितनी ही बड़ी वजह कामगारों की कमजोर मांग भी है. उनके मुताबिक, भारतीय अर्थव्यवस्था महिलाओं के लिए पर्याप्त उपयुक्त नौकरियां ही नहीं पैदा कर रही है.
 
महिला श्रम बल भागीदारी दर यानी कामकाजी उम्र की उन महिलाओं का अनुपात, जो नौकरी कर रही हैं या नौकरी की तलाश में हैं, भारत में 35 प्रतिशत है. यह वैश्विक औसत 59 प्रतिशत से काफी कम है. साथ ही फिलीपींस (50 प्रतिशत) और भारत के अपेक्षाकृत गरीब पड़ोसी बांग्लादेश (42 प्रतिशत) से भी कम है. अध्ययन के लेखकों का अनुमान है कि अगर भारत विकसित देशों के स्तर तक पहुंच जाए तो करीब 9 करोड़ महिलाएं कार्यबल में जुड़ सकती हैं. इससे भारतीय अर्थव्यवस्था में 1.4 ट्रिलियन डॉलर तक का इजाफा हो सकता है.
 
अब तक के ज्यादातर शोध इसके लिए पितृसत्तात्मक सामाजिक मान्यताओं को जिम्मेदार ठहराते रहे हैं. गुप्ता और सभरवाल इससे इनकार नहीं करते. लेकिन उन्होंने श्रम बल भागीदारी को प्रभावित करने वाले आर्थिक कारकों का अलग-अलग विश्लेषण किया और भारत की तुलना समान आय वाले देशों से की. उनका सबसे अहम निष्कर्ष यह है कि अगर भारत भी बांग्लादेश की तरह श्रम-प्रधान क्षेत्रों में उतनी ही नौकरियां पैदा करे तो महिलाओं की श्रम बल भागीदारी 13 प्रतिशत बढ़ सकती है. यह सिर्फ सामाजिक सोच में बांग्लादेश जैसी स्थिति हासिल करने से मिलने वाले संभावित लाभ से तीन गुना से भी अधिक है.
 
गुप्ता कहते हैं, "इस अध्ययन का मुख्य निष्कर्ष यह है कि महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए डिमांड से जुड़े बड़े सुधार जरूरी हैं. जैसे सख्त श्रम कानूनों से पैदा होने वाली बाधाओं को कम करना, टैरिफ और घरेलू प्रोत्साहन के जरिए श्रम-प्रधान क्षेत्रों का विस्तार करना, और स्वास्थ्य व शिक्षा में निवेश बढ़ाकर मानव विकास को मजबूत करना. इससे अधिक रोजगार पैदा होंगे, श्रम-प्रधान उद्योगों का विस्तार होगा और महिलाओं की श्रम बल भागीदारी बढ़ेगी. इसके साथ सामाजिक मान्यताओं में भी सकारात्मक बदलाव आएगा और महिला श्रम बल भागीदारी दर (LFPR) और बढ़ेगी."
 
उनकी दलील सीधी है. भारत में ज्यादातर रोजगार असंगठित क्षेत्र और कम वेतन वाले हैं. ऐसे में नई नौकरियां पैदा किए बिना सिर्फ ज्यादा महिलाओं को नौकरी तलाशने के लिए प्रेरित करने से मजदूरी पर दबाव पड़ेगा. उनके मुताबिक, असली बदलाव के लिए ज्यादा इच्छुक कामगार नहीं, बल्कि ज्यादा नौकरियों की जरूरत है.
 
यह अध्ययन एक पुराने सवाल का जवाब भी देने की कोशिश करता है. भारत में महिलाओं की श्रम बल भागीदारी 2004-05 में 37 प्रतिशत से घटकर 2017-18 में 21 प्रतिशत रह गई थी. इसके बाद 2023-24 में यह फिर बढ़कर 34 प्रतिशत हो गई. लेखकों के अनुसार, शुरुआती गिरावट की मुख्य वजह यह थी कि ज्यादा लड़कियां स्कूल जाने लगीं. साथ ही ग्रामीण इलाकों में आय बढ़ने से परिवारों ने महिलाओं को खेती के काम से बाहर निकालना शुरू किया. यानी यह श्रमिक आपूर्ति में बदलाव था, न कि रोजगार की मांग में गिरावट. 

वहीं बाद में आई बढ़ोतरी उतनी सकारात्मक नहीं है. इसकी बड़ी वजह कम वेतन वाली खेती और स्वरोजगार रही. इसी दौरान खेती की उत्पादकता घटी और स्वरोजगार से होने वाली आय में 32 प्रतिशत की कमी आई. यह अवसर बढ़ने के बजाय आर्थिक संकट का संकेत भी हो सकता है.
 
राज्यों के बीच भी बड़ा अंतर है. हिमाचल प्रदेश में महिलाओं की श्रम बल भागीदारी 60 प्रतिशत है, जबकि बिहार में यह सिर्फ 27 प्रतिशत है. लेखकों के मुताबिक, इसकी वजह स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन और सामाजिक मान्यताओं में अंतर है.
 
लेखकों का सुझाव पूरी तरह आर्थिक सुधारों पर आधारित है. कंपनियों के लिए श्रम कानून आसान बनाए जाएं. कपड़ा उद्योग जैसे श्रम-प्रधान क्षेत्रों को नुकसान पहुंचाने वाले टैरिफ कम किए जाएं. व्यापार समझौते किए जाएं. स्वास्थ्य और शिक्षा पर खर्च बढ़ाया जाए क्योंकि इन क्षेत्रों में बड़ी संख्या में महिलाओं को रोजगार मिलता है. उनका मानना है कि अगर ऐसा किया गया तो ज्यादा नौकरियां पैदा होंगी. इससे अधिक महिलाएं कार्यबल में आएंगी और समय के साथ वही सामाजिक मान्यताएं भी कमजोर पड़ेंगी जो आज उन्हें पीछे रोकती हैं.
 
गुप्ता कहते हैं, "महिलाओं की श्रम बल भागीदारी बढ़ाकर भारत के पास अपने जीडीपी में 700 अरब डॉलर से 1.4 ट्रिलियन डॉलर तक जोड़ने का यह सबसे बड़ा अवसर है. नीतिगत और संरचनात्मक सुधारों के जरिए भारत अपनी विकास यात्रा को अधिक श्रम-प्रधान बना सकता है और विकसित भारत बनने के अपने लक्ष्य के और करीब पहुंच सकता है."

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