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क्या केंद्र सरकार ने परिसीमन पर दक्षिणी राज्यों की चिंताएं दूर करने का फॉर्मूला निकाल लिया है?

केंद्र सरकार ऐसा रास्ता निकालने की कोशिश कर रही है जिससे परिसीमन का काम भी हो जाए और दक्षिण भारतीय राज्य असंतुष्ट भी न रहें

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन परिसीमन को लेकर कई बार आशंकाएं जता चुके हैं (फाइल फोटो)
अपडेटेड 1 दिसंबर , 2025

अब जब केंद्र सरकार ने यह घोषणा कर दी है कि 2021 से टल रही जनगणना को आखिरकार मार्च, 2027 तक पूरा कर लिया जाएगा तो परिसीमन को लेकर भी केंद्र सरकार के स्तर पर अलग-अलग विकल्पों पर विचार किया जा रहा है. 

दरअसल, जब भी परिसीमन की बात उठती है कि दक्षिण भारतीय राज्यों की तरफ से यह आपत्ति आती है कि अगर इस बार भी आबादी ही सीटों के निर्धारण का आधार रही तो उन्हें नुकसान हो सकता है क्योंकि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण के मोर्चे पर काफी काम किया है.

सरकार के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों से बातचीत करने पर पता चलता है कि केंद्र सरकार इन आशंकाओं को दूर करने के लिए दो प्रमुख विकल्पों पर विचार कर रही है. इनमें पहला विकल्प यह है कि लोकसभा और विधानसभा सीटों का जो मौजूदा अनुपात है, उसे बनाए रखा जाए. वहीं केंद्र के सामने दूसरा विकल्प विधानसभा सीटों की संख्या को बढ़ाना है.

लेकिन इन विकल्पों पर विस्तार में जाने से पहले सरल भाषा में समझ लेते हैं कि आखिर परिसीमन क्या है? दरअसल यह निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं और संख्या को फिर से निर्धारित करने की कवायद है. यह पूरी प्रक्रिया जनगणना के आंकड़ों पर आधारित होती है. भारत में अब तक चार बार परिसीमन हुआ है. सबसे पहला 1952 में हुआ था. इसके बाद के तीन परिसीमन 1963, 1973 और 2002 में हुए हैं.

परिसीमन के मामले में एक महत्वपूर्ण कांसेप्ट फ्रीजिंग का भी है. दरअसल, 1970 के दशक में जब देश की जनसंख्या तेजी से बढ़ रही थी तो 1976 के 42वें संविधान संशोधन ने परिसीमन को 2000 तक स्थगित कर दिया था. ऐसा करने के पीछे सोच यह थी कि राज्य जनसंख्या नियंत्रण को लेकर अधिक तत्परता से काम कर सकें. इसके बाद जब 2002 में परिसीमन हुआ तो उस समय नए परिसीमन पर फ्रीज की अवधि को बढ़ाकर 2026 तक कर दी गई. उस वक्त यह तय किया गया था कि 2026 के बाद जनगणना के जो आंकड़े आएंगे, उसके आधार पर लोकसभा और विधानसभाओं की सीटों का परिसीमन होगा.

अब जब 2021 से टल रही जनगणना के आंकड़े 2027 में आने प्रस्तावित हैं तो नए सिरे से परिसीमन भी अनिवार्य हो गया है. संविधान के अनुच्छेद 82 और 170 के तहत यह प्रावधान किया गया है कि लोकसभा और विधानसभा सीटें आबादी के अनुपात में तय की जाएंगी. परिसीमन की जटिलताओं का समझने वाले संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि अगर नए परिसीमन में फिर से 2027 की जनगणना के आंकड़ों के आधार पर सिर्फ आबादी आधारित सीटों को तय करने का काम हुआ तो उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में लोकसभा सीटों की संख्या 100 के पार चली जाएगी. वहीं दक्षिण भारतीय राज्यों की सीटों की संख्या कम हो सकती है.

दरअसल, पांचवें राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) के अनुसार दक्षिणी राज्यों में कुल प्रजनन दर 1.7 से 1.9 के बीच है. जबकि उत्तर प्रदेश और बिहार में यह 2.4 से अधिक है. दक्षिण भारतीय राज्यों की आबादी स्थिर होने के पीछे उनके यहां दशकों से चले परिवार नियोजन अभियानों की सफलता है. लेकिन परिसीमन के फॉर्मूले में आबादी ही प्रमुख आधार होने की आशंका को देखते हुए तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने समय-समय पर अपनी आपत्ति सार्वजनिक तौर पर दर्ज कराई है. यह भी ध्यान देने वाली बात है कि नायडू की तेलगू देशम पार्टी केंद्र की सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का हिस्सा है.

दक्षिण भारतीय राज्यों की आशंकाओं के बीच केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने जून 2025 में यह आश्वासन दिया था कि दक्षिणी राज्यों की चिंताओं का समाधान किया जाएगा. हालांकि, उस समय शाह ने इस बारे में विस्तार से कुछ नहीं बताया था. अब केंद्र सरकार जिन विकल्पों पर विचार कर रही है, उन्हें देखकर यही लगता है कि शाह जो बात जून में कह रहे थे, उसे आगे बढ़ाते हुए इन विकल्पों पर विचार किया जा रहा है.

इस बारे में जानकारी रखने वाले भारत सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों से बात करने पर पता चलता है कि केंद्र सरकार के सामने विचाराधीन दोनों प्रमुख विकल्प दक्षिण भारतीय राज्यों के हितों की रक्षा पर केंद्रित हैं. इनमें पहला विकल्प यह है कि हर प्रदेश की लोकसभा और विधानसभा सीटों के मौजूदा अनुपात को बरकरार रखा जाए. अभी यह 1:6 के अनुपात में है. यानी एक लोकसभा सीट के लिए विधानसभा सीटों की संख्या औसतन छह है. इसका लाभ यह होगा कि दक्षिण भारतीय राज्यों की सीटों की संख्या कम नहीं होगी. अगर केंद्र सरकार इस रास्ते पर आगे बढ़ती है तो इसके लिए संविधान के कुछ अनुच्छेदों में संशोधन करना अनिवार्य हो जाएगा.

केंद्र सरकार के सामने दूसरा विकल्प है कि विधानसभा की सीटों की संख्या बढ़ाई जाए लेकिन राज्यसभा की सीटों की संख्या को अभी के स्तर पर ही रखा जाए. इससे राज्यसभा में राज्यों के प्रतिनिधित्व पर कोई असर नहीं पड़ेगा. केंद्र का मानना है कि ऐसा होने से राज्यों के अंदर का प्रशासन सुधरेगा क्योंकि बढ़ी हुई आबादी के अनुपात में विधानसभा सीटों की संख्या बढ़ने की वजह से जनप्रतिनिधियों की संख्या बढ़ेगी और स्थानीय मुद्दों को विधानसभाओं में ज्यादा प्रमुखता से उठाया जा सकेगा. इस विकल्प के साथ ही यह विचार भी चल रहा है कि लोकसभा सीटों में बढ़ोतरी ऐसे फॉर्मूले के तहत की जाए कि किसी भी राज्य के साथ भेदभाव न हो.

दक्षिणी राज्यों से भेदभाव की आशंकाओं के बीच परिसीमन को लेकर अलग-अलग राजनीतिक लोग और विशेषज्ञ अलग—अलग सुझाव देते रहे हैं. भारतीय राष्ट्र समिति के नेता केटी रामा राव ने कुछ समय पहले सुझाया था राज्यों का प्रतिनिधित्व उनके वित्तीय योगदान के आधार पर बढ़ाया जाना चाहिए. कुछ विशेषज्ञों का यह सुझाव भी आया था कि राज्य सभा को राजस्व सभा में बदल दिया जाए और इसके बाद केंद्र प्रायोजित योजनाओं को कम करके राज्यों के वित्तीय आवंटन का काम राजस्व सभा करे. भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर रहे सी रंगराजन ने विधानसभा की सीटों को बढ़ाने का सुझाव दिया है. हालांकि इनमें से किसी भी विकल्प को अगर केंद्र सरकार चुनती है तो उसके लिए उसे संवैधानिक बदलाव करना होगा.
 

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