27 जनवरी की सुबह नई दिल्ली में हैदराबाद हाउस के अंदर का माहौल साफ तौर पर ऐतिहासिक और गर्मजोशी भरा था. लगभग 18 साल तक बातचीतों के टूटते-बिगड़ते-अटकते दौर के बाद, भारत और यूरोपीय संघ (EU) ने आखिरकार उस डील को अमली जामा पहना दिया जिसे अधिकारी 'मदर ऑफ ऑल डील्स' कह रहे हैं.
इस घोषणा पर बातचीत करने वालों ने खूब तालियां बजाईं, जिन्होंने पिछले तीन सालों का अधिकतर समय भारत के इतिहास में सबसे मुश्किल व्यापार समझौतों में से एक को अंतिम रूप देने में बिताया था. नई दिल्ली आने से पहले, यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला गर्ट्रूड वॉन डेर लेयेन ने दावोस में इस संधि को 'मदर ऑफ ऑल डील्स' कहकर उत्साह बढ़ा दिया था. नई दिल्ली में, वे यूरोपियन काउंसिल के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी कैबिनेट के मुख्य सहयोगियों और अधिकारियों के संग फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) पर हस्ताक्षर की गवाह बनीं.
भारत-EU करार ऐसा समय हुआ है जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मातहती में अमेरिकी व्यापार नीति बहुत ज़्यादा संरक्षणवादी हो गई है, जिससे टैरिफ की धमकियां और व्यापार की ढांचागत बाधाएं फिर से उभरने लगी हैं, और निर्यात पर निर्भर अर्थव्यवस्थाओं की परेशानी बढ़ गई है. इस बीच, EU और अमेरिका के बीच प्रस्तावित व्यापार व्यवस्था पर बातचीत टैरिफ लेवल पर असहमति और भू-राजनीतिक तनाव के कारण रुक गई है. इसके बारे में ट्रांसअटलांटिक बातचीत के आगे के दौर के लिए 2025 में सोचा गया था. यूरोपीय नेताओं ने खुले तौर पर संकेत दिया है कि जब तक तनाव बना रहेगा, ऐसे समझौते की दिशा में नहीं बढ़ा जा सकता.
भारत-EU समझौते पर तीखी प्रतिक्रिया करते हुए अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कहा कि यूरोप "अपने ही खिलाफ युद्ध को फाइनेंस कर रहा है"- उनका इशारा यूक्रेन संघर्ष की ओर था.
जहां तक भारत की बात है तो उसके लिए EU समझौता महज एक और FTA नहीं है, बल्कि यह एक इरादे की अभिव्यक्ति है, जो यह बताती है कि व्यापार के लिहाज से दुनिया के सबसे मुश्किल क्षेत्र में नई दिल्ली ने एक भरोसेमंद और मजबूत खिलाड़ी के तौर पर कदम रखे हैं. इस समझौते से भारत को ऐसे समय ताकत मिली है जब उसके वार्ताकार ट्रंप के ट्रेड अधिकारियों के साथ बातचीत जारी रखे हुए हैं.
महज आंकड़ों से ही इसकी विशालता का पता चल जाता है. EU भारत का सबसे बड़ा व्यापार साझेदार है, जहां उसके वैश्विक कारोबार का 14 फीसदी से ज्यादा होता है. 2024 में, दोनों देशों के बीच वस्तुओं का कारोबार लगभग 120 अरब यूरो था, इसके अलावा सेवाओं का व्यापार 60 अरब यूरो का था. FTA के तहत, दोनों पक्षों के बीच ट्रेड वाले लगभग सभी सामान पर टैरिफ खत्म या बहुत कम कर दिए जाएंगे: यूरोप में भारत के 99 फीसदी निर्यात पर और भारत आने वाली यूरोपीय वस्तुओं के 96.6 फीसदी हिस्से पर न के बराबर या कोई शुल्क नहीं लगेगा.
EU को इसके फायदे तुरंत मिलेंगे और कम टैरिफ से सालाना लगभग 4 अरब यूरो की बचत होगी. भारत को फायदा यह है कि उसकी 45 करोड़ अमीर ग्राहकों के बाजार तक पहुंच होगी और नियम-आधारित, उच्च-मानकों वाले आर्थिक ब्लॉक से जुड़ने से साख बढ़ेगी.
यह भारत का अब तक का सबसे महत्त्वाकांक्षी व्यापार समझौता भी है. टैरिफ के अलावा, इसमें 23 चैप्टर शामिल हैं जिनमें डिजिटल व्यापार, डेटा सुरक्षा, सस्टेनेबिलिटी, श्रम मानक और यहां तक कि रक्षा उद्योग में सहयोग तक को रखा गया है. पहले के मुक्त व्यापार समझौतों के विपरीत, इसमें बाजार पहुंच के साथ-साथ रेगुलेटरी तालमेल को भी शामिल किया गया है. केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने इसे ऐसा "परिवर्तनकारी समझौता" बताया जो अगले दशक की भारत की व्यापार रणनीति को नए आयाम देगा. ब्रसेल्स में अधिकारियों ने भी इसी भावना को दोहराया, और इसे जापान के साथ अपने समझौते के बाद एशिया में यूरोप की सबसे महत्त्वपूर्ण व्यापार साझेदारी बताया.
भारत के लिए यह समझौता पूरे यूरोप में व्यापार कूटनीति की एक असाधारण सफलता है. इससे पहले, पिछले साल जुलाई में नई दिल्ली ने यूनाइटेड किंगडम (UK) के साथ लंबे समय से प्रतीक्षित व्यापार समझौते को अंजाम दिया गया था, जिससे भारतीय निर्यातकों को ब्रिटिश बाजार के 98 फीसदी हिस्से तक ड्यूटी-फ्री पहुंच मिली और कपड़ा, चमड़ा और प्रोसेस्ड फूड के लिए अवसर खुले.
इसके बाद EFTA (यूरोपियन फ्री ट्रेड एसोसिएशन) ब्लॉक के साथ ट्रेड ऐंड इकोनॉमिक पार्टनरशिप एग्रीमेंट (TEPA) लागू किया गया, जिसमें स्विट्जरलैंड, नॉर्वे, आइसलैंड और लिकटन्स्टाइन शामिल हैं. EFTA संधि में 100 अरब डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धता के साथ-साथ अगले 15 साल में भारत में दस लाख तक नौकरियां पैदा करने का वादा शामिल है.
कुल मिलाकर, ये तीनों समझौते- UK FTA, EFTA के साथ TEPA, और अब EU करार- भारत के लिए एक निर्बाध यूरोपीय आर्थिक गलियारा बनाते हैं, जो इसके निर्यातकों और निवेशकों को लंदन से जिनेवा से ब्रसेल्स तक हर बड़े बाजार से जोड़ता है.
वाणिज्य मंत्रालय के अधिकारी इसे "भारत का यूरोपीय दशक" कहते हैं. यह दृष्टिकोण सोच-समझकर अपनाया गया है. चीन की अगुआई में क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी (आरसेप) से भारत पहले ही बाहर हो चुका है. और अब अमेरिका के साथ व्यापार सहमति बनने में हो रही देरी के कारण, भारत ने निर्णायक रूप से यूरोप की ओर रुख किया है जो स्थिर और नियम-आधारित बाजार है. भू-राजनीतिक दलीलें साफ हैं. जब पश्चिमी देश चीन से जुड़े जोखिम कम करने की कोशिश कर रहे हैं, तो भारत खुद को भरोसेमंद और इनोवेशन पार्टनर के रूप में स्थापित करना चाहता है. यूरोपीय नीति निर्माता, बदले में, भारत को एक ऐसे लोकतांत्रिक इंजन के रूप में देख रहे हैं जो एशियाई आपूर्ति श्रृंखलाओं में चीन के दबदबे को संतुलित कर सकता है.
भारतीय उद्योग जगत के लिए इस समझौते से बहुत सारे मौके निकलते हैं. कपड़ा और परिधान पर यूरोपीय बाजारों में 10-12 फीसदी टैरिफ लगता था, लेकिन अब वे बिना शुल्क वहां पहुंच सकेंगे, और भारतीय निर्यातक बांग्लादेश और वियतनाम के साथ सीधे मुकाबला कर पाएंगे. गुजरात और महाराष्ट्र में लाखों लोगों को रोजगार देने वाला रत्न और आभूषण उद्योग बिना शुल्क वहां अपनी चमक बिखेर सकेगा जबकि केमिकल और फार्मास्युटिकल कंपनियां हाई-वैल्यू वाले रेगुलेटेड बाजारों में आसानी से पहुंचने की उम्मीद कर सकती हैं. समुद्री उत्पाद और चमड़े के सामान के निर्यातकों को टैरिफ बाधाएं घटने से ऑर्डर बढ़ने की उम्मीद है. अगर सब कुछ योजना के मुताबिक होता है, तो अधिकारियों को उम्मीद है कि भारत का मैन्युफैक्चरिंग निर्यात तीन साल के अंदर 500 अरब डॉलर को पार कर जाएगा, यह ऐसा लक्ष्य था जो कभी मुश्किल लगता था लेकिन अब व्यवहारिक हो चुका है.
फिर भी, हर बड़ी समझौते में कुछ मुश्किल फैसले भी होते हैं. भारत के जिस वाहन उद्योग को लंबे समय तक 110 फीसदी तक के टैरिफ के जरिए सुरक्षा मिली हुई थी, उसे अब यूरोपीय प्रतिस्पर्धा का सीधे सामना करना पड़ेगा क्योंकि वाहनों पर आयात शुल्क सात साल में घटाकर 10 फीसदी तक लाया जाएगा. उम्मीद है कि जर्मनी और इटली के मैन्युफैक्चरर ऑटोमोटिव प्रीमियम सेगमेंट पर कब्जा करने के लिए तेजी से आगे बढ़ेंगे.
भारत सरकार का कहना है कि यह बदलाव धीरे-धीरे होगा, और घरेलू कंपनियों को एडजस्ट करने का समय मिलेगा, लेकिन चुनौती असली है. शराब और स्पिरिट पर टैरिफ भी 150 फीसदी से घटकर लगभग 40-50 फीसदी रह जाएंगे, इससे यूरोप के ब्रांडों के लिए देश का बाजार खुल जाएगा तो स्थानीय उत्पादकों की मुश्किलें भी बढ़ेंगी. कृषि निर्यातकों को क्वालिटी पर यूरोप के सख्त मानकों को पूरा करना होगा. इस कारण अनुपालन की लागत बढ़ने से छोटी कंपनियों के लिए और मुश्किलें हो सकती हैं. फार्मास्युटिकल उद्योग, हालांकि EU की सबसे सख्त मांगों से काफी हद तक बचा हुआ है, लेकिन उसे बौद्धिक संपदा के सख्त नियमों का पालन करना होगा, लिहाजा कुछ जेनेरिक दवाओं को बाजार में उतारने में समय लग सकता है.
करार के फायदे-नुकसान साफ हैं, फिर भी इसकी दिशा तय है. सालों तक, वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ भारत का जुड़ाव सतर्कता से होता था, जिसमें संरक्षणवाद को समझदारी माना जाता था. अब यह बदल रहा है. 2023 में EU के जनरलाइज़्ड सिस्टम ऑफ प्रेफरेंसेज (GSP) को निलंबित करने से भारत के पुराने रुख की सीमाएं पहले ही उजागर हो गई थीं, जिससे लगभग 87 फीसदी भारतीय निर्यात को मिले टैरिफ फायदे खत्म हो गए थे. सरकार ने माना कि वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा के लिए, बाजारों तक भारत की पहुंच जरूरी है, न कि टैरिफ की दीवारों की. UK और EFTA के साथ-साथ EU के साथ हुआ यह समझौता बताता है कि नई दिल्ली अब हिचकिचाहट नहीं, बल्कि महत्त्वाकांक्षा के संग बातचीत कर रही है.
हालांकि इस पूरी प्रक्रिया को जमीन पर उतरने में वक्त लगेगा, इसके लिए यूरोपीय संसद और EU के सभी 27 सदस्य देशों की मंजूरी की जरूरत होगी. इसके बाद भारत की संसद और कैबिनेट की मुहर आवश्यक होगी. लेकिन दोनों तरफ राजनीतिक सहमति मजबूत है. दोनों राजधानियों में, इस समझौते को एक रणनीतिक साझेदारी के तौर पर देखा जा रहा है. जैसा कि विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, "यह महज व्यापार नहीं है; यह भरोसा है."
भारत की यूरोपीय पहुंच का कुल असर पहले ही दिख रहा है. EU, UK और EFTA को मिला दें तो वहां अब भारत के कुल निर्यात का लगभग एक चौथाई हिस्सा जाता है. भारत और यूरोप के बीच सामान, सेवाओं और निवेश का कुल प्रवाह इस दशक के आखिर तक सालाना 250 अरब डॉलर पार कर सकता है. इससे भी जरूरी बात यह कि ये समझौते टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, स्वच्छ ऊर्जा सहयोग और कौशल गतिशीलता के नए रास्ते खोलते हैं - ये ऐसे क्षेत्र हैं जो भारत की अर्थव्यवस्था को कुशल, स्वच्छ और हरित बनाने की घरेलू प्राथमिकताओं के साथ मेल खाते हैं.
आखिरकार, यह करार बाजार पहुंच के साथ-साथ सोच से भी जुड़ा है. यह भारत के रक्षा उदारीकरण से सामरिक जुड़ाव की ओर, महत्वाकांक्षा की ओर बदलाव का संकेत देता है. इससे जाहिर होता है कि एक देश दुनिया के सबसे ऊंचे वैश्विक मानकों के साथ मुकाबला करने, नियमों के पालन और सहयोग के लिए तैयार है.
इसका असर महसूस होगा और फायदे मिलने में समय लगेगा. फिर भी, जब 27 जनवरी को नई दिल्ली के उस शानदार हॉल में तालियों की गूंज थमी, तो इसमें कोई शक नहीं था कि कुछ बुनियादी बदलाव हुआ है. एक पीढ़ी में पहली बार, भारत ने सिर्फ एक व्यापार संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए थे बल्कि उसने दुनिया के साथ अपने जुड़ाव की शर्तों को फिर से लिखा था.

