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राज्यपालों की नई तैनाती के पीछे क्या है मोदी सरकार की रणनीति?

राजभवनों में हालिया बदलावों के जरिए राजनीतिक रूप से संवेदनशील या चुनावी रूप से अहम राज्यों में भरोसेमंद चेहरों को बिठाया गया है

केंद्र सरकार ने पांच राज्यों के राज्यपालों को 'रीशफल' किया है
केंद्र सरकार ने पांच राज्यों के राज्यपालों को 'रीशफल' किया है
अपडेटेड 10 मार्च , 2026

बीते हफ्ते केंद्र सरकार ने राज्यपालों की तैनाती के जो फैसले किए, उनमें सबसे चौंकाने वाला कदम आर.एन. रवि को पश्चिम बंगाल का राज्यपाल बनाना था. रवि को तमिलनाडु में उनके आक्रामक कार्यकाल के लिए जाना जाता है, जहां एम.के. स्टालिन की अगुवाई वाली द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) सरकार के साथ उनके टकराव अक्सर संवैधानिक बहस में बदलते दिखे.

रवि का कोलकाता जाना इस बात का सिग्नल है कि केंद्र सरकार की उम्मीद के मुताबिक भारत के राजनीतिक रूप से सबसे ज्यादा 'संवेदनशील’ राज्यों में से एक में 'राजभवन' अब एक बेहद सक्रिय भूमिका निभाएगा. पश्चिम बंगाल आज भी BJP और ममता बनर्जी की सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस (TMC) के बीच एक कुरुक्षेत्र बना हुआ है, जो राज्यपाल के चुनाव को और भी ज्यादा अहम बना देता है.

राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में राज्यपाल-उपराज्यपालों की नए सिरे से तैनाती केंद्र सरकार की राजनीतिक रूप से संवेदनशील इलाकों में अपनी संवैधानिक मौजूदगी को नए सिरे से सेट करने की एक बड़ी कोशिश को भी दिखाता है.

2024 के आखिरी बड़े बदलाव के बाद हुई यह ताज़ा कवायद उन राज्यों में भरोसेमंद चेहरों को फिर से तैनात करने की कोशिश लगती है, जहां सियासी पारा चढ़ने की उम्मीद है. इसकी टाइमिंग खास तौर पर बहुत अहम है क्योंकि कई बड़े राज्यों- पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु और केरल में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं. BJP के लिए, इनमें से हर राज्य एक अलग रणनीतिक चुनौती पेश करता है: असम में अपनी स्थिति मजबूत करना, बंगाल में अपना दायरा बढ़ाना, और तमिलनाडु व केरल में लंबी अवधि की राजनीतिक कामयाबी हासिल करने की कोशिश करना.

रवि के तबादले से केंद्र सरकार को तमिलनाडु में अपनी अप्रोच 'रीसेट' करने का मौका मिल गया है, जहां अब राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर को राज्यपाल बनाया गया है. रवि के हाई-प्रोफाइल और अक्सर टकराव वाली स्टाइल से उलट, उम्मीद है कि आर्लेकर एक ज्यादा नपा-तुला संस्थागत रवैया अपनाएंगे. इससे उस राज्य में सियासी गर्मी कम करने में मदद मिल सकती है जहां राजभवन और राज्य सरकार के बीच का तनाव आए दिन एक संवैधानिक गतिरोध में बदल जाता था.

एक और बड़ा बदलाव राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में हुआ है. पूर्व भारतीय राजनयिक तरनजीत सिंह संधू ने उपराज्यपाल (LG) के तौर पर विनय कुमार सक्सेना की जगह ली है. यह एक ऐसे केंद्र शासित प्रदेश में नया प्रशासनिक बदलाव ला सकता है जहां मोदी सरकार और पिछली आम आदमी पार्टी (AAP) सरकार के बीच रिश्ते हमेशा संस्थागत टकराव वाले रहे थे. संधू का डिप्लोमैटिक बैकग्राउंड इस बात का इशारा करता है कि BJP-शासित दिल्ली में केंद्र के प्रशासनिक अधिकार को बनाए रखते हुए, काम करने का एक ज्यादा सधा हुआ तरीका अपनाया जा सकता है.

सक्सेना का लद्दाख ट्रांसफर होना अपने आप में रणनीतिक मायने रखता है. चीन के साथ भारत के सैन्य तनाव और बड़े संवैधानिक सुरक्षा घेरे की बढ़ती स्थानीय मांग के बाद, यह केंद्र शासित प्रदेश एक बहुत ही संवेदनशील प्रशासनिक क्षेत्र बनकर उभरा है. वहां एक अनुभवी प्रशासक को तैनात करना राष्ट्रीय सुरक्षा की प्राथमिकताओं और क्षेत्रीय गवर्नेंस की चुनौतियों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश को दिखाता है.

पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल (रिटायर्ड) सैयद अता हसनैन को बिहार का राज्यपाल बनाना भी काफी अहम है. बदलते गठबंधनों और नए बनते जातीय समीकरणों के साथ, बिहार राजनीतिक रूप से बहुत अस्थिर बना हुआ है. एक ऐसे हाई-प्रोफाइल चेहरे को लाना, जिसकी राष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत साख हो, यह दिखाता है कि केंद्र एक ऐसे राज्यपाल को तरजीह दे रहा है जो एक संभावित 'अशांत' राजनीतिक माहौल को मैनेज कर सके.

ये बदलाव जुलाई 2024 की उस कवायद के बड़े पैटर्न को ही आगे बढ़ाते हैं जब तेलंगाना, झारखंड, छत्तीसगढ़, सिक्किम और राजस्थान के राजभवनों में बदलाव देखे गए थे. दोनों फैसलों के बीच ज्यादा वक्त नहीं बीता जो बताता है कि केंद्र सरकार अब राज्यपालों की नियुक्ति को एक 'लचीले प्रशासनिक टूल' के तौर पर देख रही है, जिससे अनुभवी चेहरों को वहां तैनात किया जा सके जहां राजनीतिक या रणनीतिक जरूरत पैदा हो.

कुल मिलाकर देखें तो, नियुक्तियों का यह नया सेट इस बात को उभारता है कि कैसे राजभवन भारत की संघीय राजनीति में एक बेहद अहम जगह घेरते हैं. भले ही संवैधानिक रूप से राज्यपालों से यह उम्मीद की जाती है कि वे दलगत राजनीति से ऊपर उठकर काम करें, लेकिन जब केंद्र और राज्यों के बीच राजनीतिक मुकाबला तेज होता है, तो उनकी भूमिका अक्सर बहुत अहम हो जाती है. राजनीतिक रूप से संवेदनशील या चुनावी रूप से अहम राज्यों में प्रमुख चेहरों को बिठाकर, ऐसा लगता है कि केंद्र सरकार खामोशी से राजनीतिक लड़ाइयों के अगले दौर के लिए अपने संस्थागत ढांचे को तैयार कर रही है.
 

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