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भारत के हवाई यात्री 2026 में किस राहत की उम्मीद कर सकते हैं?

देश के एविएशन सेक्टर में अगर कंसॉलिडेशन पूरा हुआ तो 2026 के दौरान यह कुछ मायनों में हवाई यात्रियों के लिए भी राहत की बात होगी

IndiGo crisis
बीते साल के संकट के बाद इंडिगों के लिए 2026 नए सिरे से खुद को गढ़ने का साल है
अपडेटेड 13 जनवरी , 2026

यह बात शुरू में ही साफ करन देनी चाहिए. भारतीय हवाई यात्री 2026 में किसी बड़े धमाके की उम्मीद न करें. न किरायों में बड़ी गिरावट होगी, न यात्री संख्या में रॉकेट जैसी छलांग. लेकिन 2025 की अफरातफरी और तबाही के बाद- जब रिकॉर्ड ट्रैफिक, दशकों का सबसे भीषण विमान हादसा, कई बार बाल-बाल बचने और सिस्टमाइज्ड ऑपरेशंस का लगभग ढह जाने की घटना- 2026 भारत के उड्डयन क्षेत्र के लिए ठहराव और समेकन या कंसॉलिडेशन का साल बन सकता है.

ग्रोथ जारी रहेगी, लेकिन अब रफ्तार थोड़ी धीमी और ज्यादा नियंत्रित होगी. यात्रियों को इसका पहला फायदा साफ दिखेगा- कम भीड़ और ज्यादा विकल्प. इसका शुरुआती असर खासकर देश के सबसे व्यस्त एविएशन मार्केट में हवाई अड्डों की क्षमता बढ़ने के रूप में दिखेगा.

दिसंबर में शुरू हुआ नवी मुंबई इंटरनेशनल एयरपोर्ट एक बड़ा स्ट्रक्चरल बदलाव है. शुरुआती तौर पर करीब 2 करोड़ यात्रियों की सालाना क्षमता वाला यह एयरपोर्ट भविष्य में 9 करोड़ यात्रियों तक संभालने के लिए डिजाइन किया गया है. यानी मुंबई और उसके आसपास के इलाके के लिए यह एक नया एविएशन इंजन है.

यात्रियों के लिए इसके सीधे फायदे हैंः ज्यादा डिपार्चर स्लॉट, पीक ऑवर में बेहतर ऑपरेशंस, छोटी कतारें और फ्लाइट टाइमिंग में ज्यादा लचीलापन. 2026 के मध्य तक अकेला एअर इंडिया ग्रुप ही इस नए एयरपोर्ट से रोज करीब 55 उड़ानें संचालित करने की योजना बना रहा है, जिनमें पांच तक इंटरनेशनल सर्विसेज शामिल होंगी. वहीं, अकासा एयर जैसी दूसरी एयरलाइंस ने भी यहां तेजी से ऑपरेशन बढ़ाने की घोषणा की है.

मुंबई ही नहीं, देश भर में एयरपोर्ट ऑपरेटर टर्मिनल अपग्रेड और नई सुविधाओं को तेजी से आगे बढ़ा रहे हैं. मिसाल के तौर पर, गुवाहाटी में नया टर्मिनल फरवरी के अंत तक कमर्शियल ऑपरेशंस के लिए तैयार होने की उम्मीद है. वहीं, नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट भी जल्द ही इसमें शामिल होने वाला है. ये उपाय कई सालों में पहली गंभीर कोशिश हैं, जिनका मकसद हवाई यात्रा की तेजी से बढ़ती मांग के बराबर एयरपोर्ट क्षमता खड़ी करना है.

दूसरा बदलाव जो यात्रियों को साफ नजर आएगा, वह है ज्यादा विमान, नए केबिन और थोड़ा बेहतर अनुभव लेकिन अहम सुधार. इस समय भारतीय विमान सेवाओं के बेड़े में करीब 843 विमान हैं, और सरकार चाहती है कि अगले कम से कम एक दशक तक एयरलाइंस हर साल करीब 100 नए विमान शामिल करें. कैलेंडर वर्ष 2026 में लगभग 106 नए विमान भारतीय बेड़ों में शामिल होने की संभावना है, जबकि 2025 में यह संख्या करीब 80 रही थी.

एअर इंडिया को 26 नए विमान मिलने वाले हैं, जिनमें छह वाइड बॉडी होंगे. इसके साथ ही वह अपने कुछ पुराने बोइंग 777 विमानों को हटाएगी और बड़े रेट्रोफिट प्रोग्राम को आगे बढ़ाएगी. हर महीने दो से तीन वाइड बॉडी विमानों को अपग्रेड किया जाएगा, और 2026 के अंत तक लंबी दूरी की ज्यादातर उड़ानों के केबिन नए रूप में दिखेंगे. विदेश यात्रा करने वाले यात्रियों के लिए यह बदलाव आराम और अनुभव के मामले में बड़ा, भले थोड़ा असहज, लेकिन जरूरी सुधार साबित हो सकता है.

इंडिगो, जो बाजार हिस्सेदारी के लिहाज से भारत की सबसे बड़ी एयरलाइन है, अपना पहला A321 XLR  विमान लेने की तैयारी में है. इससे उसे यूरोप और एशिया के कुछ हिस्सों तक लंबी नॉन-स्टॉप उड़ानें शुरू करने का मौका मिलेगा. इंडिगो और एअर इंडिया, दोनों ही 2026 को सिर्फ बेतहाशा क्षमता बढ़ाने का साल नहीं, बल्कि अपने नेटवर्क को नए सिरे से गढ़ने और प्रोडक्ट क्वालिटी सुधारने के साल के तौर पर देखती लग रही हैं. फिर भी, यह कोई परफेक्ट तस्वीर नहीं है. सप्लाई चेन की दिक्कतें और इंजन से जुड़ी समस्याएं, जिनकी वजह से 2025 में कई विमान ग्राउंड हो गए थे, पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं. लेकिन ज्यादा युवा और बड़ा बेड़ा होने से आखिरी वक्त पर उड़ानें रद्द होने और बेहद तंग शेड्यूल चलाने का जोखिम अब कम रहेगा.

पर्दे के पीछे एक और अहम बदलाव हो रहा है. यात्री ट्रैफिक की रफ्तार खुद धीमी पड़ रही है, और यह यात्रियों के लिए अच्छी खबर हो सकती है. इंटरनेशनल क्रेडिट रेटिंग एजेंसी ICRA या इक्रा के मुताबिक, वित्त वर्ष 26 में घरेलू यात्री ट्रैफिक 4 से 6 फीसद तक बढ़ने का अनुमान है, जो कोविड के बाद के तेज उछाल वाले सालों से काफी कम है. भू-राजनीतिक तनाव, लंबे रूट और बढ़ती लागत ने अंतरराष्ट्रीय विस्तार की उम्मीदों पर भी लगाम लगाई है.

इसका मतलब साफ है. बेकाबू मांग ही 2025 के संकट के इतना बिगड़ने की बड़ी वजह थी. 2026 में ग्रोथ कर्व को थोड़ा नीचे लाने से एयरलाइंस को हर वक्त किनारे पर खड़े रहने के दबाव के बिना ऑपरेशंस स्थिर करने, क्रू को ट्रेन करने और नए विमानों को सिस्टम में शामिल करने का वक्त मिलेगा.

भारत यात्रियों की संख्या के लिहाज से दुनिया के तीन सबसे बड़े एविएशन बाजारों में से एक है. लंबी अवधि की दिशा अब भी मजबूत है. फर्क सिर्फ रफ्तार का है, और 2026 में वही सबसे बड़ा सबक साबित हो सकता है.

इन तमाम फायदों के नीचे, और दरअसल पिछले करीब एक दशक की ग्रोथ के पीछे, एक ज्यादा गंभीर सच्चाई भी छिपी है. एविएशन इंडस्ट्री अब भी आर्थिक तौर पर नाजुक बनी हुई है. इक्रा ने वित्त वर्ष 26 के लिए इंडस्ट्री के सकल घाटे का अनुमान बढ़ाकर करीब 17,000–18,000 करोड़ रुपए कर दिया है. ईंधन की ऊंची कीमतें, कर्ज की अदायगी और विमान लीज का बोझ मार्जिन को लगातार दबा रहा है. यात्रियों के लिए यह दबाव सीधे नजर नहीं आता, लेकिन इसके संकेत मिलते हैंः ज्यादा टाइट शेड्यूल, थके हुए क्रू और किसी भी तरह की गड़बड़ी को संभालने की बेहद कम गुंजाइश.

बाजार में बढ़ती एकाग्रता इस जोखिम को और बढ़ाती है. भारतीय आसमान पर अब दो बड़े एयरलाइन समूहों का दबदबा है. इनमें से किसी एक में भी लड़खड़ाहट होती है, तो उसका असर पूरे देश में महसूस होता है. ब्लूमबर्ग के एक विश्लेषण ने इस डुओपॉली में संचालन, वित्तीय और सुरक्षा दबावों के एक साथ टकराने से आने वाले खतरे की चेतावनी दी है. यही वजह है कि 2026 में रेगुलेशन और सेफ्टी ओवरसाइट (सुरक्षा निगरानी और नियमों को लागू करना) उड़ान के अनुभव के केंद्र में आ जाते हैं. 2025 की भयावह घटनाओं के बाद इस बात पर लगभग सर्वसम्मति है कि नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) को ज्यादा तकनीकी क्षमता, मजबूत रेगुलेशन और ज्यादा स्वायत्तता की जरूरत है. लोगों का भरोसा इसी पर टिका है.

ज्यादातर यात्रियों के लिए 2026 छोटे-छोटे सुधारों का साल होगाः कुछ बेहतर हवाईअड्डे, नए विमान, और पूरी तरह चरमराने वाली स्थितियों में कमी. लेकिन ढांचागत तौर पर यह एक निर्णायक साल है. भारत अपने अगले दशक की ग्रोथ के लिए हार्ड इन्फ्रास्ट्रक्चर- एयरपोर्ट और फ्लीट- तैयार कर रहा है. 2026 असली परीक्षा उन सॉफ्ट सिस्टम्स की लेगा, जिन पर सब कुछ टिका हैः सेफ्टी निगरानी, वर्कफोर्स की मजबूती, वित्तीय अनुशासन और यात्रियों की सुरक्षा.

अगर कंसॉलिडेशन का यह दौर सफल रहा, तो भारतीय एविएशन पहले से ज्यादा मजबूत, सुरक्षित और भरोसेमंद बनकर उभर सकता है. अगर ऐसा नहीं हुआ, तो 2025 में जो दरारें खुलकर सामने आई थीं, वे फिर उभर आएंगी. यही वजह है कि 2026 सिर्फ दिखने में नहीं, उससे कहीं ज्यादा मायनों में एक अहम साल है.

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