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वेनेजुएला पर अमेरिकी हमलों के दौरान फेल हुआ चीनी एयर डिफेंस सिस्टम, भारत के लिए अच्छी खबर क्यों?

वेनेजुएला पर अमेरिकी सैन्य ऑपरेशन के दौरान चीनी एयर डिफेंस सिस्टम नाकाम साबित हुए, जिसने दुनियाभर में एक बार फिर चीनी हवाई सुरक्षा की कमजोरियों को उजागर किया

वेनेजुएला में अमेरिकी हमले की तस्वीर. (Photo: Screengrab)
वेनेजुएला में अमेरिकी हमले की तस्वीर. (Photo: Screengrab)
अपडेटेड 12 जनवरी , 2026

3 जनवरी को वेनेजुएला की राजधानी काराकास पर अमेरिकी सेना ने हवाई हमला किया. सैकड़ों अमेरिकी फाइटर जेट्स ने काफी आसानी से सीमा पार कर हमले को अंजाम दिया.

इस दौरान अमेरिकी सैनिकों ने राष्ट्रपति निकोलस मदुरो और उनकी पत्नी को गिरफ्तार कर लिया. इस पूरे ऑपरेशन के दौरान वेनेजुएला के एयर डिफेंस सिस्टम अमेरिकी इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और जेमिंग के सामने नाकाम साबित हुए.

इस तरह चीनी एयर डिफेंस की कमजोरियां एक बार फिर उजागर हुईं. 2025 में भारत की ऑपरेशन सिंदूर में भी पाकिस्तान के चीनी सिस्टम्स (HQ-9 आदि) फेल हो गए थे. ये दोनों घटनाएं चीनी हथियारों पर निर्भर देशों के लिए बड़ा सबक है.

महज 30 मिनट में वेनेजुएला के आसमान पर अमेरिकी कब्जा

अमेरिकी सेना ने इस ऑपरेशन को अंजाम देने से पहले महज कुछ मिनटों में विमानों, ड्रोन्स, इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर और साइबर अटैक्स के जरिए वेनेजुएला के एयर डिफेंस सिस्टम को काफी हद तक निष्क्रिय कर दिया.

फुएर्ते तिउना, ला कार्लोटा, एल वोल्कान, ला गुएरा पोर्ट, हिगुएरोत एयरपोर्ट जैसे 5 बेहद खास ठिकानों पर अमेरिकी हमले में चीनी रडार और रूसी Buk-M2 लॉन्चर्स नाकाम हो गए. अमेरिकी सेना ने रडार नेटवर्क को जेमिंग, पावर कट और हमलों से निष्क्रिय किया, जिससे वेनेजुएला की सेना चाहकर भी कुछ नहीं कर पाई.

सेना की नियंत्रण नेटवर्क बाधित होने के कारण रूसी निर्मित एस-300वी और बुक-एम2 मिसाइल होने के बावजूद वेनेजुएला की एयर डिफेंस सिस्टम प्रभावी ढंग से जवाबी कार्रवाई करने में विफल रहीं. इसके बाद 150+ अमेरिकी विमानों ने हवाई अड्डों और सैन्य ठिकानों पर हमले किए.

हेलीकॉप्टर्स और टिल्ट-रोटर विमानों ने काराकास के आसपास महत्वपूर्ण स्थानों पर ऑपरेशन चलाया, जिसमें एक अमेरिकी विमान क्षतिग्रस्त हुआ लेकिन सुरक्षित लौट गया. इस अभियान के अंत तक वेनेजुएला का एयर डिफेंस सिस्टम लगभग पूरी तरह नाकाम साबित हुआ, जिससे अमेरिकी बलों को आसमान पर मजबूत नियंत्रण मिल गया.

जंग में टेस्टेड हथियारों पर दुनिया का भरोसा बढ़ा

भले ही पाकिस्तान या वेनेजुएला जैसे देश अपनी सेना को चीनी डिफेंस सिस्टम से लैस कर रहे हों, लेकिन दोनों घटनाओं ने एक अहम सबक दिया है: अब लागत और निर्यात के बजाय युद्ध में प्रमाणित (battle-tested) हथियारों पर दुनिया का भरोसा बढ़ रहा है. भारतीय रणनीतिकार भी इसी आधार पर अपनी भविष्य की योजनाएँ बना रहे हैं.

पिछले साल मई में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान के चीन-निर्मित HQ-9 और LY-80 एयर डिफेंस सिस्टम भारतीय हवाई हमलों को रोकने में असफल रहे. रिपोर्ट्स के अनुसार, ये सिस्टम भारतीय विमानों और मिसाइलों का पता लगाने और निशाना बनाने में नाकाम साबित हुए.

भारत की स्टैंड-ऑफ हथियारों और कम ऊंचाई वाली घुसपैठ वाली रणनीति ने पाकिस्तानी वायु रक्षा को भ्रमित कर दिया. अब वेनेजुएला में अमेरिकी ऑपरेशन ने चीनी सिस्टम्स (JY-27A आदि) की कमजोरियां फिर उजागर कीं, जिससे चीन पर निर्भर देशों में चिंता बढ़ गई है.

चीन अपने एयर डिफेंस को अत्यधिक सक्षम बताता है, लेकिन आधुनिक संघर्षों में ये इलेक्ट्रॉनिक वॉर और गुप्त तरीके से हमला करने वाले विमानों के सामने नाकाम साबित हो रहे हैं. वेनेजुएला की घटना ने साफ किया कि आधुनिक हवाई अभियानों में दुश्मन के एयर डिफेंस को पहले निष्क्रिय करना प्राथमिकता है.

अमेरिकी स्टील्थ लड़ाकू विमानों (गुप्त हमला करने वाले विमान), इलेक्ट्रॉनिक अटैक और लंबी दूरी के बमवर्षकों ने वेनेजुएला के चीनी जेवाई-सीरीज निगरानी रडारों को ध्वस्त कर दिया, जो कथित तौर पर लगातार जैमिंग के कारण उस वक्त भरोसेमंद ट्रैकिंग डेटा देने में विफल रहे. इस तरह रडार का सिग्नल खत्म होने पर, उस नेटवर्क से जुड़े रूसी मूल के फाइटर जेट और मिसाइल प्रणालियां काफी हद तक अप्रभावी हो गईं. इससे अमेरिकी सेना को लगभग पूरी तरह से निडर होकर कार्रवाई करने का मौका मिल गया.

भारत के लिए वेनेजुएला में अमेरिकी हमले के मायने

भारत के लिए वेनेजुएला ऑपरेशन के गंभीर मायने हैं. चीन ने एशिया, अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका में आक्रामक रूप से अपने रडार और एयर डिफेंस टेक्नोलॉजी बेची है, उन्हें गुप्त विमानों और सटीक हमलों के खिलाफ पेश किया है. लेकिन, काराकास में JY-27A जैसे 'एंटी स्टील्थ' रडार अमेरिकी इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और जेमिंग से नाकाम हो गए, जिससे चीनी सिस्टम्स की कमजोरियां सामने आ गईं. जैसे- इलेक्ट्रॉनिक वॉर से लड़ने में सक्षम नहीं, कमांड सिस्टम कठिन होना, कम भरोसेमंद सॉफ्टवेयर और विदेशी पुर्जों पर अत्यधिक निर्भरता शामिल है.

पाकिस्तान की चीनी सेंसर और मिसाइल प्रणालियों पर बढ़ती निर्भरता की जानकारी, भारतीय सुरक्षा योजनाकारों के लिए बेहद अहम हो जाती है. ये वे चीनी डिफेंस साजो-सामान हैं, जिसका किसी जंग के दौरान कभी परीक्षण नहीं किया गया है.

इसके अलावा रूसी S-400 को अपने एयर डिफेंस सिस्टम में शामिल करने का भारत का फैसला अब और ज्यादा सही लगता है. S-400 को एक स्वतंत्र समाधान के रूप में नहीं, बल्कि एक व्यापक, बहुस्तरीय संरचना के हिस्से के रूप में देखा जाता है. इसमें लंबी दूरी के इंटरसेप्टर, कई रडार बैंड, स्वदेशी सेंसर और नेटवर्कयुक्त कमांड और नियंत्रण प्रणाली शामिल हैं. इसका मुख्य उद्देश्य इलेक्ट्रॉनिक वॉर के दौरान सटीक कार्रवाई कर अपने एयर डिफेंस सिस्टम को सुरक्षित करना है. ताकी कराकस जैसी परिस्थिति भारत में पैदा नहीं हो सके.

भारत, पाकिस्तान के साथ-साथ पश्चिमी मोर्चे पर भी चीनी वायु सेना के गुप्त विमान ठिकानों और हवाई खतरों से जुड़े संभावित स्थिति को लेकर मजबूत तैयारी कर रहा है. ऐसे में वेनेजुएला की घटना एयर डिफेंस सिस्टम और मिसाइल रक्षा में भारत के आत्मनिर्भर प्रयासों को और मजबूत करती है.

किसी एक विदेशी आपूर्तिकर्ता पर निर्भर रहने के बजाय भारत ने कई देशों से डिफेंस से जुड़े साजो-सामान खरीदे हैं. स्वदेशी एयर डिफेंस सिस्टम के साथ S-400 जैसी रूसी मिसाइल को स्वदेशी रडार, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध उपकरणों और अवरोधक मिसाइलों के साथ एकीकृत करने का प्रयास किया है.

विश्लेषकों का कहना है कि भारत के अलावा, कराकस हमले ने उन देशों को एक व्यापक चेतावनी दी है जो कम कीमत में सैन्य उपकरणों को खरीदना चाहते हैं. उन्हें लगता है कि लागत और सुरक्षा दोनों सामान है. गुप्त हमलों, साइबर अभियानों और विद्युत चुम्बकीय प्रभुत्व के इस युग में बेहतर एयर डिफेंस सिस्टम की मांग तेजी से बढ़ रही है.

ऐसे में साफ है कि दक्षिण एशिया के देशों के लिए डिफेंस सिस्टम या एयर डिफेंस सिस्टम का मूल्यांकन मार्केटिंग या कीमत आदि के आधार पर नहीं जंग के दौरान उनके बेहतर प्रदर्शन से होगा. मतलब टेस्टेड हथियारों पर दुनिया भरोसा और ज्यादा बढ़ेगा.

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