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बांग्ला भाषा को कैसे मिला 'क्लासिक' का दर्जा, क्या होती है इसकी प्रक्रिया?

किसी भाषा को क्लासिक का दर्जा हासिल करने के लिए अन्य शर्तों में सबसे प्रमुख यह है कि वह कम से कम 1500-2000 साल पुरानी होनी चाहिए. शोधकर्ताओं के मुताबिक, बांग्ला 2600 साल पुरानी भाषा है

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर
अपडेटेड 9 अक्टूबर , 2024

अक्टूबर की तीन तारीख को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने पांच नई भाषाओं को "क्लासिक" का दर्जा दिया. ये हैं - पाली, प्राकृत, असमिया, मराठी और बंगाली. इनसे पहले कुछ और भाषाओं को भी यह दर्जा मिल चुका है जिनमें तमिल, संस्कृत, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम और ओडिया शामिल हैं.

तमिल वह पहली भारतीय भाषा थी जिसे 12 अक्टूबर 2004 को क्लासिक या शास्त्रीय का दर्जा हासिल हुआ. उसे यह टैग अपनी प्राचीनता और समृद्ध साहित्यिक परंपरा की वजह से मिला. इसके अलावा संस्कृत को भी उसी साल 25 नवंबर को शास्त्रीय भाषा घोषित किया गया.

इसके बाद तेलुगु (2008), कन्नड़ (2008), मलयालम (2013) और ओडिया (2014) को भी यह दर्जा दिया गया. दरअसल, कई राज्यों की मांग के बाद कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए-1 सरकार ने भारतीय भाषाओं की एक नई श्रेणी बनाने का फैसला लिया था. इसके तहत आने वाली भाषाओं को क्लासिक का दर्जा दिया जाना था. इसके लिए कई मानदंड तय किए गए.

जैसे, इसके शुरुआती ग्रंथ या लिखित इतिहास प्राचीन होने चाहिए. साफ तौर पर कहें तो यह एक हजार साल से भी अधिक पुराने होने चाहिए. इसके अलावा क्लासिक दर्जा प्राप्त भाषा के पास उन प्राचीन साहित्य/ग्रंथों का संग्रह होना चाहिए, जिन्हें विद्वानों की पीढ़ियां एक मूल्यवान विरासत मानती है; और साथ ही एक मौलिक साहित्यिक परंपरा भी हो, जो किसी अन्य भाषी समुदाय से उधार नहीं ली गई हो.

तमिल को क्लासिक के रूप में अधिसूचित करने के बाद नवंबर 2004 में संस्कृति मंत्रालय ने एक भाषा विशेषज्ञ समिति (LEC) का गठन किया था. साहित्य अकादमी के तहत गठित इस समिति का मुख्य काम था - क्लासिक के दर्जे के लिए प्रस्तावों की जांच करना. नवंबर 2005 में इन मानदंडों में कुछ बदलाव हुए. इनमें एक प्रमुख बदलाव ये था कि भाषा में शुरुआती ग्रंथों या लिखित इतिहास की प्राचीनता को एक हजार साल के बजाय 1,500-2000 साल कर दिया गया.

बहरहाल, जो भी भाषाएं LEC के इन मानदंडों को पूरा करती हैं उन्हें क्लासिक का दर्जा दे दिया जाता है. समिति ने केंद्र सरकार से बंगाली समेत इन पांच भाषाओं को शास्त्रीय भाषा के रूप में शामिल करने की सिफारिश की थी. यह प्रस्ताव पिछले कुछ सालों से केंद्र के पास था, जिसे तीन अक्टूबर को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मंजूरी दे दी.

बांग्ला को ऐसे मिला क्लासिक का दर्जा

इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट में अर्कमय दत्ता मजूमदार लिखते हैं, "अन्य चीजों के अलावा सातवीं सदी का चाइनिज टू फ्रेंच शब्दकोष, अशोक के शिलालेख और बांग्लादेश के महास्थानगढ़ के खंडहरों में पाया जाने वाला एक दिलचस्प शब्द, ये कुछ ऐसी चीजें रहीं जिन्होंने कोलकाता में भाषा अध्ययन और शोध संस्थान (ILSR) के शोधकर्ताओं को यह निर्धारित करने में मदद की कि बंगाली भाषा या बांग्ला कम से कम 2,600 साल पुरानी है."

ILSR को पश्चिम बंगाल सरकार के शिक्षा विभाग के तहत अक्टूबर 2021 में स्थापित किया गया था. इस संस्थान द्वारा प्रस्तुत की गई विस्तृत रिपोर्टों के आधार पर ही केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय ने बंगाली को क्लासिक के रूप में मान्यता दी है.

संस्थान के कामों पर फोकस डालते हुए मजूमदार लिखते हैं कि जब ILSR के शोधकर्ताओं ने यह काम शुरू किया तो उन्होंने खुद को संभावनाओं के समुद्र में पाया. लेकिन उन्हें उम्मीद की कोई किरण नजर नहीं आ रही थी. संस्थान की निदेशक प्रोफेसर स्वाति गुहा सवालिया लहजे में पूछती हैं, "चारजापद, जो कविताओं का एक संग्रह है और जिसे आम तौर पर एक भाषा के रूप में बंगाली के अस्तित्व का सबसे पहला सबूत माना जाता है. आप उस भाषा में कविताएं कैसे लिख सकते हैं जो कम से कम कुछ सौ साल पुरानी नहीं हैं?"

रिपोर्ट के मुताबिक, कई महीनों की मुश्किल रिसर्च के बाद प्रोफेसर अमिताव दास के नेतृत्व वाली टीम को बंगाली भाषाविद् और शिक्षाविद् मुहम्मद शाहिदुल्लाह के लेखन में चाइनिज टू फ्रेंच शब्दकोश का जिक्र मिला. इसने उन्हें प्रसिद्ध बंगाली साइनो-इंडोलॉजिस्ट (चीन और भारतीय संस्कृति के अध्येता) प्रबोध चंद्र बागची की ओर निर्देशित किया. बागची ने ही 1937 और 1939 में फ्रांस की राजधानी पेरिस में इस शब्दकोश को दो भागों में पुनः प्रकाशित किया था.

बहरहाल, इस डिक्शनरी की एक कॉपी बीरभूम में रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा स्थापित विश्व-भारती विश्वविद्यालय के अभिलेखागार में मिली, जहां बागची ने तीसरे कुलपति के रूप में जिम्मेदारी संभाली थी. खोज से उत्साहित गुहा बताती हैं, "इस शब्दकोश में हमें 52 बंगाली शब्द मिले. इस तरह हमारी मातृभाषा के 52 शब्द चीनियों द्वारा अपनी भाषा में इस्तेमाल किए गए और उनका अर्थ एक ही था. जैसे इनमें से दो शब्द 'ऐसो' और 'बोइसो' हैं, जिनका बंगाली के शुद्ध रूप में मतलब है आना और बैठना."

मजूमदार लिखते हैं, "गुजरात के गिरनार पहाड़ियों में स्थित अशोक के शिलालेखों में मिश्रित अक्षर 'डॉ-बॉ' का इस्तेमाल और जिस तरह से 'बॉ' लिखा गया था, वह भी इस बात का एक अहम सबूत था कि उस समय बंगाली भाषा अस्तित्व में थी और सदियों पहले ही पूरे उपमहाद्वीप में फैल चुकी थी. गुहा के मुताबिक, यह 'बॉ' संस्कृत में इस्तेमाल किए जाने वाले 'बॉ' से अलग है और बंगाली लिपि का अपना है.

इसके अलावा, बांग्लादेश के बोगरा जिले में स्थित महास्थानगढ़ के खंडहरों से हासिल सेकंडरी डेटा में 'संगबंगिया' शब्द का जिक्र मिलता है. इसका मोटे तौर पर अनुवाद "बंगा से संबंधित" या "बंगालियों के बारे में" किया जा सकता है. 1931 में खोजे गए ये खंडहर कम से कम तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व के माने जाते हैं. मौर्य शासन के अधीन यह एक प्रमुख शहर था, जो चारों तरफ किलाबंद था. यह आठवीं शताब्दी तक इस्तेमाल में रहा.

बहरहाल, समुद्री इतिहासकारों और पुरातत्वविदों से मिले अन्य डेटा के साथ इन सभी जानकारियों ने ILSR को 2,200 शब्दों के चार खंड के दस्तावेज तैयार करने में मदद की. मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे गए पत्र के बाद 12 जनवरी को इन्हें केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय, केंद्रीय गृह मंत्रालय और साहित्य अकादमी को भेजा गया. चार अक्टूबर को केंद्र सरकार द्वारा जारी एक गजट अधिसूचना में बंगाली भाषा को आधिकारिक रूप से क्लासिक का दर्जा दिए जाने की घोषणा की गई.

क्लासिक टैग मिलने का क्या मतलब है

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अधिकारियों का कहना है कि इस टैग का सांस्कृतिक और शैक्षणिक प्रभाव व्यापक रूप से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैलेगा. शिक्षा मंत्रालय क्लासिक दर्जा प्राप्त इन भाषाओं को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न कदम उठाता है.

जैसे, संस्कृत को बढ़ावा देने के लिए 2020 में तीन केंद्रीय विश्वविद्यालय स्थापित किए गए. प्राचीन तमिल ग्रंथों के अनुवाद की सुविधा प्रदान करने और तमिल में पाठ्यक्रम प्रदान करने के लिए 2008 में केंद्रीय शास्त्रीय तमिल संस्थान की स्थापना की गई. कन्नड़, तेलुगु, मलयालम और ओडिया के अध्ययन के लिए भी इसी तरह के उत्कृष्टता केंद्र स्थापित किए गए हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक, इन सूची में जिन नई भाषाओं को स्थान मिला है उन्हें भी इसी तरह बढ़ावा दिया जाएगा. नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में स्कूली शिक्षा में इन भाषाओं को शामिल करने का भी आह्वान किया गया है.  

विभिन्न अकादमियों के माध्यम से संस्कृति मंत्रालय, शिक्षा मंत्रालय और संबंधित राज्य सरकारें इन भाषाओं में दर्ज ज्ञान को साझा करने और शोध के लिए एक साथ आएंगी. इसके अलावा, विद्वानों की अधिक पहुंच के लिए इन भाषाओं की पांडुलिपियों का डिजिटलीकरण भी किया जाएगा.

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