जब 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महत्वाकांक्षी प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (PMKVY) की शुरुआत की थी तो उस समय उन्होंने इसे गेमचेंजर बताया था. लेकिन भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की एक हालिया रिपोर्ट ने इस योजना के क्रियान्वयन में गंभीर खामियां उजागर की हैं.
2015 से 2022 तक तीन फेज में चली इस स्कीम पर देश की जनता की गाढ़ी कमाई से 14,450 करोड़ रुपये खर्च हुए. लेकिन लाभार्थियों की पहचान, ट्रेनिंग की गुणवत्ता, प्लेसमेंट और फंड उपयोग में बड़े पैमाने पर लापरवाही और धांधली सामने आई है.
CAG की इस रिपोर्ट में सिर्फ आठ राज्यों में योजना के क्रियान्वयन की पड़ताल की गई है. ये राज्य हैं- असम, बिहार, झारखंड, केरल, ओडिशा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश.
CAG की रिपोर्ट में इस योजना से संबंधित जो सबसे बड़ी खामी लाभार्थियों के बैंक अकाउंट से जुड़ी है. रिपोर्ट के मुताबिक कुल लाभार्थियों में से 90 फीसदी से अधिक के नाम पर फर्जी बैंक अकाउंट नंबर दर्ज हैं. कौशल विकास योजना के दूसरे और तीसरे चरण के तहत कुल 95.91 लाख उम्मीदवारों का प्रशिक्षण और प्रमाणन किया गया. इनमें से 90.66 लाख यानी तकरीबन 94.53 फीसदी उम्मीदवारों के बैंक खाते की डिटेल्स या तो खाली थीं या वहां पर 'निल', 'एन/ए' (अनुपलब्ध) या जीरो दर्ज था. कई जगह तो बैंक अकाउंट नंबर के रूप में '11111111111', '123456...' या सिर्फ टेक्स्ट, नाम या स्पेशल कैरेक्टर दर्ज थे.
लाभार्थियों के बैंक अकाउंट को लेकर गफलत की यह कहानी यहीं नहीं रुकती बल्कि एक ही अकाउंट कई उम्मीदवारों के नाम पर दर्ज किया गया. CAG की रिपोर्ट बताती है कि 12,122 यूनिक बैंक खाते कुल 52,381 उम्मीदवारों से लिंक थे. यानी एक ही खाते पर कई लाभार्थियों की एंट्री रिकॉर्ड में की गई है. यह स्थिति लाभार्थियों की असली पहचान को लेकर बड़े सवाल खड़ा करती है. साथ ही कौशल विकास योजना की पूरी व्यवस्था में फर्जी या घोस्ट बेनिफिशियरी की आशंका को बल देती है.
बैंक अकाउंट को लेकर डेटा की इन गड़बड़ियों का का सीधा असर भुगतान पर पड़ा. कौशल विकास योजना के तहत प्रमाणित उम्मीदवारों को रिवॉर्ड मनी (500 रुपये से लेकर आने-जाने का खर्च, बोर्डिंग आदि) मिलना था लेकिन 34 लाख से ज्यादा प्रमाणित उम्मीदवारों का भुगतान अब तक बकाया है. CAG की रिपोर्ट बताती है कि इस योजना में डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (DBT) सिर्फ 18.44 फीसदी मामलों में सफल हुआ.
CAG ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि ईमेल डिलीवरी फेलियर रेट 36.51 फीसदी था और ज्यादातर रिस्पॉन्स ट्रेनिंग पार्टनर्स के ईमेल से आए. हैरान करने वाली बात यह है कि CAG रिपोर्ट से कई जगह एक ही फोटो का इस्तेमाल कई लाभार्थियों के लिए किए जाने की बात भी सामने आती है. एक ही लाभार्थी की फोटो अलग-अलग राज्यों तक में इस्तेमाल किए जाने की बात CAG की रिपोर्ट में दर्ज है.
रिपोर्ट में ऐसी-ऐसी जानकारियां तथ्यों के साथ दी गई हैं कि पढ़कर कोई भी हैरान हो सकता है. अचरज इस बात पर भी होती है कि कैसे इस महत्वाकांक्षी योजना को जमीनी स्तर पर नाकाम करने के लिए बंदरबांट चलती रही और संबंधित एजेंसियों ने जरूरी कदम नहीं उठाए. इसे एक उदाहरण के जरिए समझते हैं. कौशल विकास योजना के साथ प्रशिक्षण एजेंसी के तौर पर एडुज्वाइन ट्रेनिंग फाउंडेशन जुड़ी हुई थी. इसने खाद्य प्रसंस्करण, मीडिया ऐंड एंटरटेनमेंट और खेल के क्षेत्र में कुल 77,490 लाभार्थियों के प्रशिक्षण और प्रमाणन का काम किया.
यहां तक तो सब ठीक है. लेकिन इस एजेंसी ने जिन लोगों को फिटनेस ट्रेनर का प्रशिक्षण दिया था, उनमें से 30,000 लोगों को 33 जिम में काम करते हुए दिखाया. यानी एक जिम में 910 ट्रेन! है न ये हैरान करने वाला आंकड़ा! दुनिया में कोई भी ऐसी जिम नहीं होगी जहां इतने ट्रेनर काम करते होंगे. आम तौर पर हर जिम में दो से पांच ट्रेनर होते हैं, जो अलग-अलग शिफ्ट में काम करते हैं. लेकिन ये ऊटपटांग आंकड़े दिखाकर इस योजना में संसाधनों का बंदरबांट चलता रहा.
कौशल विकास योजना के तहत एक प्रावधान पहले के ज्ञान और अनुभव की मान्यता से भी संबंधित है. योजना दस्तावेजों में इसे recognition of prior learning कहते हैं. CAG ने इसके क्रियान्वयन में भी गंभीर खामियों को उजागर किया है. यहां गैर-योग्य एम्प्लॉयर्स से सर्टिफिकेशन की बात सामने आई है. कई मामलों में एडिटेड फोटो पाए गए हैं. एक ही दिन में अलग-अलग राज्यों में एक ही टीम की यात्रा दिखाई गई है. CAG ने अपनी रिपोर्ट में पाया कि 84 फीसदी मामलों में तो जियो-टैगिंग हुई ही नहीं थी. कुछ एजेंसियां तो नॉन-एक्जिस्टेंट या स्ट्रक ऑफ कंपनियां (सरकारी काम से प्रतिबंधित) थीं.
CAG की रिपोर्ट में पात्रता मानदंडों की अनदेखी की बात भी उजागर हुई है. स्कीम के नियमों के मुताबिक उम्मीदवारों की उम्र, शिक्षा और वर्क एक्सपीरियंस की जांच जरूरी थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ. लाखों मामलों में न्यूनतम उम्र (15-45 साल) या शिक्षा (9वीं पास आदि जॉब रोल्स के लिए) की पात्रता पूरी नहीं थी. उदाहरण के तौर पर सेल्फ एम्प्लॉयड टेलर जॉब रोल में 18 साल से कम उम्र के 40,953 उम्मीदवार सर्टिफाइड हुए. खेती से संबंधित एक प्रशिक्षण कोर्स में 20 वर्ष की न्यूनतम आयु का प्रावधान योजना में किया गया था. लेकिन CAG की रिपोर्ट बताती है कि 52,214 ऐसे लोगों को प्रमाणित किया गया जिनकी आयु इस मानदंड से कम थी. वर्क एक्सपीरियंस की जानकारी रिकॉर्ड करने में भी भारी अनदेखी की गई.
CAG की इस रिपोर्ट से पता चलता है कि कौशल विकास योजना के तहत प्रशिक्षण देने वाले ट्रेनिंग सेंटर्स की हालत भी अच्छी नहीं रही. CAG की टीम ने जिन 90 ट्रेनिंग सेंटर्स के इंस्पेक्शन किए उनमें से चार बंद मिले. हैरानी की बात यह है कि इसके बावजूद इन केंद्रों को प्रशिक्षण कराने के बदले में भुगतान किए गए. कई प्रशिक्षण केंद्रों में इन्फ्रास्ट्रक्चर की भारी कमी को भी CAG ने अपनी रिपोर्ट में उजागर किया है. उदाहरण के तौर पर आधार के जरिए अटेंडेंस बनाने का सिस्टम सिर्फ 74 फीसदी केंद्रों में ही इंस्टॉल किया गया था. 40 फीसदी केंद्र ऐसे थे, जहां इस योजना के अलावा अन्य गतिविधियां भी चल रही थीं. ब्रांडिंग नियमों का पालन सिर्फ 56 फीसदी केंद्रों में देखा गया.
इन खामियों का असर प्लेसमेंट पर भी स्पष्ट तौर पर दिखा. CAG की रिपोर्ट बताती है कि जितने लाभार्थियों की शॉर्ट टर्म ट्रेनिंग हुई, उनमें से सिर्फ 41 फीसदी को ही प्लेसमेंट मिला. रिपोर्ट यह भी कहती है कि कई सेक्टर्स में प्लेसमेंट जीरो रहा. केरल में फेक डॉक्यूमेंट्स से प्लेसमेंट दिखाया गया.
CAG की रिपोर्ट यह भी बताती है कि पूरी योजना के क्रियान्वयन में प्लानिंग और कन्वर्जेंस की कमी थी. स्किल गैप स्टडीज सिर्फ 24 सेक्टर्स में हुईं और कई राज्य और केंद्र शासित प्रदेश इसके लिए कवर ही नहीं किए गए. साथ ही यह बात भी सामने आई कि प्रशिक्षण और मार्केट डिमांड में आपसी तालमेल नहीं था. तकरीबन 40 फीसदी सर्टिफिकेशन सिर्फ 10 जॉब रोल्स में किया गया. इससे प्रशिक्षित लाभार्थियों के प्लेसमेंट में लगातार दिक्कत आई. CAG की रिपोर्ट में यह बात भी कही गई है कि अन्य मंत्रालयों और राज्यों की योजनाओं के साथ इस योजना का ठीक से कन्वर्जेंस नहीं हुआ.
प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना का मकसद युवाओं को प्रशिक्षित करके उन्हें रोजगार योग्य बनाना था लेकिन CAG की रिपोर्ट से साफ है कि यह योजना अनियमितताओं में उलझकर रह गई है. अब यह केंद्र सरकार पर निर्भर करता है कि CAG की इस आंखें खोलने वाली रिपोर्ट से सबक लेकर इस योजना के क्रियान्वयन में वह क्या सुधार करती है.

