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गोडावण के एक चूजे का जन्म कैसे बन गया राजनीतिक मुद्दा!

पक्षियों की एक विलुप्तप्राय प्रजाति गोडावण के हाल ही में पैदा हुए एक चूजे ने वन्यजीव कार्यकर्ताओं के साथ-साथ राजनीतिक गलियारों में भी बड़ी हलचल मचा दी है

Supreme Court says adverse effects of climate change impact citizens right to life
गोडावण (फाइल फोटो)
अपडेटेड 3 अप्रैल , 2026

गंभीर रूप से संकटग्रस्त ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (GIB) यानी गोडावण का एक फर्टिलाइज्ड एग (निषेचित अंडा) जैसलमेर के सैम स्थित कैप्टिव ब्रीडिंग सेंटर से गुजरात के कच्छ के रण तक 770 किलोमीटर की यात्रा पर निकला- एक हैंडहेल्ड इनक्यूबेटर में पैक और हर झटके से सुरक्षित.

इसने विशेष रूप से बनाए गए ग्रीन कॉरिडोर के जरिए लगभग 19 घंटे की यात्रा की. अगले दिन, इसे कच्छ में एक जंगली मादा गोडावण के घोंसले में रख दिया गया. यह वहां की बची हुई केवल तीन मादाओं में से एक थी, और नर की अनुपस्थिति के कारण प्रजनन करने में असमर्थ थीं. चार दिन बाद, 26 मार्च को अंडे से चूजा बाहर आ गया.

वन्यजीव कार्यकर्ताओं के लिए, यह ‘जंपस्टार्ट’ प्रयोग एक बड़ी उपलब्धि है. लेकिन राजनेताओं के लिए, यह जल्दी ही श्रेय लेने की होड़ में बदल गया है. गोडावण दुनिया के सबसे लुप्तप्राय पक्षियों में से एक है, जिसकी जंगली आबादी बमुश्किल 150 बची है, जिनमें से अधिकांश राजस्थान में हैं. इनकी संख्या में गिरावट का कारण आवास का नुकसान, शिकार और हाल के वर्षों में बिजली की ओवरहेड लाइनों से टकराकर होने वाली मौतें रही हैं.

गुजरात में गोडावण की आबादी जैविक रूप से खत्म होने के कगार पर पहुंच गई थी. कोई नर न होने के कारण, मादाएं अंडे तो देती रहीं, लेकिन वे केवल बांझ (infertile) थे. ‘जंपस्टार्ट’ को इसी तरह के पारिस्थितिक पतन के लिए डिजाइन किया गया था : जंगल में एक बांझ अंडे को नियंत्रित प्रजनन कार्यक्रम से लाए गए उपजाऊ (Fertile) अंडे से बदल दिया जाए, ताकि मादा स्वाभाविक रूप से अंडे को सेने और चूजे का पालन-पोषण करने में सक्षम हो सके.

कच्छ में यही हुआ. वैज्ञानिकों ने 15-16 दिन पुराने अंडे को चुना जो परिवहन के दौरान जीवित रहने के लिए पर्याप्त पुराना था. पालक मां ने अंडे को स्वीकार किया, उसे सेया और अब वह जंगल में चूजे को पाल रही है.

केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने इस जन्म को केंद्र, राजस्थान और गुजरात के वन विभागों और भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) के बीच समन्वय से हासिल किया गया एक ‘महत्वपूर्ण मील का पत्थर’ बताया. संरक्षण के नजरिए से, यह प्रतीकवाद से कहीं अधिक है. यह दिखाता है कि विज्ञान अस्थाई रूप से पारिस्थितिक पतन को रोक सकता है और खत्म होने के कगार पर खड़ी प्रजाति के लिए समय बचा सकता है.

राजस्थान-गुजरात समीकरण : यह कहानी भूगोल और शक्ति के बारे में भी है. राजस्थान गोडावण का आखिरी गढ़ बना हुआ है, जहां इसकी अधिकांश आबादी और सैम व रामदेवरा में महत्वपूर्ण प्रजनन केंद्र हैं. यहां, पिछले कुछ वर्षों में जंगल से एकत्र किए गए अंडों को कृत्रिम रूप से सेया जा रहा है, और कृत्रिम गर्भाधान के माध्यम से भी चूजों का जन्म हुआ है. यह गोडावण की एक संस्थापक आबादी विकसित करने के लिए किया गया है. केंद्र में वयस्क हो चुके पक्षियों ने जोड़ा बनाया है और अगली पीढ़ी को जन्म दिया है. राजस्थान के सैम और रामदेवरा के संरक्षण प्रजनन केंद्रों में पक्षियों की संख्या अब 73 तक पहुंच गई है.

इसके विपरीत, गुजरात केवल तीन मादाओं के साथ एक गोडावण आवास का महज अवशेष बनकर रह गया है.

WII टीम और गुजरात वन विभाग ने नलिया में मादा गोडावण को रेडियो-टैग किया था ताकि उसकी गतिविधियों पर नजर रखी जा सके और बांझ अंडे देने की निगरानी की जा सके. तैयारियों के हिस्से के रूप में, WII ने राजस्थान के डेजर्ट नेशनल पार्क में ‘जंपस्टार्ट’ पद्धति का परीक्षण किया, जिसमें मादा गोडावण के घोंसले में उपजाऊ (Fertile) अंडे रखे गए. छह परीक्षणों में, चार उपजाऊ (Fertile) अंडे घोंसलों में रखे गए ताकि यह देखा जा सके कि क्या मादाएं उन्हें पालेंगी और सेयेंगी, जबकि दो मामलों में लकड़ी के अंडे रखे गए थे.

अंडे का स्थानांतरण केवल एक संरक्षण पैंतरेबाजी नहीं है, बल्कि जैविक पूंजी का पुनर्वितरण है- एक ऐसे राज्य से जिसके पास अभी भी पक्षी हैं, उस राज्य की ओर जिसने उन्हें लगभग खो दिया है. इससे पहले, राजस्थान के भीतर दुर्लभ प्रजनन संसाधनों को साझा करने के बारे में हिचकिचाहट की खबरें आई थीं. केंद्रीय एजेंसियों और वैज्ञानिकों के दखल से आखिरकार उस प्रतिरोध को दूर किया गया. सफल हैचिंग अब एक मिसाल कायम करती है: प्रजातियों की बहाली के लिए अंतर-राज्यीय सहयोग आवश्यक हो सकता है.

लेकिन यह एक कठिन सवाल भी खड़ा करता है. क्या गुजरात उन बुनियादी पारिस्थितिक समस्याओं को ठीक किए बिना आबादी को बनाए रख सकता है जिनके कारण यह पतन हुआ था?

राजनीति की एंट्री : बस्टर्ड को किसने बचाया? लगभग तुरंत ही, इस सफलता ने राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप शुरू कर दिए. यादव ने अपने सार्वजनिक संदेशों में संरक्षण के इस प्रयास का श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दिया, इसे मोदी के कार्यकाल के दौरान शुरू किए गए और 2016 में औपचारिक रूप से लॉन्च किए गए प्रोजेक्ट गोडावण के विजन से जोड़ा. यह नैरेटिव इस सफलता को दीर्घकालिक, केंद्र-संचालित संरक्षण की कहानी के रूप में पेश करता है.

लेकिन पूर्व पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने इस दावे का विरोध करते हुए कहा कि गोडावण संरक्षण प्रयासों की शुरुआत मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पहले हुई थी. उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि उन्होंने तत्कालीन केंद्रीय पर्यावरण मंत्री के रूप में, तत्कालीन गुजरात के सीएम मोदी को गोडावण के संरक्षण पर पत्र लिखा था. रमेश का दखल समयरेखा को फिर से परिभाषित करता है, जो किसी एक राजनीतिक स्वामित्व के बजाय निरंतरता का संकेत देता है.

यह कोई मामूली विवाद नहीं है. भारतीय पर्यावरण राजनीति में, श्रेय नीतिगत स्मृति और भविष्य की फंडिंग को आकार देता है. क्या गोडावण संरक्षण एक विरासत प्रयास था जो सरकारों के साथ विकसित हुआ, या वर्तमान शासन की एक प्रमुख पहल? जवाब, दोनों पक्षों के लिए असुविधाजनक रूप से शायद यह है कि श्रेय दोनों को मिलना चाहिए.

राजनीतिक दावों को हटा दें, तो एक और अधिक असहज सच्चाई सामने आती है. भारत एक ऐसे चूजे का जश्न मना रहा है जो केवल इसलिए अस्तित्व में है क्योंकि प्रकृति अब अपना काम नहीं कर सकती थी. 770 किलोमीटर के अंडे के स्थानांतरण की आवश्यकता इस बात को रेखांकित करती है कि घास के मैदान के पारिस्थितिकी तंत्र कितने खंडित और खराब हो गए हैं. गोडावण की गिरावट केवल नीतिगत इरादे की कमी के कारण नहीं है, बल्कि संरक्षण और विकास के बीच निरंतर संघर्ष के कारण है. गोडावण आवासों में अक्षय ऊर्जा बुनियादी ढांचे का विस्तार खासतौर पर इसके लिए जिम्मेदार है.

इन आवासों के लिए बिजली की लाइनें एक बड़ा खतरा बनी हुई हैं. संरक्षण कार्यकर्ताओं ने बार-बार महत्वपूर्ण आवासों में भूमिगत केबल बिछाने की आवश्यकता को रेखांकित किया है, लेकिन इसका कार्यान्वयन अधूरा और विवादित रहा है.

उस अर्थ में ‘जंपस्टार्ट’ की सफलता प्रेरक और विचारोत्तेजक दोनों है. यह दिखाता है कि विज्ञान क्या हासिल कर सकता है लेकिन यह भी कि यह किसकी भरपाई कर रहा है.

इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह प्रयोग एक खाका पेश करता है. इसी तरह के दखल अन्य जगहों पर अलग-थलग पड़ी आबादी को पुनर्जीवित कर सकते हैं, जिससे गंभीर रूप से लुप्तप्राय प्रजातियों के लिए महत्वपूर्ण समय मिल सकता है. लेकिन यह आवास बहाली का विकल्प नहीं है.

नवजात चूजे को शिकारियों से लेकर पर्यावरणीय तनाव तक के तत्काल खतरों का सामना करना पड़ता है. जीवित रहने के लिए पहले कुछ सप्ताह महत्वपूर्ण होते हैं. और भले ही वह जीवित रहे, एक चूजा पूरी आबादी नहीं बनाता.

गोडावण की बहाली के लिए भारत को इनक्यूबेटरों और गलियारों से कहीं अधिक की आवश्यकता होगी. इसके लिए बड़े, आपस में जुड़े घास के मैदानों को सुरक्षित करने, बुनियादी ढांचे के जोखिमों को कम करने और अक्सर राजनीतिक कीमत पर राज्य और केंद्र की प्राथमिकताओं को मिलाने की आवश्यकता होगी.

चूजा और सुर्खियां : फिलहाल, यह छवि शक्तिशाली है- एक पक्षी जो गुजरात में पैदा नहीं हो सकता था, वह अब एक पालक मां की देखरेख में वहां के घास के मैदानों में घूम रहा है. यह वैज्ञानिक सरलता, नौकरशाही समन्वय और राजनीतिक श्रेय की कहानी है.

लेकिन असली परीक्षा आगे है. अगर यह चूजा जीवित रहता है, और यदि और भी चूजे आते हैं, तो यह पुनरुद्धार की शुरुआत हो सकती है. अगर नहीं, तो यह एक उल्लेखनीय लेकिन अलग-थलग उदाहरण बना रहेगा. एक और याद दिलाने वाली बात कि संरक्षण केवल अंतिम समय के बचाव कार्यों पर निर्भर नहीं रह सकता. गोडावण को सचमुच एक दूसरा मौका दिया गया है. क्या भारत उसे भविष्य देता है, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि सुर्खियां गायब होने बाद क्या होता है.

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