
जुलाई की 10 तारीख को सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा कि तलाकशुदा मुस्लिम महिलाएं सीआरपीसी की धारा 125 (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 144) के तहत अपने पति से भरण-पोषण पाने की हकदार हैं. न्यायालय ने साफ किया कि यह कोई खैरात नहीं, बल्कि उन तलाकशुदा महिलाओं का अधिकार है.
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने एक मुस्लिम युवक मोहम्मद अब्दुल समद की याचिका को खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया. न्यायालय ने कहा कि यह फैसला हर धर्म की महिलाओं के लिए समान रूप से लागू होगा. मुस्लिम महिलाओं को भी गुजारा भत्ता पाने का उतना ही अधिकार है, जितना अन्य धर्म की महिलाओं को है.
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि 1985 के शाहबानो फैसले के जवाब में तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने जो मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) कानून, 1986 संसद में पारित कर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया था, वो भी इस धर्मनिरपेक्ष कानून पर प्रभावी नहीं होगा.
इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट ने कई ऐसे फैसले दिए हैं जिनसे भारत में मुस्लिम महिलाओं की स्थिति मजबूत हुई है. चाहे वो 1986 का शाहबानो मामला हो या 2017 में तीन तलाक कानून पर फैसला. ऐसे में आइए जानते हैं सुप्रीम कोर्ट के वे कुछ बड़े फैसले, जिनसे मुस्लिम महिलाओं के जीवन में सुधार का रास्ता और बेहतर हुआ. शुरुआत शाहबानो मामले से ही करते हैं.
शाहबानो मामला और राजीव गांधी सरकार का 1986 का कानून
शाहबानो मामला भारतीय राजनीति और देश में मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के इतिहास में शायद सबसे महत्वपूर्ण मामलों में से एक है. यह एक ऐसा मुहाना है जहां से भारतीय राजनीति को समझने की कई धाराएं निकलती हैं. मामला कुछ यूं है कि मध्य प्रदेश के इंदौर की रहने वाली 73 साल की शाहबानो को उनके पति मोहम्मद अहमद खान ने शादी के 40 सालों बाद अचानक तलाक दे दिया था.

पांच बच्चों की मां शाहबानो को उनका पति इस्लामी कानून के मुताबिक इद्दत (तलाक के तीन महीने बाद तक) की अवधि तक गुजारा भत्ता देने को तैयार था. लेकिन तलाकशुदा शाहबानो अपने पूर्व पति से हमेशा के लिए ये खर्च चाहती थीं. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में सीआरपीसी की धारा 125 के तहत गुजारा भत्ता पाने के लिए याचिका दायर की.
23 अप्रैल, 1985 को जब सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया तो वह शाहबानो के पक्ष में आया. अदालत ने कहा कि इस कानून के तहत अलग हुई या तलाकशुदा पत्नी अपने पूर्व पति से गुजारा भत्ता मांग सकती है. न्यायालय ने साफ किया कि यह मुसलमानों पर भी लागू होता है और इस कानून और मुस्लिम पर्सनल लॉ में कोई विरोधाभास नहीं होना चाहिए.
अब उस समय के जो राजनीतिक हालात थे, उस पर जरा गौर फरमाइए. इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के मुताबिक, तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश वाई.वी. चंद्रचूड़ (वर्तमान सीजेआई डी.वाई. चंद्रचूड़ के पिता) ने शाह बानो के पक्ष में फैसला सुनाया, लेकिन इस्लाम के बारे में आलोचनात्मक और आपत्तिजनक टिप्पणी की. इसने मुसलमानों के कई वर्गों में विरोध प्रदर्शन को जन्म दिया. वे सड़कों पर उतर आए. क्योंकि उन्होंने जो देखा और जो उन्हें विश्वास दिलाया गया, वह उनके धर्म और उनके अपने पर्सनल लॉ के अधिकारों पर हमला था.
तब राजीव गांधी की सरकार में उनके ही वित्त मंत्री वी.पी. सिंह कांग्रेस पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगा रहे थे. राजीव के सामने अब ऐसी स्थिति थी कि बड़ी संख्या में मुसलमान सड़कों पर विरोध प्रदर्शन कर रहे थे और उनके नेता, जिनमें कांग्रेस के कई नेता भी शामिल थे, चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे थे कि अगर सरकार संसद में कानून बनाकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने की कोशिश नहीं करती, तो कांग्रेस को आगामी चुनावों में भारी नुकसान उठाना पड़ेगा.
ऐसे में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने दो बड़े राजनीतिक फैसले लिए, जो आगे चलकर उनके लिए काफी आलोचना का सबब बनने वाले थे. उन्होंने संसद में एक ऐसा कानून पारित किया, जिसके तहत मुस्लिम महिलाओं को अपने पूर्व पतियों से गुजारा भत्ता मांगने का अधिकार नहीं था. इस तरह शाहबानो को सुप्रीम कोर्ट में केस जीतने के बाद भी अपने पति से हर्जाना नहीं मिल सका. राजनीति पर धर्म के इस असर को विपक्ष ने "मुस्लिम तुष्टिकरण" की चरम सीमा बताया, और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) समेत अन्य दलों ने इस पर राजीव गांधी को जमकर घेरा.
इधर, राजीव गांधी ने हिंदुओं को खुश करने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार को बाबरी मस्जिद के अंदर गुप्त रूप से बनाए गए अस्थायी राम मंदिर के द्वार खोलने की हरी झंडी दे दी. यह दूसरा बड़ा फैसला था, जिसके परिणाम भी काफी बड़े होने वाले थे. राजीव गांधी द्वारा दोनों समुदायों के कट्टरपंथियों को खुश करने के इस प्रयास ने भाजपा को एक मुद्दा दे दिया, जिसने सफल सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के आधार पर उसकी भावी चुनावी सफलताएं सुनिश्चित कर दीं. एक समय में हिंदू कोड बिल का विरोध करने वाली संघ परिवार की सदस्य भाजपा खुद को महिला अधिकारों की हिमायती दिखाने में सफल रही, और उसने धीरे-धीरे एक व्यापक जनाधार तैयार कर लिया.
गुलबाई बनाम नसरोजी, 1963
साल 1963 का गुलबाई बनाम नसरोजी मामला मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों से जुड़े कुछ शुरुआती मामलों में से एक है. दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस फैसले में मुस्लिम कानून के तहत विवाह की वैधता के लिए कुछ जरूरी दिशानिर्देश निर्धारित किए थे और वैध निकाह समझौते के लिए कुछ जरूरी चीजों पर जोर दिया था.
अदालत ने अपने इस फैसले में साफ किया कि एक वैध विवाह के लिए जरूरी मानदंड क्या होने चाहिए. इसके अलावा उसने यह सुनिश्चित किया कि मुस्लिम महिलाओं का अवैध या जबरन विवाह के माध्यम से शोषण न हो.
डेनियल लतीफी बनाम भारत संघ, 1986
इस मामले का सीधा संबंध शाहबानो से जुड़ा है. यह राजीव गांधी के निधन के करीब 10 साल बाद (2001) की बात है. डेनियल लतीफी ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की, जिसमें राजीव गांधी सरकार के मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) कानून, 1986 की वैधता को चुनौती दी गई थी.
डेनियल लतीफी ही वह वकील थे जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट में शाह बानो का प्रतिनिधित्व किया था. बहरहाल, न्यायालय ने उस कानून की व्याख्या इस तरह की कि शाह बानो मामले में दिए गए अदालत के फैसले को बरकरार रखा गया और राजीव गांधी के 1986 के अधिनियम द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों को प्रभावी रूप से रद्द कर दिया गया.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह मुस्लिम पति को अपनी तलाकशुदा पत्नी को गुजारा भत्ता देने के दायित्व से मुक्त नहीं करता है. साथ ही यह गुजारा भत्ते को तीन महीने की इद्दत अवधि तक भी सीमित नहीं करता. न्यायालय के इस फैसले ने मुस्लिम महिलाओं के 'इद्दत' की अवधि से परे उन्हें भरण-पोषण के अधिकार को मान्यता देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण बदलाव को सुनिश्चित किया.
नूर सबा खातून केस, 1997
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने माना कि मुस्लिम महिला, मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) कानून, 1937 के तहत पैतृक संपत्ति में हिस्सेदारी का दावा कर सकती है. अदालत के इस फैसले ने मुस्लिम महिलाओं के संपत्ति अधिकारों को मान्यता दी और उन्हें आर्थिक रूप से मजबूत बनाया.
शायरा बानो केस, 2017
शाहबानो मामले के बाद यह शायद मुस्लिम महिला के अधिकारों के इतिहास में सबसे महत्वपूर्ण मामलों में से एक है. इस ऐतिहासिक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक (मुस्लिमों में एक रिवाज) की प्रथा को असंवैधानिक और अमान्य करार दिया था. न्यायालय ने फैसला सुनाते हुए कहा कि तीन तलाक मुस्लिम महिलाओं के मौलिक अधिकारों का हनन करता है.
यह साल 2017 की बात है जब सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने ट्रिपल तलाक यानी तलाक-ए-बिद्दत को असंवैधानिक ठहराते हुए सरकार को तीन तलाक को रोकने के लिए कानून बनाने का निर्देश दिया. सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर सरकार ने दिसंबर 2017 में मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) बिल पेश किया. ये बिल लोकसभा से तो पास हो गया, लेकिन राज्यसभा में अटक गया.
इसके बाद 2019 में आम चुनाव के बाद सरकार ने कुछ संशोधन के साथ इस बिल को फिर पेश किया. इस बार ये बिल लोकसभा और राज्यसभा, दोनों सदनों से पास हो गया. यह कानून तीन तलाक पर रोक लगाता है. तीन तलाक देने वाले दोषी पुरुष को तीन साल तक की सजा हो सकती है. इसके साथ ही पीड़ित महिला अपने और अपने नाबालिग बच्चे के लिए गुजारा भत्ता मांग सकती है.

