गुजरात में गोडावण (ग्रेट इंडियन बस्टर्ड) का एक चूजा गायब होना मरुभूमि राजस्थान के गोडावण संरक्षण उपायों के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है. जिस चूजे के पैदा होने में करोड़ों रुपए खर्च कर जंपस्टार्ट (सरोगेसी) तकनीक इस्तेमाल हुई, जिसके फर्टाइल अंडे को गुजरात ले जाने के लिए 770 किलोमीटर लंबा ग्रीन कॉरिडोर बनाया गया और जिसकी सुरक्षा में 50 गार्ड्स तैनात किए गए, वही 24 दिन का चूजा अब रहस्यमयी तरीके से गायब हो गया है.
यह घटना गंभीर चिंता और विवाद का सबब बन गई है. यह सिर्फ एक चूजे के लापता होने की घटना नहीं है, बल्कि भारत के सबसे बड़े वन्यजीव संरक्षण अभियानों में से एक की सुरक्षा और रणनीति पर भी बड़ा सवाल है. बीते 21 मार्च को राजस्थान के जैसलमेर स्थित सम गोडावण ब्रीडिंग सेंटर से एक फर्टाइल अंडे को विशेष इनक्यूबेटर में रखा गया. करीब 19 घंटे की अनवरत यात्रा के बाद इसे कच्छ स्थित नलिया पहुंचाया गया.
सम से कच्छ तक ग्रीन कॉरिडोर बनाया गया ताकि अंडा सही समय पर और सुरक्षित तापमान पर वहां पहुंचाया जा सके. अंडे को सेने के लिए एक ऐसी जंगली मादा का चयन किया गया, जो दूसरे के अंडे को अपना सके. भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) और गुजरात वन विभाग ने अंडा रखने से पहले छह परीक्षण किए. इनमें यह देखा गया कि क्या मादा गोडावण दूसरे अंडों को पालेगी.
नलिया में ऐसी मादा मिलने के बाद 22 मार्च को राजस्थान से लाया गया यह अंडा उसके घोंसले में रखा गया. गुजरात पहुंचने के चार दिन बाद ही 26 मार्च को जब चूजे का जन्म हुआ, तो इसे विलुप्ति की कगार पर खड़े गोडावण संरक्षण की नई उम्मीद माना गया. अगर यह चूजा जीवित रहता, तो नर गोडावण के तौर पर गुजरात में गोडावण की आबादी बढ़ाने में कारगर होता.
गुजरात के वन विभाग के अनुसार, 18 अप्रैल के बाद से यह चूजा अपनी जीपीएस टैग लगी मां के साथ दिखाई नहीं दिया है. इसके बाद पूरे इलाके में हड़कंप मच गया. सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि जिस घोंसले के चारों ओर चौबीस घंटे निगरानी की व्यवस्था थी, वहां से गुजरने वाली सारी सड़कों को सील कर दिया गया था.
पूरा नलिया केंद्र सीसीटीवी कैमरों से लैस था, ऐसे में सवाल है कि वहां से आखिर यह चूजा गायब कैसे हो गया? सूत्रों के अनुसार, गोडावण की सुरक्षा के लिए बनाए गए घेरे में कुछ खाली हिस्से रह गए थे. यहीं से किसी शिकारी कुत्ते, सियार या जंगली बिल्ली ने अंदर घुसकर इस नन्हे चूजे का शिकार कर लिया. अगर शिकार हुआ है, तो सबसे हैरानी की बात यह है कि अभी तक चूजे का कोई अवशेष तक नहीं मिला है. न पंख, न शरीर का कोई हिस्सा और न ही किसी संघर्ष के निशान मिले हैं. इससे घटना और ज्यादा रहस्यमय हो गई है. वन विभाग फिलहाल इसे प्राकृतिक खतरा बताकर बचाव की मुद्रा में दिखाई दे रहा है, लेकिन संरक्षण विशेषज्ञ इसे गंभीर सुरक्षा विफलता मान रहे हैं. गायब होने के 12 दिन बाद अब चूजे के जीवित बचने की संभावनाएं बहुत कम हैं.
वन्यजीव विशेषज्ञ बाबूलाल जाजू के अनुसार, "अगर चूजे का शिकार हुआ है तो यह और भी गंभीर मामला है क्योंकि वीवीआईपी सुरक्षा की तरह 50 गार्ड्स की तैनाती के बाद भी अगर शिकारी जानवर इस चूजे तक पहुंच गया तो यह पूरे गोडावण संरक्षण के उपायों पर प्रश्नचिन्ह है. जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई होनी चाहिए."
दरअसल, गोडावण बचाने का यह पूरा प्रयोग केवल वैज्ञानिक उपलब्धि भर नहीं था बल्कि राजनीतिक और प्रशासनिक प्रतिष्ठा का भी सवाल बन चुका था. बीते दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी 'मन की बात' कार्यक्रम में भी गोडावण संरक्षण की इस जंपस्टार्ट मुहिम की तारीफ की थी. केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने इस चूजे के जन्म को क्रांतिकारी उपलब्धि बताया था. राजस्थान और गुजरात के वन विभागों के साथ WII की टीम भी इस सफलता को अंतरराष्ट्रीय स्तर की उपलब्धि के तौर पर पेश कर रही थी. मगर पहली उपलब्धि पर ही जब ग्रहण लग जाए, तो सवाल उठना लाजिमी है.
गोडावण दुनिया के सबसे संकटग्रस्त पक्षियों में शामिल है. 1969 के आसपास रेगिस्तान में 1260 से ज्यादा गोडावण पाए जाते थे मगर हाल ही में इनकी संख्या करीब 170 के आसपास सिमट गई है. गुजरात की तीन मादा गोडावण के अलावा इनकी अधिकांश आबादी राजस्थान में है. गुजरात में कोई नर गोडावण नहीं बचा था, इसलिए जंपस्टार्ट तकनीक को इसके कुनबे को बढ़ाने और बचाने की आखिरी उम्मीद के तौर पर देखा जा रहा था.
यह घटना इसलिए भी गंभीर है क्योंकि गोडावण संरक्षण पर हर साल करोड़ों रुपए खर्च किए जा रहे हैं. राजस्थान के सम और रामदेवरा ब्रीडिंग सेंटरों में कृत्रिम गर्भाधान और कैप्टिव ब्रीडिंग के जरिए संख्या बढ़ाने की कोशिश हो रही है. वहां अब तक 70 से ज्यादा गोडावण संरक्षित किए जा चुके हैं.
वन्यजीव कार्यकर्ता लंबे समय से आशंका जता रहे हैं कि गोडावण को सबसे बड़ा खतरा केवल शिकारियों से नहीं, बल्कि मानवजनित गतिविधियों से है. बिजली की हाईटेंशन लाइनें, पवन और सौर ऊर्जा परियोजनाएं, चरागाहों का खत्म होना और लगातार सिकुड़ते घास के मैदान इस पक्षी को विलुप्ति की ओर धकेल रहे हैं. सुप्रीम कोर्ट तक इस मुद्दे पर चिंता जता चुका है. इसके बावजूद संरक्षण के मूल सवालों पर ठोस कार्रवाई की बजाय अब तक प्रतीकात्मक उपलब्धियों का ज्यादा प्रचार होता रहा है. अब गुजरात में चूजे के गायब होने की इस घटना ने वन विभाग और सरकार दोनों को असहज स्थिति में ला दिया है.

