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तेल के झटके ने चुपचाप बदल दी भारत की मौद्रिक नीति

RBI की मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने रेपो रेट को 5.25 प्रतिशत पर बरकरार रखा. लेकिन अब पहली बार रुपया नीति-निर्माण की परिधि से निकलकर उसके केंद्र में आ गया है

RBI की मौद्रिक नीति समिति की बैठक 5 जून को हुई थी
अपडेटेड 8 जून , 2026

जून की 5 तारीख को भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने कुछ नहीं किया और यही सबसे बड़ी खबर थी. रेपो रेट 5.25 प्रतिशत पर कायम रहा. यह लगातार तीसरी बार था जब दरों में कोई बदलाव नहीं किया गया. स्टैंडिंग डिपॉजिट फैसिलिटी (बैंकों की अतिरिक्त नकदी जमा करने की RBI की व्यवस्था) 5.00 प्रतिशत और मार्जिनल स्टैंडिंग फैसिलिटी (बैंकों को RBI से अल्पकालिक कर्ज लेने की सुविधा) 5.50 प्रतिशत पर बनी रही.

नई नीति तटस्थ रुख दिखाती है. मीडिया बयान में केंद्रीय बैंकिंग की परिचित भाषा थी- संतुलित जोखिम, आंकड़ों पर आधारित निर्णय और सतर्कता. सतह पर सब कुछ पहले जैसा दिखा. लेकिन निरंतरता का मतलब शांति नहीं होता.  RBI की मौद्रिक नीति समिति की जून समीक्षा वास्तव में विराम नहीं  बल्कि प्राथमिकताओं के पुनर्गठन जैसी थी.

सुर्खियां नहीं बदलीं लेकिन इसके पीछे RBI ने संकेत दिया कि अब वह किस चीज को मैनेज करने पर ज्यादा ध्यान दे रहा है. इस चक्र में पहली बार रुपया नीति-निर्माण की परिधि से निकलकर उसके केंद्र में आ गया है.

RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने शुरुआत में ही इसका संकेत दे दिया था. उन्होंने कहा, "हम वैश्विक अनिश्चितताओं और उनके मुद्रास्फीति (महंगाई) तथा वित्तीय स्थिरता पर पड़ने वाले प्रभावों को लेकर सतर्क हैं." अपेक्षाकृत शांत समय में यह एक सामान्य बयान लगता. लेकिन जून 2026 में यह पूरी नीति की थीसिस जैसा है. कच्चे तेल की ऊंची कीमतों, रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचे रुपए और लगातार बाहर जाते विदेशी निवेश के बीच वैश्विक परिस्थितियां अब भारतीय मौद्रिक नीति की पृष्ठभूमि नहीं रहीं. वे उसका प्रमुख आधार बन चुकी हैं.

आंकड़े जो इस ठहराव के पीछे की कहानी बताते हैं

दबाव केवल सैद्धांतिक नहीं है. फरवरी के अंत में पश्चिम एशिया में संघर्ष शुरू होने के बाद ब्रेंट क्रूड की कीमतों में 65 प्रतिशत तक उछाल आया. कीमतें एक समय लगभग 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गईं और अब भी करीब 110 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी हुई हैं. दुनिया के समुद्री तेल व्यापार का बड़ा हिस्सा जिस होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरता है. इसे लेकर चिंताएं कम नहीं हुई हैं.

भारत अपनी जरूरत का लगभग 90 प्रतिशत कच्चा तेल आयात करता है. ऐसे में तेल की कीमत में हर डॉलर की बढ़ोतरी सीधे आयात बिल पर असर डालती है. और हर बैरल का भुगतान डॉलर में किया जाता है जो खुद लगातार महंगा होता जा रहा है.

दूसरा मोर्चा रुपया है. 2026 में रुपया एशिया की प्रमुख मुद्राओं में सबसे खराब प्रदर्शन करने वाली मुद्रा रहा है. साल की शुरुआत में डॉलर के मुकाबले इसकी कीमत लगभग 90 रुपए थी जो गिरकर 96 रुपए के करीब पहुंच गई. यह लगातार नए रिकॉर्ड निचले स्तर बना रहा है. इस साल अब तक रुपया करीब 6 प्रतिशत कमजोर हुआ है. इसमें से लगभग 5 प्रतिशत गिरावट संघर्ष शुरू होने के बाद आई है.

लंबी अवधि वाले सरकारी बॉन्ड की यील्ड फिर 7 प्रतिशत के करीब पहुंच गई है. विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक शेयरों और बॉन्ड दोनों में बिकवाली कर रहे हैं और बाहर निकलते समय डॉलर खरीद रहे हैं.

RBI ने इसे चुपचाप नहीं देखा. फरवरी के अंत से उसने दखल और तरलता प्रबंधन उपायों के जरिए रुपए की अव्यवस्थित गिरावट को रोकने की कोशिश की है. इसके लिए उसे अपने विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग करना पड़ा. संघर्ष शुरू होने के बाद से विदेशी मुद्रा भंडार में लगभग 33 अरब डॉलर की कमी आई है और यह करीब 690 अरब डॉलर रह गया है.

महत्वपूर्ण बात यह है कि RBI ने कभी भी विनिमय दर के किसी विशेष स्तर की औपचारिक रक्षा नहीं की. और उससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण यह है कि उसने ब्याज दरों के जरिए इसकी रक्षा करने से भी इनकार किया. जून की समीक्षा इस रणनीति को बदलने के बजाय उसे संस्थागत रूप देती है.

मुद्रा स्थिरता हासिल करने के लिए अब पूंजी प्रवाह को प्रोत्साहन, विदेशी मुद्रा भंडार और बाजार परिचालन जैसे व्यापक उपायों का इस्तेमाल किया जा रहा है, न कि केवल नीतिगत दरों का.

मल्होत्रा ने कहा, "आज घोषित उपायों से हमें उचित और स्वस्थ पूंजी प्रवाह की उम्मीद है." उनका इशारा इस ओर था कि RBI डॉलर की उपलब्धता बढ़ाने को प्राथमिकता दे रहा है, न कि घरेलू अर्थव्यवस्था पर दबाव डालकर उसकी मांग सीमित करने को.

इस सोच के पीछे स्पष्ट तर्क है. अर्थव्यवस्था पहले से एक झटका झेल रही है. ऐसे में विकास को नुकसान पहुंचाए बिना मुद्रा को स्थिर रखना जरूरी है.

जोखिमों की नई प्राथमिकता

अप्रैल और जून के बीच जो बदलाव आया है, वह दिशा का नहीं बल्कि महत्व का है. अप्रैल की नीति अब भी पुराने घरेलू ढांचे के भीतर थी- घटती मुद्रास्फीति, स्थिर वृद्धि और भविष्य में दरों में कटौती को लेकर सतर्क आशावाद. रुपया निगरानी में था लेकिन वह नीति का मुख्य आधार नहीं था.

MPC के अनुमान इस बदलाव को स्पष्ट करते हैं. वित्त वर्ष 2026-27 के लिए विकास दर का अनुमान अप्रैल में 6.9 प्रतिशत था जिसे घटाकर 6.6 प्रतिशत कर दिया गया. मुद्रास्फीति का अनुमान अप्रैल में 4.2 प्रतिशत से बढ़ाकर 4.6 प्रतिशत किया गया था. जून में इसे फिर आधा प्रतिशत अंक बढ़ाकर लगभग 5.1 प्रतिशत कर दिया गया. सहन करने की जो ऊपरी सीमा है, यह उसके काफी करीब पहुंचने जैसा है.

इन संशोधनों को साथ पढ़ें तो एक वजह और उसके असर की श्रृंखला दिखाई देती है. तेल कीमतों को आगे बढ़ाता है, रुपया उस प्रभाव को अर्थव्यवस्था में पहुंचाता है, मुद्रास्फीति उसे ग्रहण करती है और विकास दर उसके अनुसार समायोजित होती है.

कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें सीधे आयात बिल बढ़ाती हैं. कमजोर रुपया इस प्रभाव को और बढ़ा देता है. ऊर्जा की घरेलू लागत तब बढ़ जाती है जब वह अभी परिवहन, लॉजिस्टिक्स, उर्वरक सब्सिडी और उद्योगों के कच्चे माल तक पहुंची भी नहीं होती. परिणामस्वरूप मुद्रास्फीति का प्रभाव ज्यादा तीव्र और लंबे समय तक रहने वाला हो जाता है. और महत्वपूर्ण बात यह है कि इसका कारण घरेलू मांग से ज्यादा बाहरी अस्थिरता होती है.

यही वजह है कि RBI ने दरों को स्थिर रखा है. मुद्रा पर दबाव होने पर सामान्य आर्थिक सिद्धांत कहता है कि ब्याज दरें बढ़ाई जाएं, पूंजी आकर्षित की जाए और विनिमय दर की रक्षा की जाए. इंडोनेशिया, फिलीपींस और श्रीलंका जैसे कई तेल आयातक देशों ने यही किया है. इससे बाजार में यह धारणा भी बनी कि भारत को भी आखिरकार यही रास्ता अपनाना पड़ेगा.

लेकिन इसकी कीमत भी है. कर्ज महंगा होता है, खपत कमजोर पड़ती है और वैश्विक अनिश्चितताओं से पहले से प्रभावित कारोबारी माहौल पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है. RBI ने दूसरा रास्ता चुना है- घरेलू आर्थिक गति को बचाए रखना और मुद्रा को बाहरी क्षेत्र के माध्यम से संभालना.

अब केवल मजबूती पर्याप्त नहीं

मल्होत्रा ने हमेशा की तरह भारत की संरचनात्मक ताकतों का जिक्र किया- ‘स्थिर और मजबूत’ व्यापक अर्थव्यवस्था, अच्छी पूंजी वाले बैंक और बेहतर कॉर्पोरेट बैलेंस शीट. यह भरोसा वास्तविक है.

लेकिन जून की नीति का छिपा संदेश यह है कि केवल मजबूती अब पर्याप्त नहीं है. चुनौती अब आर्थिक चक्र को प्रबंधित करने की नहीं बल्कि एक झटके को सहने की है.

इसका मतलब यह भी नहीं कि मुद्रास्फीति नियंत्रण का लक्ष्य पीछे छूट गया है. बल्कि मल्होत्रा का यह कहना कि 4 प्रतिशत का लक्ष्य अब भी ‘पवित्र’ है, इसे और मजबूत करता है. फिलहाल वहां पहुंचने रास्ता भर बदला है. 

मुद्रास्फीति अब अधिकतर आयातित है. यह घरेलू मांग से नहीं बल्कि तेल की कीमतों और विनिमय दर के जरिए आती है. इसलिए नीतिगत ब्याज दर इसका मुकाबला करने का अपेक्षाकृत कमजोर साधन बन जाती है. इससे RBI का ध्यान मुद्रा और पूंजी खाते की ओर ज्यादा केंद्रित हो जाता है.

इसलिए 5 जून की बैठक का महत्व इस बात में कम है कि RBI ने क्या किया,और इस बात में ज्यादा है कि अब उसे क्या मैनेज करना पड़ रहा है. रेपो रेट नहीं बदला. लेकिन नीति का केंद्र स्पष्ट रूप से बदल गया है.

भारत में रुपया अब केवल मौद्रिक नीति का परिणाम नहीं रह गया है. वह धीरे-धीरे उसकी सबसे महत्वपूर्ण बाधाओं में से एक बनता जा रहा है. और ऐसे दौर में, जब भू-राजनीति आर्थिक स्थिरता की शर्तें तय कर रही है, यह शांत बदलाव शायद उस दिन RBI का सबसे महत्वपूर्ण संकेत साबित हो.

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