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लैब-ग्रोन डायमंड को 'हीरा' कहने पर रोक; क्या इतने से प्राकृतिक हीरे की चमक लौट आएगी?

भारत सरकार के नए BIS नियम के मुताबिक, 'हीरा' या 'डायमंड' शब्द का इस्तेमाल सिर्फ प्राकृतिक हीरे के लिए ही किया जा सकता है

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर
अपडेटेड 27 जनवरी , 2026

भारत सरकार ने हीरों को लेकर एक नया और महत्वपूर्ण फैसला लिया है. भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) के नए मानक के मुताबिक, "हीरा" या "डायमंड" शब्द का इस्तेमाल केवल प्राकृतिक (खनन से प्राप्त) हीरे के लिए ही किया जा सकता है.

लैब में बनाए गए हीरों को अब "प्रयोगशाला में उगाया गया हीरा" या "प्रयोगशाला में निर्मित हीरा" ही कहा जाएगा. संक्षिप्त रूप में लैब ग्रोन डायमंड यानी LGD कहने पर भी रोक है. यह फैसला ग्राहकों को स्पष्ट जानकारी देने और बाजार में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए लिया गया है.

इससे प्राकृतिक हीरों को लैब-ग्रोन हीरों से अलग पहचान मिलेगी और उनकी बाजार हिस्सेदारी मजबूत होने की संभावना बढ़ेगी. BIS ने यह मानक ISO 18323 के संशोधित रूप में अपनाया है, जो हीरों की शब्दावली और उपभोक्ता विश्वास पर आधारित है. नया मानक प्रयोगशाला में बनाए गए हीरों के लिए "प्रकृति का", "शुद्ध", "पर्यावरण के अनुकूल" जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर बेचने पर रोक लगाता है.

उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्रालय के अंदर आने वाला BIS एक भारत का राष्ट्रीय मानक निकाय (National Standards Body) है. इसका मुख्य काम विभिन्न उत्पादों के लिए भारतीय मानक तैयार करना और उसकी पहचान के लिए एक मार्किंग या चिह्न तैयार करना है.

BIS सोने, चांदी जैसे कीमती धातुओं के लिए हॉलमार्किंग नियम तय करता है. हीरे के लिए भी यह शब्दावली और लेबलिंग जैसे नियम जारी करता है. BIS के अधिकांश मानक स्वैच्छिक होते हैं, लेकिन ज्वैलरी उद्योग में इन्हें व्यापक रूप से अपनाया जाता है.

इतना ही नहीं इसके नियमों का संदर्भ अदालतों में दिया जाता है. इसी वजह से इस संस्था के बनाए गए नियम बेहद अहम होते हैं. इसके कारण खुदरा बिक्री, विज्ञापन और निर्यात संबंधी दस्तावेजों में आभूषणों के लिए एक स्पष्ट मानक माना जाता है.

स्थानीय रूप से उत्पादित हीरे यानी LGD के कारण खनन किए गए हीरों की बाजार हिस्सेदारी लगातार कम हो रही थी. ऐसे में माना जा रहा है कि हीरे के नाम को लेकर बाजार के अस्पष्टता को दूर करने के लिए सरकार को ये कदम उठाना पड़ा है. सरकार चाहती है कि 'हीरा' शब्द बोलचाल में भी केवल प्राकृतिक पत्थरों के लिए इस्तेमाल हो.

2025 में जेमोलॉजिकल इंस्टीट्यूट ऑफ अमेरिका (GIA) ने प्रयोगशाला में उत्पादित हीरों के लिए पारंपरिक 4C ग्रेडिंग रिपोर्ट जारी करना बंद कर दिया. इसके बजाय लैब ग्रोन डायमंड के लिए एक तरह का सर्टिफिकेट जारी किया जाने लगा, जिससे प्राकृतिक हीरा और लैब में बनाए गए हीरे के बीच स्पष्ट फर्क पता चले.

इससे एक बात तो साफ हो गई थी कि प्रयोगशाला में उत्पादित हीरे, अब प्राकृतिक हीरों की तरह महंगे आभूषण के विकल्प नहीं हैं. कुछ यूरोपीय बाजारों में प्रयोगशाला में उत्पादित हीरों को अलग से वर्गीकृत किया जाता है. इन हीरों के रिपोर्ट में उनकी तकनीकी उत्पत्ति पर विशेष जोर दिया जाता है.

नेचुरल डायमंड काउंसिल की प्रबंध निदेशक ऋचा सिंह कहती हैं, “इससे ग्राहकों को स्पष्टता मिलेगी. जब कोई हीरा खरीदता है, तो उसे यह जानने का पूरा अधिकार है कि वह वास्तव में क्या है. बेचने वालों को स्पष्ट और ईमानदारी से इसकी जानकारी देनी चाहिए.”

भारत विश्व में लगभग 90 फीसद हीरों का प्रसंस्करण और निर्यात करता है. ऐसे में यह फैसला भारत के लिए सिर्फ शब्दों का खेल नहीं है. इसका असर निर्यात अनुबंधों और ई-कॉमर्स लिस्टिंग पर भी पड़ेगा. आभूषण उद्योग का मानना ​​है कि लेबलिंग एक कारण है, जिससे उपभोक्ता सस्ते किस्म के LGD खरीदने के लिए गुमराह हो सकते हैं.

प्राकृतिक हीरों की कीमतों में कोविड के दौरान काफी तेजी आई थी. उसके बाद से अब तक कीमत में लगभग एक चौथाई से एक तिहाई तक की गिरावट आई है. पिछले छह महीनों में कीमतों में कुछ स्थिरता देखी गई है, जबकि प्रयोगशाला में उत्पादित हीरों (LGD) की कीमतें अधिक आपूर्ति के कारण लगातार कमजोर होती जा रही हैं. प्रयोगशाला में उत्पादित हीरों की कीमत अक्सर प्राकृतिक हीरों की तुलना में 70 फीसद या उससे भी कम होती है.

हीरों की कीमत गिरने का मुख्य कारण मांग कमजोर होना है. यूक्रेन युद्ध के कारण अमेरिका और यूरोपीय संघ ने रूस से आयातित कच्चे हीरों पर प्रतिबंध लगा दिए, जिससे स्टॉक जमा हो गया और कीमतों में और गिरावट का खतरा पैदा हो गया. सूरत के हीरा पॉलिश करने वाले श्रमिकों पर इसका गंभीर प्रभाव पड़ा है.

गुजरात डायमंड वर्कर्स यूनियन का कहना है कि डायमंड मार्केट पिछले कुछ समय से सही नहीं चल रहा है. ऐसे में नौकरी छूटने से पैदा हुए आर्थिक तनाव के कारण लगभग 100 लोगों ने आत्महत्या कर ली है. सूरत के स्कूलों से छात्रों के अचानक ड्रॉपआउट में भी इस संकट की झलक दिखाई देती है.

2025-26 में गुजरात में स्कूल से बाहर रहने वाले बच्चों की संख्या सबसे अधिक रही, जहां 2,40,000 छात्रों ने स्कूल छोड़ दिया. सूरत में नगर निगम के 24 स्कूलों से 600 से अधिक छात्रों ने स्कूल छोड़ दिया है. नौकरियों के नुकसान के कारण हीरा कारीगर (पॉलिशर) सूरत में गुजारा करने के लिए छोटे-मोटे काम करने को मजबूर हैं, जो उनके परिवार को पालने के लिए पर्याप्त नहीं है.

उन्हें अपने बच्चों को निजी स्कूलों से निकालना पड़ रहा है. बड़े शहर के खर्चों को वहन करने में असमर्थ होने पर कारीगर सौराष्ट्र के गांवों में वापस जाकर खेतिहर मजदूर के रूप में काम करने लगते हैं. अमेरिकी टैरिफ के 50 फीसद ने इस उद्योग को भारी झटका दिया है. सूरत के निर्यात का लगभग 30 फीसद हिस्सा अमेरिका को जाता था.

पिछले छह महीनों में इस उद्योग ने अमेरिका के विकल्प के तौर पर दक्षिण और दक्षिणपूर्व एशियाई बाजारों, मध्य पूर्व में विस्तार किया है. इसके अलावा, स्थानीय खुदरा विक्रेताओं के साथ साझेदारी के माध्यम से भारत के धनी उपभोक्ताओं को लुभाने का प्रयास कर रहा है.

कम मूल्य के बावजूद LGD के कारण ही सूरत जैसे शहरों में सैकड़ों हजारों लोगो की नौकरियों चल रही हैं. इसकी वजह ये है कि प्रयोगशाला में हीरे को एक 'कच्चे' पत्थर के रूप में 'विकसित' करने के बाद, इसे गहने में फिट करने के लिए सटीक आकार और माप देने से पॉलिश करने तक के लिए कुशल कारीगर की जरूरत होती है. हालांकि, सरकार के इस फैसले से अब LGD हीरा इंडस्ट्री एक और खतरे के चपेट में है.

शब्दों और नाम में बदलाव कर प्राकृतिक हीरा उद्योग को भले ही सरकार बचाने की कोशिश कर रही है, लेकिन यह एक खुला प्रश्न है कि क्या व्यापारिक बाधाओं और अस्थिर भू-राजनीतिक स्थिति के बीच गिरती मांग को केवल नाम बदलकर ही संतुलित किया जा सकता है.

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