प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोगों से एक साल तक सोने के गहने न खरीदने की अपील और सोने के आयात शुल्क को 6 फीसदी से बढ़ाकर 15 फीसदी करने के फैसले से जूलरी कारोबारियों में चिंता बढ़ गई है.
सरकार का कहना है कि पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष और कमजोर होते रुपए की वजह से भारत का आयात बिल पहले ही बढ़ चुका है. पिछले हफ्ते रुपया डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच चुका है.
ऐसे में सरकार सोने की विदेशी खरीद कम करना चाहती है ताकि विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम हो सके.
भारत दुनिया में सोने का दूसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है इसलिए एक साल तक इस तरह की सख्ती का असर काफी बड़ा माना जा रहा है. ऑल इंडिया जेम एंड जूलरी डोमेस्टिक काउंसिल (All India Gem and Jewellery Domestic Council) के चेयरमैन राजेश रोकड़े कहते हैं कि इंडस्ट्री को प्रधानमंत्री की अपील का पालन करना चाहिए और किसी तरह की हड़ताल या घबराहट में कदम नहीं उठाना चाहिए.
रोकड़े ने समझाया कि कच्चे तेल के बाद सबसे ज्यादा विदेशी पैसा सोने के आयात पर खर्च होता है. इसलिए पीएम का यह संदेश भारत के भुगतान संतुलन (बैलेंस ऑफ पेमेंट) को सुधारने और बाहरी देशों पर अपनी जरूरत से ज्यादा निर्भरता को कम करने के लिए है.
जेम्स और जूलरी सेक्टर में 50 से 60 लाख कारीगर और 40 से 50 लाख सेल्सपर्सन काम करते हैं. इनमें करीब 70 फीसदी महिलाएं हैं. अगर कोविड लॉकडाउन जैसी स्थिति बनती है तो लगभग 1 करोड़ लोगों की रोजी-रोटी प्रभावित हो सकती है. इसमें हॉलमार्किंग, पैकेजिंग, लॉजिस्टिक्स, सिक्योरिटी, बैंकिंग और इंश्योरेंस जैसे जुड़े हुए सेक्टर भी शामिल हैं.
जीजेसी (GJC) ने इस मुद्दे पर बैठक बुलाई ताकि सरकार की सोच के साथ तालमेल रखते हुए कारोबार पर कम से कम असर पड़े. बैठक में कई सदस्यों ने कहा कि उद्योग को एकजुट रहना चाहिए और सकारात्मक तरीके से सरकार के साथ काम करना चाहिए. उन्होंने गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम को फिर से मजबूत करने की सलाह दी ताकि घरों और लॉकरों में पड़े सोने को इस्तेमाल में लाया जा सके.
उद्योग के अनुमान के मुताबिक आयात किए गए सोने का करीब एक चौथाई हिस्सा ज्वैलरी बनाने में इस्तेमाल होता है. जीजेसी के वाइस चेयरमैन अविनाश गुप्ता ने सुझाव दिया कि बुलियन यानी सोने की ईंट और सिक्कों की बिक्री कम की जाए और पुराने सोने के एक्सचेंज प्रोग्राम को बढ़ावा दिया जाए ताकि सरकार की नीतियों के साथ तालमेल बैठ सके. उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि ज्यादा आयात शुल्क के दौरान काले बाजार की गतिविधियां बढ़ जाती हैं इसलिए सभी को सतर्क रहना चाहिए.
महाराष्ट्र के अकोला के एक ज्वैलर ने सुझाव दिया कि कुछ समय के लिए नियमों में बदलाव करके गोल्ड ईटीएफ में बिना फिजिकल गोल्ड बैकअप के डिजिटल गोल्ड में निवेश की अनुमति दी जाए. इससे उपलब्ध सोना जेवरात बनाने में इस्तेमाल हो सकेगा.
जीजेसी के पूर्व चेयरमैन अशोक मिनावाला का कहना है कि ज्वैलरी इंडस्ट्री अब काफी विविध हो चुकी है और उसे चांदी, हीरे, लैब में बने हीरे और कीमती पत्थरों वाले गहनों पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए ताकि सोने के विकल्प बढ़ सकें.
इंडस्ट्री में इस बात पर भी सहमति है कि हालात इतने न बिगड़ें कि सरकार को गोल्ड कंट्रोल ऑर्डर जैसा सख्त कदम उठाना पड़े. साथ ही यह मांग भी उठी कि कर्नाटक की कोलार गोल्ड फील्ड्स की खदानों को फिर से शुरू करने पर विचार किया जाए क्योंकि सोने की ऊंची कीमतों के चलते वहां खनन अब फायदे का सौदा हो सकता है.
इसके अलावा सुझाव दिए गए कि एक्सचेंज स्कीम के तहत सोना खरीदने पर जीएसटी हटाया जाए, 10 ग्राम से ज्यादा के सोने के सिक्कों की बिक्री रोकी जाए क्योंकि उनमें कोई वैल्यू एडिशन नहीं होता, और 14 कैरेट व 18 कैरेट जैसे हल्के वजन वाले गहनों को बढ़ावा दिया जाए.

