हाल ही में नोएडा में एक दोपहर सुमी राय ने एक रेस्तरां में QR कोड स्कैन करके अपनी मासिक किटी की रकम जमा की. कुछ साल पहले तक वह अपने पर्स में नकद रखती थीं या फिर अपने पति से पैसे ट्रांसफर करने के लिए कहती थीं. अब 58 साल की राय खुद UPI का इस्तेमाल करती हैं. वे कहती हैं, "मैं आत्मनिर्भर महसूस करना चाहती थी." काफी समझाने के बाद वे अपने परिवार को अपने फोन में पेमेंट ऐप इंस्टॉल कराने के लिए राजी कर पाईं.
उनकी कहानी भारत में चुपचाप हो रहे एक बड़े बदलाव की झलक दिखाती है. 2023-24 में किए गए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-6) के अनुसार, भारत में 64.3 प्रतिशत महिलाओं ने इंटरनेट का इस्तेमाल किया है. पिछले सर्वेक्षण (2019-21) में यह आंकड़ा 33.3 प्रतिशत था. खुद अपना बैंक खाता संचालित करने वाली महिलाओं की हिस्सेदारी 78.6 प्रतिशत से बढ़कर 89 प्रतिशत हो गई है. वहीं अपना मोबाइल फोन रखने और उसका खुद इस्तेमाल करने वाली महिलाओं का अनुपात 53.9 प्रतिशत से बढ़कर 63.6 प्रतिशत हो गया है.
इन आंकड़ों को एक साथ देखें तो यह बदलाव सिर्फ तकनीक तक सीमित नहीं है. पीढ़ियों तक महिलाएं नकदी के लिफाफों, सोने के गहनों और अनौपचारिक बचत के जरिए घर का वित्तीय प्रबंधन करती थीं. अब पैसा स्मार्टफोन में रहने लगा है.
दिल्ली की 33 साल की होम कुक शिखा दत्ता-सेन का उदाहरण लें. उनका वेतन सीधे उनके बैंक खाते में आता है. हर महीने वे बिजली का बिल भरती हैं, अपने माता-पिता को पैसे भेजती हैं, बैंकिंग ऐप के जरिए खर्च का हिसाब रखती हैं और यहां तक कि म्यूचुअल फंड की SIP में भी निवेश करती हैं.
पहले घर का वित्तीय प्रबंधन मुख्य रूप से उनके पिता और बाद में उनके पति संभालते थे. आज उन्हें ठीक-ठीक पता रहता है कि उनके पास कितना पैसा है, वह कहां खर्च हो रहा है और कितनी बचत हो रही है.
यह बदलाव छोटे कारोबार चलाने वाली महिलाओं में भी दिखाई दे रहा है. ग्रेटर नोएडा की 29 वर्षीय सिलाई उद्यमी रूमी कौर कहती हैं कि डिजिटल भुगतान ने उन्हें घर और कारोबार के पैसों को अलग-अलग रखने में मदद की है. ग्राहक अब तेजी से QR कोड के जरिए भुगतान कर रहे हैं. डिजिटल रिकॉर्ड की वजह से आमदनी का हिसाब रखना आसान हो गया है और छोटे कर्ज के लिए पात्रता साबित करना भी. जो पैसा पहले दराज में नकद रखा रहता था, वह अब लेन-देन का रिकॉर्ड बन गया है.
विशेषज्ञों का कहना है कि यह अंतर अहम है. विश्व बैंक की प्रमुख अर्थशास्त्री लियोरा क्लैपर कई बार कह चुकी हैं कि वित्तीय समावेशन का मतलब सिर्फ बैंक खाते खुलवाना नहीं है. इसका मतलब महिलाओं को अपने पैसे पर ‘ज्यादा निजता, सुरक्षा और नियंत्रण’ देना है. उनका कहना है कि जब महिलाओं को वित्तीय सेवाओं तक पहुंच मिलती है तो उनके बचत करने, नए अवसरों में निवेश करने और अपने बच्चों की शिक्षा पर खर्च करने की संभावना बढ़ जाती है.
यह बदलाव घरों के भीतर शक्ति संतुलन को भी बदल रहा है. परंपरागत रूप से कई महिलाएं रोजमर्रा के खर्च का प्रबंधन करती थीं लेकिन बैंकिंग, कर्ज और निवेश जैसी औपचारिक वित्तीय व्यवस्था से बाहर रहती थीं. स्मार्टफोन इस दूरी को कम कर रहे हैं. दत्ता-सेन कहती हैं, "मेरे पति इसका समर्थन करते हैं. मेरी स्वतंत्रता उनका बोझ कम करती है, उनसे कुछ छीनती नहीं है."
फिर भी यह बदलाव अभी अधूरा है. डिजिटल पहुंच तेजी से बढ़ी है, लेकिन उसका इस्तेमाल अभी भी स्वामित्व की तुलना में पीछे है. उद्योग जगत के लोगों का कहना है कि डिजिटल भुगतान करने वालों में महिलाओं की हिस्सेदारी अब भी कम है. पिछले साल नेशनल पेमेंट कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) में रिलेशनशिप मैनेजमेंट एंड की इनिशिएटिव्स के प्रमुख नलिन बंसल ने कहा था कि भुगतान करने वाले उपयोगकर्ताओं में केवल लगभग एक-चौथाई महिलाएं हैं. इससे वित्तीय पहुंच और उसके सक्रिय इस्तेमाल के बीच का अंतर सामने आता है.
संभव है कि अगला बड़ा पड़ाव यही हो. फिलहाल NFHS-6 के आंकड़े बताते हैं कि भारत ने महिलाओं को डिजिटल रूप से वित्तीय व्यवस्था से जोड़ने की पहली चुनौती काफी हद तक पार कर ली है. अब चुनौती इस जुड़ाव को भरोसे और नियमित इस्तेमाल में बदलने की है.

