आम दिनों में, बागलकोट राष्ट्रीय सुर्खियों में नहीं रहता. न ही धर्मनगर, पोंडा, राहुरी या कोरिडांग की चर्चा होती है. अप्रैल में असम, पश्चिम बंगाल, केरल, पुडुचेरी और तमिलनाडु में हो रहे शोर-शराबे वाले विधानसभा चुनावों के बीच, ये शांत सी दिखने वाली विधानसभा सीटें भी मुट्ठी भर सीटों से कहीं ज्यादा बड़ी चीजों का टेस्टिंग ग्राउंड बन गई हैं. इन चुनावों में BJP के लिए बहुत कुछ दांव पर लगा है और इनके नतीजे 2029 के आम चुनावों की दिशा तय करेंगे. ये उपचुनाव इन राज्यों में वोटर्स के मूड को भांपने का एक पैमाना हैं.
भारत के उपचुनावों में शायद ही कभी आम चुनावों जैसा ड्रामा होता है. इनमें कोई बड़ी लहर या राष्ट्रीय नैरेटिव नहीं होता. यहां जो देखने को मिलता है, वह राजनीति का सबसे असली और जमीनी रूप है- लोकल, पर्सनल और संगठनात्मक. 9 अप्रैल और 23 अप्रैल को छह राज्यों की आठ विधानसभा सीटों पर होने वाले उपचुनाव बिल्कुल ऐसे ही हैं. ये जमीन पर सत्ता के टिके रहने, ट्रांसफर होने या उसे चुनौती दिए जाने की एकदम साफ तस्वीर पेश करते हैं.
इनमें से ज्यादातर चुनाव मौजूदा विधायकों के निधन के कारण हो रहे हैं, जिससे इनमें एक सहानुभूति का फैक्टर भी जुड़ गया है. लेकिन इतिहास बताता है कि सिर्फ सहानुभूति से चुनाव नहीं जीते जाते. यह तभी काम करती है जब इसके साथ मजबूत संगठन, कैंडिडेट की साख और लोकल नेटवर्क का तड़का लगे. यही तिकड़ी कम वोटिंग वाले चुनावों में नतीजों को तय करती है. आम चुनावों के मुकाबले उपचुनावों में वोटिंग आमतौर पर 10 से 20 प्रतिशत तक कम होती है. इन हालात में चुनाव किसी 'लहर' से नहीं, बल्कि वोटरों को पोलिंग बूथ तक लाने की ताकत से जीते जाते हैं.
कर्नाटक में दांव बेहद ऊंचे
बागलकोट में एच.वाई. मेटी और दावणगेरे दक्षिण में शमनूर शिवशंकरप्पा के निधन ने दो ऐसे मुकाबले खड़े कर दिए हैं जिनकी जड़ें तो एक जैसी हैं, लेकिन उनका रास्ता अलग है. बागलकोट में, कांग्रेस ने निरंतरता और पुरानी साख के भरोसे उमेश मेटी को मैदान में उतारा है. BJP ने इसका जवाब वीरन्ना चरंतिमठ से दिया है, जो 2023 का चुनाव लगभग 11,000 वोटों से हार गए थे. BJP की इस कोशिश के केंद्र में बी.वाई. विजयेंद्र हैं, जिन्हें उनके पिता और पूर्व सीएम बी.एस. येदियुरप्पा का समर्थन हासिल है.
यह एक बहुत ही नपी-तुली कोशिश है. इसका मकसद लिंगायत वोटों को एकजुट करके और बूथ-लेवल की माइक्रो-प्लानिंग के जरिए पिछली बार की मामूली हार को इस बार की जीत में बदलना है. किसी भी उपचुनाव में, जहां 3-4 प्रतिशत वोटों का स्विंग भी नतीजे पलट सकता है, बागलकोट BJP के एग्जीक्यूशन का एक बड़ा टेस्ट बन गया है.
दावणगेरे दक्षिण की अलग तस्वीर
यहां कांग्रेस के कैंडिडेट समर्थ मल्लिकार्जुन के पास एक गहरी राजनीतिक विरासत है. BJP के श्रीनिवास टी. दसकरियप्पा संगठन के दम पर लड़ रहे हैं, लेकिन यहां का स्ट्रक्चर थोड़ा असंतुलित है. जिन सीटों पर निधन वाले विधायक की लंबी वफादारी रही हो, वहां उपचुनावों में अक्सर कांग्रेस के पक्ष में मार्जिन बढ़ जाता है. दावणगेरे दक्षिण इसी पैटर्न में फिट बैठता दिख रहा है. विजयेंद्र के लिए यहां सबसे बड़ा टास्क इस सीट पर BJP के आपस में लड़ रहे गुटों को एक साथ रखना है, ताकि वह केंद्रीय नेताओं के सामने अपनी लीडरशिप का जलवा दिखा सकें. राज्य इकाई के अध्यक्ष के तौर पर उनका फिर से चुना जाना अभी बाकी है. और यहां के अच्छे नतीजे उनके लिए बाजी पलट सकते हैं.
गोवा का रुख कैसा?
यहां मुकाबला ज्यादा अस्थिर है. पोंडा में, पूर्व सीएम रवि नाइक के निधन ने एक ऐसी सीट खाली कर दी है जो पार्टी से ज्यादा एक शख्सियत से तय होती थी. BJP ने उनके बेटे रितेश नाइक पर भरोसा जताया है. कांग्रेस ने MGP से आए केतन प्रभु भाटीकर को मैदान में उतारा है. वे BJP की किसी भी अंदरूनी दरार का फायदा उठाने की ताक में हैं. गोवा का चुनावी इतिहास, जहां कई सीटों का फैसला 5,000 से कम वोटों से होता है, गुटबाजी के चलते बहुत खास दिखता रहा है. 2022 के चुनावों में, नाइक ने यह सीट केतन प्रभु भाटीकर (तब MGP टिकट पर) को सिर्फ 77 वोटों से हराकर जीती थी. और कांग्रेस के राजेश वेरेन्कर उनसे बहुत पीछे नहीं थे. इन उपचुनावों में, जूनियर नाइक के लिए अपने पिता की सीट और उनकी विरासत को बचाना एक टेढ़ी खीर होगा. BJP के लिए असली मुकाबला पार्टी के अंदर की एकजुटता का है. अगर यहां नतीजा उल्टा पड़ता है, तो इससे राज्य में प्रमोद सावंत के शासन को लेकर केंद्रीय नेतृत्व के मन में शक पैदा होने लगेगा.
त्रिपुरा और नगालैंड में समीकरण
त्रिपुरा के धर्मनगर में, BJP ने काफी सोच-विचार के साथ एक फैसला लिया है. पूर्व कांग्रेसी और बाद में भगवा पार्टी में नेता बने बिश्व बंधु सेन के निधन के बाद, पार्टी ने संगठन के एक पुराने चेहरे जहार चक्रवर्ती को मैदान में उतारा है. संदेश बिल्कुल साफ है. पार्टी 2018 के बाद से बनाए गए अपने कैडर पर भरोसा कर रही है, जिसके बारे में उसका दावा है कि यह अब लगभग 90 प्रतिशत पोलिंग बूथों को कवर करता है. विपक्ष, जिसका प्रतिनिधित्व चयन भट्टाचार्य और अमिताभ दत्ता कर रहे हैं, अंकगणित को अपने फायदे में बदलने की कोशिश कर रहा है. लेकिन बिना स्मूथ 'वोट ट्रांसफर' के, ऐसी रणनीतियां अक्सर फेल हो जाती हैं. थोड़ा और पूर्व में, नगालैंड के कोरिडांग में, BJP चुनाव मैदान से तो गायब है लेकिन रणनीति में पूरी तरह मौजूद है. यह उपचुनाव नेशनलिस्ट डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी (NDPP) के इमकोंग एल. इमचेन के निधन के बाद हो रहा है. यहां, मुकाबला गठबंधन के संतुलन को लेकर है. BJP की बड़ी नॉर्थईस्ट रणनीति चुनाव जीतने के साथ-साथ अपने सहयोगियों को मैनेज करने पर भी टिकी है.
महाराष्ट्र और गुजरात की लड़ाई
23 अप्रैल को होने वाले दूसरे चरण में फोकस पश्चिमी भारत पर शिफ्ट हो जाएगा, जहां यह कहानी विरासत और टूट की बन जाती है. महाराष्ट्र के बारामती में, एक ऐसी सीट जो लंबे समय से अजित पवार से जुड़ी रही है, वहां NCP ने उनके बेटे पार्थ पवार को मैदान में उतारा है. जो कभी एक मजबूत गढ़ हुआ करता था, वह अब पार्टी के बंटवारे के चौराहे पर खड़ा है. यह इस बात का टेस्ट है कि क्या राजनीतिक विरासत इस टूट के बाद भी बच पाएगी. राज्य में अजित पवार के साथ खड़ी BJP के लिए भी इस नतीजे के परोक्ष मायने हैं.
उसी राज्य के राहुरी में, यह उपचुनाव जितना विरासत का है, उतना ही गठबंधन के तनाव का भी है. यह सीट शिवाजी भानुदास कर्डिले के निधन के बाद खाली हुई थी, जिन्होंने एक बहुत मजबूत लोकल नेटवर्क खड़ा किया था. BJP ने एक जाने-पहचाने चेहरे के जरिए निरंतरता बनाए रखने के लिए उनके बेटे अक्षय शिवाजीराव कर्डिले को मैदान में उतारा है. विपक्ष अभी भी बिखरा हुआ है. शरद पवार गुट वाली NCP ने अभी तक अपना उम्मीदवार घोषित नहीं किया है. पूर्व विधायक प्राजक्त तनपुरे चुनाव लड़ना चाहते हैं, लेकिन महा विकास अघाड़ी (MVA) के भीतर खींचतान चल रही है. कांग्रेस और शिवसेना (उद्धव गुट) ने भी इसमें दिलचस्पी दिखाई है, जहां रावसाहेब खेवरे जैसे नेता चुनाव लड़ने का इरादा जता रहे हैं. कम वोटिंग वाले चुनाव में, ऐसा बिखराव हार-जीत तय कर सकता है. 6 अप्रैल नामांकन दाखिल करने की आखिरी तारीख थी. विपक्ष की घड़ी टिक-टिक कर रही है, जबकि सत्ताधारी महायुति पहले ही चुनाव प्रचार के मोड में आ चुकी है.
गुजरात का उमरेठ इस तस्वीर को पूरा करता है. यह उपचुनाव गोविंदभाई परमार के निधन के कारण हो रहा है, और BJP ने उनके बेटे हर्षभाई गोविंदभाई परमार को मैदान में उतारा है. यह इन उपचुनावों के उस बड़े पैटर्न को दिखाता है, जहां पार्टियां अपनी राजनीतिक पूंजी को बचाने के लिए पारिवारिक विरासत पर निर्भर हैं. यहां भी, वोटिंग टर्नआउट के मायने होंगे. जब वोटिंग गिरकर 50-55 प्रतिशत पर आ जाती है, तो संगठन का दम अक्सर लोकप्रियता पर भारी पड़ जाता है.
इन सभी विधानसभा सीटों पर एक साफ पैटर्न उभरकर आता है. ये चुनाव किसी 'लहर' से तय नहीं होंगे, बल्कि ये जमीनी कानाफूसी से तय होंगे. जब लोगों में उत्साह कम हो और दांव सिर्फ लोकल मुद्दों पर लगे हों, तब संगठन, कैंडिडेट की साख और वोटरों को बूथ तक खींच लाने की ताकत ही हार-जीत तय करती है.
BJP के लिए, हर जगह लक्ष्य अलग-अलग हैं. वह कर्नाटक में रिकवरी चाहती है, गोवा और त्रिपुरा में अपनी सीटें बचाना चाहती है, नगालैंड में स्थिरता और महाराष्ट्र में 'विरासत की राजनीति' को बड़ी सावधानी से पार लगाना चाहती है. इन अलग-अलग लक्ष्यों के पीछे सिर्फ एक ही सवाल छिपा है. क्या उसकी ताकत किसी 'लहर' पर टिकी है या जमीन पर काम करने वाली उसकी मजबूत मशीनरी पर? उपचुनावों से सरकारें नहीं बदलतीं. लेकिन वे अक्सर यह बता देते हैं कि सरकारें कितने समय तक टिकेंगी, या वे कब दरकना शुरू कर देंगी. अप्रैल के इस शांत चुनावी माहौल में, इसके जवाब भले ही खामोश हों, लेकिन वे बहुत कुछ कह जाएंगे.

